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Monday, 21 May 2018

आँधी-पानी वाला बचपन

"आँधी-पानी वाला बचपन"

दिन भर चिबभी (गांव में पैर से ठिकड़ा मार कर कूद-कूद कर खेले जाने वाला खेल) खेलते हुए रामू और उसकी बहन राम्या कभी न थकते। मम्मी चिल्लाती रहती कि "बेटा लू (गरम वायु) लग जायेगी। पूरी दोपहरिया चिल्ल पों करते रहते हो। थोड़ी देर आराम कर लो" लेकिन इन बातों को वे दोनों अक्सर अनदेखी करते। माँ कह कह के थक जाती और न जाने क्यों सोना चाहती तो सो न पाती। और हमेशा यही कहती, "आने दो पिताजी को तुम दोनों के बारे में बताऊँगी कि पढ़ाई नहीं करते और केवल पूरी दोपहरिया खेलते ही रहते हैं"। इतने में थोड़ी देर में रामू आया चिल्लाता हुआ और माँ गुस्से में तमतमाई हुई उठीं और इस बार इतना झल्लाते हुए रोने की सूरत बना कर कहने लगीं कि क्या हुआ, सोने क्यों नहीं देते जब देखो तब खटर पटर ही किया करते हो। रामू कुछ नहीं बोला उसे लगा कहीं मम्मी मार न दे। और इससे ज्यादा मम्मी की रोने जैसी सूरत देख कर वह चुप हो गया कि शायद मम्मी को कितना दुख पहुंचा। लेकिन मम्मी अब जग चुकी थीं तो जानना भी चाहती थीं कि आखिर रामू हर बार चिल्ल्लाता है तो इस बार भले ही कोई कारण न हो। लेकिन ऐसा क्या था जो चिल्ला रहा था या कहना चाह रहा था। रामू शरारती था और राम्या भी यह सब देख रही थी। वह कह रही थी कि मम्मी वो ऐसे ही चिल्लाया होगा। कोई काम तो था नहीं। शायद बहन को भाई के लिए शिकायत करने का मौका था। और भाई को अब साबित करने का। रामू ने कहा मम्मी बाहर देखो। बहुत जोर की धूल और हवा चल रही है। आंधी तूफान के साथ। और पूछना चाहता था कि खेत मे चले जाएं। आम गिर रहा होगा। मम्मी जोर से भागती हुई कहने लगीं "पागल रामू तुम्हें पहले नहीं बताना चाहिए था। अब छत पर आम का अचार जो सूख रहा था, भीग गया होगा। और आम तो गांव के बहुत सारे लड़के बीन ले गए होंगे। इतनी तेज हवा दादी भी तो तुम्हारी गई होंगी। मैं भी चलूंगी। तुम अकेले कहीं आंधियो में पेड़ के नीचे दब गए तो?"
रामू की तिलमिलाहट, छटपटाहट तो थी लेकिन हिम्मत भी नहीं थी क्योंकि शायद उसे नहीं पता था कि आंधियों से पेड़ गिरें अगर तो कैसे बचा जाए। या लाइटिंग हो, बिजली गिरे तो क्या करें....इसलिए माँ का इंतजार कर रहा था। राम्या भी कहने लगी मैं भी चलूंगी। दोनों माँ के साथ चल पड़े। बाग 1 किलोमीटर दूर था। आम के करीब 10 पेड़ टूट गए थे। और ज्यादातर आम तो गिर चुके थे और कुछ गांव के लोग लेकर चले गए थे। पानी से दादी माँ भीगती हुए ज्यादातर आम एक जगह इकठ्ठा कर चुकी थी। रामू को पास आते देख वह 2 आम पके हुए देते हुए बोलीं कि रामू भईया ये आज जंगल के राजा शेर की शादी हुई और आज ही यह सबसे पहली बार पका तुम चखो। राम्या कहने लगी दादी मुझे भी। हां तेरे लिए भी है देती हूँ...और एक आम दादी ने दे दिया। ज्यादातर कच्चे आमों को उठाने के लिए शायद बोरियों की आवश्यकता थी। खांची चाहिए थी। पिताजी आये तब जाकर अगले 2-3 घंटे के अथक परिश्रम के बाद आम को किसी कोने लगाया जा सका। मम्मी अब दिन रात आम का अचार बनाने, छुपा छुपा कर भूसे में आम पकाने के लिए रखती, गुड़ डाल कर गुरम्मा बनातीं और फिर दोपहरिया में लू से बचने के लिए आम का शरबत बनातीं। कुछ गांव में बंटवा देतीं।

और अब रामू बड़ा हो गया है। रामू बनारस चला गया पढ़ने और राम्या दिल्ली। कभी कभार ही जाना होता है घर। आम खाने वाला तो कोई होता ही नहीं। मम्मी को जब रामू चिल्लाता था तब भी नींद नहीं आती थी और आज जब रामू घर नहीं है तब न होने की वजह से नींद नहीं आती। दिन में तब रामू और राम्या का शोर सुनकर वह जग जाया करती थीं। आज अंतर्मन का शोर उन्हें कई बार जगाता रहता है। तब आंधी आती थी तो घर से साथ निकलते थे। आज बाग वीरान पड़ा है। निकलने वाला ही नहीं कोई। राम्या पहले रामू को चिढाती थी। आज रामू को चिढाने वाला कोई नहीं। पिताजी की डांट और शाम का इंतजार, भय से दूर रहकर रामू और राम्या केवल दिन रात सपने देखते हैं। किसी अपने की। और मम्मी और पिताजी उनके घर आने की। फासले इतने दूर हो गए कि मां और पिता के पास खेलने वाले दो बच्चे अब दूर कहीं रहने लगे। और अब उनके पास खेलने वाले बच्चे नहीं और बच्चों के खेलने का समय नहीं। घर कभी कभार जाना और जाते हुए विदा करते मां और पिताजी की आंखों को न मिला पाना और फिर उधर घर में दोनों लोगों का आपस में आंसुओं को पोछना और इधर बेटे और बेटी का रह रह कर दृश्य ख्याल में आते ही आंखों को पोछना शायद अपने आप में जिंदगी है। ऑटों में बैठकर विदा लेने के बाद रामू के चेहरे पर अनायास ही आंखों से होती हुई आंसुओं की कुछ बूंदे नीचे गिरते देख बगल में बैठे एक मुसाफिर ने पूछ लिया "क्या हुआ भईया तबियत ख़राब है?" और रामू ने कहा नहीं चाचाजी बोतल का पानी गिर गया....

#प्रभात "कृष्ण"

Tuesday, 3 April 2018

होली के दिन की बात


आज व्हाट्सएप जब उसने ऑन किया तो पता लगा मोबाइल स्विच्ड ऑफ हो गया। स्क्रीन काली हो गई। बहुत तहकीकात करने पर पता चला कि इसको रंगीन बुखार हो सकता है या यह भी हो सकता है डिहाइड्रेशन हो गया होगा। निर्णय यह हुआ कि अब इसे किसी विशेषज्ञ से दिखा लिया जाए।



पड़ोस में बैठे एक मोबाइल डॉक्टर ने कहा कि इसे रंगीन बुखार ही हो सकता है इसके लिए मोबाइल चार्ज में लगाना पड़ेगा यानी रीहाइड्रेट करना पड़ेगा तभी पता चलेगा। थोड़ी देर तक चार्ज में लगाने के बाद स्विच ऑन होने पर पता चला कि अभी इसमें जीवन है और इसे रंगों का बुखार ही हो गया था। 1562 मैसेज और 523 चैट का भार सहन करने में बड़ी तकलीफ उठानी पड़ी। थोड़ा और अंदर तहकीकात शुरू हुई तो पता चला कि इसमें से करीब 100 कॉन्टेक्ट्स बिना सेव्ड थे यानी कि ये कभी विश्वस्त सूत्र का किरदार निभाये होंगे।
होली था न ऐसा लगा कि शायद होली तो यहीं खेली गई होगी। जिसने रंग नहीं लिया वह रजाई कर अंदर मुँह ढककर होली की शुभकामनाएं दे रहा था। ज्यादातर लोग किसी परंपरा का निर्वहन ही कर रहे थे। उन्हें शायद ऐसा लग रहा था अगर इसे आगे फारवर्ड नहीं करेंगे तो श्राप लग जायेगा। शायद वे वही लोग थे जो कभी दिल्ली की बस में बैठे होंगे तभी कश्मीरी गेट के पास उनके हाथ में एक पर्ची थमा दी गई होगी कि अब इस पर्ची की 1000 कॉपी नहीं बांटे तो आपका विनाश हो जाएगा।
बुखार हुआ था, लेकिन टुल्लू, पूल्लु और गुल्लू सब एक साथ सेलेक्ट ऑल करके हैप्पी होली सेंड कर रहे थे। फिर एक बार किसी ने थैंक यू लिख कर भेजा तो उसे भी सेलेक्ट ऑल कर दिए और फिर वो रिप्लाई हो गया। एक बार उनके मोबाइल में किसी कवि ने लंबी सी कविता में शुभकामनाएं भेज दी। उन्हें पता नहीं था कि किसका नंबर है काफी जद्दोजहद करने के बाद ट्रू कॉलर नामक नारद ने बताया कि ये एक वरिष्ठ दोस्त के मित्र और कवि हैं। मैसेज देखकर जो रोमांच जगा था और रहस्य था कि ये हो न हो किसी महिला मित्र का नंबर हो वह तो समाप्त हो गया था ।...और फिर लगा कि टुल्लू, पूल्लु और गुल्लू सभी ने इस तरह से एक दूसरे से बिना संवाद किये और रंग पोते केवल एक दूसरे को व्हाट्सएप पर रंग लगाकर पूरा दिन त्योहार मनाया। हालांकि जिसमें से करीब 50 परसेंट लोगों ने उनसे दुबारा पूछा आप हैं कौन?
वायरस ने अपना काम कर दिया है त्योहार मनाने में अब इन वायरस के विभिन्न स्वरूप जैसे जेपीजी, जीआईएफ, सेल्फी, रिकॉर्डर, स्टेटस आदि की सहायता के लिए पढ़े लिखे करीब भारत की करोड़ों, अरबों जनता सीधे सहायता में लगी हुई है। हां सही है न अब रंग को लगाने और छुड़ाने में मशक्कत नहीं करनी पड़ती। सेल्फी एप से सीधे चेहरे पर रंग आ जाता है न भाई। और तो और अब मोबाइल रैम 128 जीबी भी कम पड़ रही है। 4000 फ़ोटो मोबाइल में रखना तो मानो उसी तरह से है जैसे खाने की एक डाइट हो। ....गजब का त्योहार मनाया जा रहा है ये भी पता नहीं चलता कि किसका मैसेज आया। वो जिंदा भी है या नहीं। उसका हाल पता नहीं है। वह दुर्घटनाग्रस्त होकर सड़क पर पड़ा है और उसे 70 लोग होली की शुभकामनाएं दे रहे हैं।
भाई हमारा मोबाइल तो रंगीन बुखार से ग्रस्त था इसलिए अभी दे रहा हूँ होली की शुभकामनाएं। ये समझ लीजिये आपने भी शुभकामनाएं भेजी थीं। लेकिन उसका अंजाम ये रहा कि इतने शब्दों का खर्चा करके यह लेख लिखना पड़ा। ऑफलाइन होली जब मैंने खेली थी तब कि फोटो शेयर कर रहा हूँ। देखिए मेरे दिल तक रंग चढ़ा था या किसी एप तक....
-Prabhat

Saturday, 30 December 2017

मेरी डायरी के खुले पन्ने

प्रभात आपको जन्मदिन की शुभकामनाएं।

आपको पता है, आप 27 साल के हो चुके।  कैसी रीत है इस संसार की, कि यहां पर मानव अपने जन्मदिन पर खुशियां मनाता है इसलिए कि आज के दिन वह पैदा हुआ था। इसलिए कि आज उसकी उम्र एक साल घट गयी है। इसलिए क्योंकि आज के दिन के बहाने वह अपने उस पल को इस तरीके से जीना चाहता है कि शायद उसकी खुशियों में एक सहारा बन जाये कोई जो उस पल का गवाह बने जब केक कटे और प्यार से उस केक को खिला कर गले लगे। फिर बोले हैप्पी बथर्डे प्रभात।
क्या????
यही न कि जीवन के हर साल हम एक मित्र से मिलते हैं नए मित्र, नई सखी और नए लोग मिलते रहते हैं। हर समय कोई एक जाने वाले की जगह हाथ थाम लेता है। 

कुछ नहीं, आज के दिन यानी 28 दिसंबर 2016 को मैं चैन की नींद सो गया था। अगले दिन सुबह से लेकर शाम की महफ़िल ने बस इतना बता दिया था। कि जिंदगी न मिले दोबारा।

माँ के गर्फ़ से बाहर आकर बिल्कुल भी ऐसा नहीं लगा था कि जन्म और मरण की रीति भी चलती है। हां यह प्रक्रिया तब समझ आयी जब सुख दुख का एहसास हुआ। जब सोचना हुआ कि माँ और पिता का अर्थ क्या है जब पता चला कि जन्म की प्रक्रिया क्या है, जब पता चला कि शादियां क्या होती हैं, जब पता चला कि लड़का और लड़की में कुछ अंतर है। तब तक तो बिल्कुल नहीं जब मैं 10 वीं क्लास बोर्ड से पास नहीं कर लिया। क्योंकि मैं पांचवी क्लास तक फ्रॉक पहनने का जिद करता रहता था। 
12 वीं तक तो जनन की जानकारी भी अधूरी ही थी। रिप्रोडक्शन अध्याय तो समझ से बाहर था। जानकारियों का अभाव कहें या यूं कहें परदे में रहने की आदत थी।

29 दिसंबर 2017 का दिन आने वाला था और लगा कि जैसे कोई आहट दे रहा हो। कुछ चिंतन मनन करने के लिए। 25 तारीख से ही मन कर रहा था कि काश मैं अपने इस वर्ष को ठीक से समझ सकता। पुनर्विचार करता। क्या खोया क्या पाया समझ सकता। जिदंगी के इस पड़ाव पर ठहर सकता । इसलिए ही 28 और 29 दो दिनों की छुट्टी पर था। सोच रहा था कि मैं कहीं किसी ग्रह पर जाता जहां केवल मैं होऊँ। वहां कोई अग्नि की मशाल भी न हो। वहां किसी की आहट न हो। वहां चंद्रमा और तारे केवल अपने में मगन हों। वहां मानवीय स्मृतियां दखलअंदाजी न करें। वहां कोई इंसान भी न भटकता हो। वहां नदियां हों लेकिन शांत वे अपने में मगन हों। लेकिन ऐसी ख्वाहिश नहीं पूरी हो सकी। लेकिन, ऐसी ख्वाहिश जल्द ही पूरी करूँगा।

इसलिए क्योंकि मेरी ख्वाहिश पूरी नहीं हो सकी। क्योंकि ऐसी जगह शायद नहीं बनी कोई । है भी तो बाधाएं और पहुँच से दूर। है भी तो वहां जाने से पहले ही कई बंधन। घर परिवार से अभी बंधे हुए, सबसे बड़ी बात मित्र मंडली से विमुख नहीं है। लोग हमें खोज लेते हैं और हमें अकेले छोड़ना ही नहीं चाहते। इसलिए मैं वंचित रह गया इन चीजों से। 
लेकिन जब वंचित रह गया तो हुआ क्या क्या।। 29 के पहले चरण में यानी रात्रि 12 बजे से 5 बजे तक मित्र और गुरु दोनों कहलाने वाले परम आदरणीय जी और मेरे भाई का साथ मिला। कुछ समय बीच में बचा तो यूँ ही ख्वाहिश पूरी करने के लिए कई बार ध्यान मगन होने की कोशिश की, अंततः थोड़ी देर के लिए आंखे बंद की , फिर खोली और आईने को सामने रख कर आपने आपको देखने की कोशिश की। 
अंततः जो दिखा वही बता रहा हूँ।
मयखाने में जाने का फायदा तो होता है क्योंकि वह कम से कम कुछ उसी प्रकार के आनंद में मशगूल तो रह लेता है जैसा वह चाहता है। मैंने पता नहीं क्यों किस अवसाद से बचने की दवा ले रखी थी उसका असर कहें या यूँ ही कल्पना में खोने का डर, कि आंखों में जरा भी विचलन नहीं हुआ। बहुत कोशिश की लेकिन अश्रु धारा भी न बन सकी। मैं सकरात्मक ऊर्जा से भरपूर अपने आईने में खुद को निहारता जा रहा था। मिला क्या वही जो सच लगता है। 
दिल की आवाज में वही मासूमियत का चेहरा।
काश कोई समझ गया होता।
दिल की आवाज को पढ़ सके होता।
आंखों की नूर का अवलोकन कर पाता।
काश कोई
भावनाओं की प्रबल धारा और शून्य धारा में बहना सीख लिया  होता।
लेकिन नहीं, हमेशा कि तरह यही समझ सका कि मैं अंततः प्रभात हूँ सबकी तरह मगर यूनिक


अगले कुछ घंटों की नींद के बाद कुछ लोग मिले जिनका जन्मदिवस भी उसी दिन था। कुछ मित्र मंडली में नए चेहरे कुछ पुराने.... सभी मेरे पास के खाली कोने को पाटते रहे। इस तरह से और वही सभी की शुभकामनाएं दिल को छू गयीं। कोई दिल से तो कोई मन से तो कोई हाथ से लिखा तो कोई काल्पनिक लिपि में। हाँ कोई तो बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कह दिया।
29 तारीख रात 9 बजे घर पर फ़ोन किया....पहली बार पिताजी ने ना कहते हुए भी शुभकामनाएं दे ही दिया वैसे ही ...हर बार दिल से दिल की तरह ही शुभकामनायें बिना कहे ही पहुँचती थीं...खैर यह भी एक ऐसा समय था जो भावनाओं की धारा में मुझे बहा ले गया ठीक उसी प्रकार जैसे किसी अमीर को कोई गरीब जीवन दान दे देता हो ..
फिर फेसबुक और व्हाट्सएप पर मित्रों की शुभकामनाएं...जिसने जो भी लिखा वहीं काफी है, इस भागदौड़ भरी जिन्दगी में ..समय निकल कर 2 आखर भी लिखना.

किसी तरह मेरे जन्म का उत्सव खत्म होने की बारी आई। एक बार और धक्का लगा कि ....2017 और इसके पहले क्या क्या हुआ।
मगर अचानक घड़ी की सुई ने मुझे बिना बताएं 12 से 12.5 बजा दिया यानी कि 30 तारीख जिसमें , वही बची खुची ख्वाहिश पूरी करने की फिक्र ।
2018 आएगा बिना रुके और शायद मेरे लिए काफी अच्छा हो।

अगर कभी मेरी आत्मकथा लिखी गयी या फिर मेरे जीवन का इतिहास तो 2017 मेरे जीवन का अहम भाग होगा । इसके बिना मेरी जिंदगी अधूरी होगी।
-प्रभात 

Friday, 29 December 2017

कविमन

अनगिनत बार हो गए इस आस में परीक्षा देने जाते
शायद वो इस बार परीक्षा केंद्र पर ही मिल जाए...
-प्रभात का सुप्रभात

उसकी आहट में मैं भरे बाजार में खो गया।
पहली मुलाकात और अंतिम विदाई की यादों में।
इस तरह जैसे उसने दूर से ही छू लिया हो
मैं बेताब होने लगा, सांसे जैसे रुक गयीं हो
तेजी से भागा और उसके आगे रुका
जैसे ही उसने चेहरा घुमाया और फिर
मैं रुका ही नहीं, वह कोई और ही थी.....
https://static.xx.fbcdn.net/images/emoji.php/v9/fd0/1/16/1f602.png😂
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शुभकामनाओं की चाहत में कविमन लिए प्रभात-
आजकल शब्दों से लड़ रहा हूँ, शब्द मिल नहीं रहे कि मैं अपने मन के भाव को व्यक्त कर सकूं, पिछले 1 घंटे से लिख रहा हूँ, मिटा रहा हूँ और फिर लिख रहा हूँ, फिर समझ आया...कि न लिख पाऊंगा कभी....लेकिन जिद है कि इतना तो कह सकता हूँ न कि क्या हो रहा है ऐसा....
इक सागर प्यासा है
इक कहानी अधूरी है
दृश्य बने कुछ ऐसे लगा कि जैसे मेरे भीतर से कोई बहुत खास बहुत दूर चला गया हो, वह जितना पास था अब उतना ही दूर भी। जिंदगी कभी-कभी उसे मेरे पास ले आती है मगर देखता हूँ वह पास है मेरे, बहुत आसपास, घूम-घूम के मेरे अंतर्मन में भी, लेकिन वह अनायास ही परदा डाल कर एक कहानी को मार रही है।
मैं हर बार जब भी पास आती है तो सहम जाता हूँ, आँखे विपरीत हो जाती हैं, ढाँढस के बीज लिए आसपास कोई नहीं दिखता, और इतना सब कुछ देखते ही देखते......एकाएक जैसे मैं ही टूट कर बिखर जाता हूँ.....कुछ भाग जो मुझे सम्पूर्ण बनाता है वह अपूर्ण हो जाता है।....मीन बिन पानी तड़पने लगती है....
पानी की तलाश में फिर से शब्द के पास आने की कोशिश करता हूँ, लेकिन वह फिर कहती है कि आसमान को अभी देखो नहीं उस पर परदा लगा दो, क्योंकि अगर तुम देखोगे तो बरसने लगेगा बेमौसम ही।
उस पर पहरा बिठा दो जो तड़प रहा हो सब कुछ होने के बाद भी.....केवल धर्म संकट की वजह से।
खैर न समझिएगा, क्योंकि मैं खुद भी अब कह नहीं पा रहा हूँ कि शब्द क्यों नहीं पद्य के रूप में बंध रहे। सोचा वही लाइन लिख दूँ। मगर ये जिदवश लिख दिया बस...वैसा नहीं लिख सका जैसा चाहता था । प्रयास जारी तो है....जल्द ही लिखूंगा शायद....शुभकामनाएं दीजिये।
-प्रभात

प्रभात की ओर से सुप्रभात...

प्रभात की ओर से सुप्रभात...


मधुर व कुछ बढ़िया सा राग सुनाने रागिनी आ पहुँची। शीतल और मुस्कुराती हवा के साथ आकर गले लगाकर मानो उसने मुझमें असीम सकारात्मक ऊर्जा का संचार करा दिया।
अभी उसे आये कुछ ही पल बीते थे कि जोर-जोर से गरजते हुए बादल के साथ बारिश होने लगी। आसमानी गगन का पता नहीं पर अपने घर में सभी मगन दिख रहे थे। कबूतरों का पता नहीं पर घोसलों में बैठे अंडों से निकले नवजात बाहर आने को बेताब हो रहे थे। थोड़ा सा धुंध छटा तो देखा कि आश्चर्यजनक रूप से खड़ा पहाड़ सफेद बर्फ की चादर लपेटे मुझे देख रहा था और रागिनी उसे देखकर शरमा गई और मेरे पीछे मुँह छिपाने लगी। मैंने हँसमुख रागिनी को जैसे ही पकड़ा वह खिलखिला उठी। तभी सामने ध्यान गया तो रोमांचक दृश्य सामने था। सफेद बर्फ से ढकी चोटी के बीच सूरज सामने आने की कोशिश कर रहा था। लालिमा लेकर वह रागिनी को छूने की कोशिश कर रहा था। इससे रागिनी में उमंग आने के साथ-साथ उसके हाव-भाव भी बदल गए। थोड़ी देर में रागिनी के राग के साथ ही कोयल की कूक ने समां बांध दिया। अब बारिश न रही और न ही वह लालिमा। इन सबके बावजूद रागिनी और मैं, पहाड़, सूरज और कोयल सभी हैं मगर सब अपनी दुनियां में मस्त अलग-अलग।


Tuesday, 19 September 2017

हम असल में किसी से कुछ नहीं कहते

 जरा मुझे भी सुनिए, हम नहीं कहते
हम असल में किसी से कुछ नहीं कहते
जिंदगी ने गम दिया तो भी सुकून है
हर कदम पर मजबूरियां है, नहीं कहते
बात हो रही है आपकी सरकार!! हम तो क्या हैं, इंसान.....न....शैतान........न.......तो फिर मेरे रिक्शे पर बैठी साहिबा की ......शब्द भइया...... न.....मैं असल में इज्जतदार कभी रहा ही नहीं। परिश्रम करते करते जिंदगी ने मुझे शाम के खाने के लिए गुटका दिया, वो भी लोकल.....भाड़े से देशी दारू कभी कभार.......और इस हड्डी को मजबूत करने के लिए .........लाल मिर्च वाला खाना, जो काले पानी में पकाया जाता है। ये तो रही खाने की बात और इज्जत की बात।
अब देखने और समझने की बात यह है.....
रात को रहने के लिए फुटपाथ की जगह (जिसे सफेद कुर्ते वाले अक्सर मेरे कर्म का नतीजा करार देते हैं) है....जहाँ से झनझनाते ट्रक की बयार, टायरों की रगड़ और उसमें पिसते आम लोगों की संवेदनाओं के बीच मेरी जिंदगी ।
हां मेरी जिंदगी......
जो असल में है तो दिखने में है तो बहुत बेकार
लेकिन अंदर से बहुत अच्छी भी है....
नींद आ जाती है बिना दवा लिए.....बिना पंखे के......बिना सोफे के .......बिना तकिये के....
बिना घर वाली के........बिना जिंदगी के।
अब पहनावे की बात भी सुन ही लीजिए...
नहीं नहाता ऐसा नहीं है, डेली नहाता हूँ, धूल से पसीने से और कभी कभार खून से ।
लेकिन शाम को अक्सर काली यमुना के किनारे बिन साबुन लिए 5 रुपये देकर शौचालय में जानी की आदत है.....कभी कभार पेनाल्टी के रूप में मेरी आधी कमाई वर्दी को चली जाती है.......गिड़गिड़ाहट में मेरे तन पर पड़े वो फटी कमीज का टुकड़ा भी फटकर रुमाल बन जाता है। दाढ़ी बढ़ जाती है तो पागल की तरह रोड पर चलते हुए मुझे एक रुपये की भीख किसी भक्त से मिल जाती है जो अक्सर चढ़ावे में हजार रुपये से कम मंदिरों में चढाना अपराध समझते है।
तो अब तो समझ गए होंगे मनुष्य के लिए 3 चीजें कौन सी जरूरत की चाहिए....खाना, रहना, पहनना
और ये तीनों ही से वंचित हम मनुष्य नहीं है.....इसलिए हम कुछ नहीं कहते केवल फुटपाथ पर रात को सोते हुए आसमां का एक चक्कर जरूर लगा लेते हैं..
फोटोग्राफी: प्रभात (कूड़े वाली)
फुटपाथ (गूगल)
-प्रभात



Thursday, 20 April 2017

प्रेम के शब्द

हवा का अहसास तब तक नही कर पाता जब तक वह किसी वृक्ष की डाली को झुका नही देता। ऊंची गगनचुम्बी इमारतों को गिरा नही देता। और तो और किसी शरीर मे ठिठुरन नहीं पैदा कर देता। इसी तरह से कुछ प्रेम को भी अनुभव किया जा सकता है। प्रेम का अहसास तब ही हो पाता है जब दो दिल किसी वजह से टकरा जाते है। जुड़ते है तो वह प्यार की खूबसूरती या उसकी गंभीरता या इन दोनों की वजह से उत्पन्न एहसास द्वारा अनुभव नहीं ही मिल पाता।
-Google image
अक्सर प्रेम एक ऐसा रोमांचक विषय बनकर मेरे दिलों दिमाग मे सैर किया करता है जहां एक ऐसी नदी बहा करती है जिसमें केवल विष भरा होता है। लेकिन उस विष को पीने के बाद धीरे- धीरे मन आराधक हो जाता है। उपदेशक हो जाता है। मोहित हो जाता है। स्वप्नों की दुनियां में खो जाता है। अक्सर थोड़ी देर के लिए मन सबसे ज्यादा स्थिर इन्ही एहसासों की तरंगों के साथ होता है। जहां इस तरह विचरण करती मनोदशा में अन्य सब कुछ द्वितीयक रूप में दिखने लगता है ।
प्रेम का पाठ किताबों में न तो बचपन में पढ़ा था और न ही अब। मगर प्रेम का खूबसूरत पाठ पिछले कुछ सालों में मैंने भरपूर पढ़ लिया है। हो सकता है आप बचपन में ही पढ़े होंगे। लेकिन एक ऐसे समय के साथ यह पाठ पढ़ने का अलग ही महत्व होता है। ये सच है इश्क हमने नही पढ़ा। यदि इश्क ने लोगों को बर्बाद किया है तो वहीं इश्क ने लोगों को साहित्य पढ़ाया भी है। हो सकता है इश्क ने कोई कहानी खत्म कर दी ही, किसी का जीवन ले लिया हो। लेकिन इश्क ने ही कुछ को इतिहास के पन्नों पर कैद भी किया है। अक्सर इश्क में लोगों को कहते सुना है, प्यार मत करना बहुत बेकार चीज है। शायद ऐसा कहने का आशय ही यही होता है कि इश्क का स्वाद ले ही लिया जाना चाहिए भले ही इश्क कोई करता नहीं यह स्वतः हो जाता है।
#प्रेम के शब्द (जारी है...)

Saturday, 1 April 2017

मित्रता

मित्रता
1. हे मित्र! कर्ण और दुर्योधन की मित्रता की बात करूँ या राम और लक्ष्मण की मित्रता की। सिनेमा में जय और वीरू की बात सुनोगे या देवदास और पारो की। आज तुम्हें सच सुनाते हैं क्योंकि तुम मित्रता की ही बात किया करते हो।
गूगल साभार 

इस संसार में जब माँ के पेट से बाहर आया तो अकेला महसूस नहीं हुआ क्योंकि अज्ञानता का भाव था, लेकिन उस समय मैं और तुम बहुत अकेले थे। इतना अकेले की वो माँ की कोख ही शायद एक सहारा था बाकि कुछ भी अपना नहीं था। भले ही लोग हमारे इन्तजार में खुशियां बाँट रहे हों या दुःख साँझा कर रहे हों। जब अकेले शब्द की पहचान होने लगी तब वह दिन था जब घर से स्कूल के लिए अकेले भेजे जाने लगे। जब छात्रावास की दीवारों के अन्दर कर दिए गये। जब गाँव से अकेले ही रेल में छोड़ दिए गए। जब भी अपने दादा-दादी, माँ-बाप, भाई-बहन से दूर हुए थे।

मुझे याद है जब मैं अपने गाँव से दिल्ली आया था तो मेरी उम्र 17 साल थी। दाखिला हंसराज में हुआ था। युवा पुरुष नहीं था बल्कि बहुत अपरिपक्व बालक था। ऐसा लगा था मानों पहली बार मैंने अपना पाँव मखमली चादर से काँटों पर रखा था। लक्ष्मी नगर से मेरे कॉलेज तक जाने के बस पकड़ने के रास्ते तो मेरे चचेरे भाई ने एक बार दिखा दिया था। राजपथ से होते हुए हंसराज कॉलेज आने तक कुल 2 बार बस बदलनी पड़ती थी। लेकिन मेरी अज्ञानता, सीधेपन और नादानियों ने मुझे अनगिनत बस बदलने पर मजबूर कर दिया था। अन्तोगत्वा मैं अपने अकेलेपन और इससे उत्पन्न कमजोरी और भय की स्थिति में सोचता हुआ कॉलेज तो पहुँच जाता था, लेकिन मेरा मन किसी अपने को सामने देखने के लिए हमेशा बेचैन रहा करता था। क्योंकि इस अकेलेपन की स्थिति में मेरे लिए जो अलग हुए थे वे सबसे करीबी दादा जी थे। फिर माता जी थीं, और इन दोनों से ही कुछ शब्दों में साँझा कर पाने की बात करना मेरे लिए नामुमिकन था। मेरे कभी कोई मित्र नहीं बने थे जो मेरे जैसे हो, जिससे कुछ कह पाता। यह अब तक हमउम्र में कोई करीबी न होने का एक गलत परिणाम ही था कि मैं जहाँ भी जाता था वहां मित्र किसी को बनने योग्य समझा ही नहीं। इसलिए ही शायद इस अकेलेपन के शिकार में केवल परिवार के अलग होने मात्र से ही मैं बस से लक्ष्मी नगर पहुँचने से पहले ही 5 किलोमीटर की दूरी पर उतर जाता था और अपने शब्दों के मुंह से निकल जाने की छटपटाहट में अपने आप से जोर जोर से अकेले में गगन तले जहाँ दूर तलक कोई न दिखाई देता था जोर-जोर से बोलकर अपने आप को सांत्वना दिया करता था। आखों से आंसू आने की तीव्रता को रोकता नहीं था और अपने आप को देखते हुए, अकेले बुडबुड़ाते हुए पुराने पुल से यमुना नदी को देखते हुए बड़े आराम से पार करते हुए निकल जाता था।

“मित्रता” शब्द का परिचय यहीं से होने लगा था। मित्र की जरूरत महसूस होने लगी थी। बहुत लोग मिलते थे, जो आस पास गुजरते थे। मिलते थे, लेकिन सब अनजान थे, किसी से बात करने का साहस नहीं था क्योंकि मित्रता के लिए सारे परिभाषा मेरे लिए किसी और के साथ फिट नहीं बैठते थे। रीज्नालिज्म की बात ही क्यों न हो, राज्य वाद ही क्यों न हो, कास्टज्म ही क्यों न हो और तो और कोई रिलेशन में ही अपने क्यों न हों। मेरे मित्रता के लिए कोई भी सही न था। शायद मेरी एक सच्चे मित्र के तलाश की सोच मेरे अकेलेपन को दूर न कर सकी। मुझे आज तक यही लगा कि मित्र सच्चे और अच्छे बनने के लिए बहुत आये, कुछ को मैंने खुद बनाने की जुगत की, कुछ ने खुद ही पहल किया, कुछ को एक दूसरे की जरूरतों ने बांधे रखा, लेकिन इन सबके बावजूद मेरे सच्चे मित्र की परिभाषा में मेरी मित्रता इतिहास में लिए जाने वाले नामों के बराबर की कभी न हो सकी। शायद जब भी मैं आगे-पीछे देखता हूँ तो क्षणिक मित्रता के रूप में तमाम उदाहरण सामने बन कर आये मगर एक समय के बाद बिन मित्र एकाकीपन का अहसास होता ही रहा। शायद इसलिए क्योंकि “मित्रता” शब्द की सही परिभाषा में मेरा आचार, विचार, व्यवहार, व्यक्तित्व, और समझदारी का किसी भी मित्र के साथ मेल नहीं हो सका। शायद इसलिए भी क्योंकि आज के समय में एक आदर्श मित्र के बारे में सोचना किसी अवस्वयंभावी कल्पना की तरह से कम नहीं है। मुझे पता है आप फक्र के साथ कहते होंगे कि मेरे मित्र है, मेरा बेस्ट फ्रेंड है, मेरा बॉय फ्रेंड है, मेरी गर्ल फ्रेंड है आदि-आदि जैसे बहुत सारे संबधों की उपमा शायद इन्ही के भरोसे दे दी जाती है। मगर वास्तविकता इनसे परे है।

मुझे पता है आज के समय में आचार्य राम चन्द्र शुक्ल के “मित्रता” नामक निबंध को कोई पढ़ कर यह स्वीकार नहीं करेगा कि मित्र यही है जो शुक्ल जी ने लिखा है, लेकिन शुक्ला जी के मित्रता नामक निबंध के अनुसार मित्रता की बात करने पर आप खुद ब खुद अकेले हो जायेंगे, नब्बे प्रतिशत लोग मित्रता के निबंध को अपने जीवन में नहीं उतार पायेंगे, लेकिन मुझे यह बात कहने में संकोच नहीं कि मेरे पास/ करीबी का मित्र कोई नहीं है। भले ही यह कथन मेरे तथाकथित मित्र मुझसे सुनकर और यहाँ पढ़कर अच्छा महसूस नहीं करेंगे और बहुत सारे प्रश्न करने लगेंगे, लेकिन मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि आप मित्रता के सही पर्याय को नहीं समझते और इसलिए आप और हम दोनों ही एक न एक दिन चाहे वह किसी के जीवन में खुशी का दिन हो, चाहे वह दुःख का समय हो सम्मलित नहीं होते और अपने आप को अकेला समझते हैं। इस प्रकार का अकेलापन आप जीवन के हर मोड़ में चाहे वह समय ही क्यों न हो। जब आत्मा शरीर को छोड़ कर चली जाती है, ऐसी स्थिति में आप अकेले ही होते है। यही जीवन का सत्य है। अकेला चलने वाला इंसान अपने अच्छे बुरे दिनों को लांघता हुआ अभ्यास द्वारा बच तो निकलता है, लेकिन कहीं न कहीं किसी मोड़ पर सहारा न लेने वाला मनुष्य भी सहारा पाने की जुगत में पड़ा रहता ही है और ऐसी ही स्थिति में “मित्र” की कीमत  का अहसास होने लगता है।

2. हे मित्र! आचार्य राम चन्द्र शुक्ल ने भी इस बात का पुरजोर समर्थन किया था कि ऐसे लोगों का कभी साथ न देना चहिये जो युवा अमीरों की बुराईयों और मूर्खताओं की नक़ल किया करते हैं, गलियों में ठठ्ठा मारते हैं और सिगरेट का धुआं उड़ाते चलते हैं, जो दुःख का बहाना बनाकर ड्रग्स और मदिरा का सेवन करने के आदी हो जाते हैं, जिनकी आत्मा अपने इन्द्रिय विषयों में ही लिप्त है, जिनका ह्रदय नीचाशयों और कुत्सित विचारों से  कुलषित है....यह नीति और सद्वृत्ति का ही नाश नहीं करती बल्कि बुद्धि का भी क्षय भी करता है। ऐसे लोगों को कभी मित्र न बनाओं जो अश्लील, फूहड़ और अपवित्र बातों से तुम्हे हँसाना चाहें।  हंसमुख चेहरा, थोड़ी बातचीत का ढंग, साहस और चतुराई देखकर लोग तनिक समय में ही मित्र बना लेते है या साथ बैठे मदिरा सेवन, सिगरेट फूकने वाले लोग अक्सर ही मित्रता कर लिया करते हैं......,लेकिन इसे मित्रता नहीं बल्कि शत्रुता समझी जानी चाहिए।  मित्रता के लिए विश्वासपात्र शब्द का बहुत महत्त्व है, जिसे ऐसा मित्र मिल जाए उसे समझना चाहिए कि उसे खजाना मिल गया। हमें अपने मित्रों से यह आशा रखनी चाहिए कि वे उत्तम संकल्पों में हमें दृढ करेंगे, दोष और त्रुटियों से हमें बचायेंगे, हमारे सत्य, पवित्रता और मर्यादा के प्रेम को पुष्ट करें, जब हम कुमार्ग पर पैर रखेंगे, तब हमें वह सचेत करेंगे, जब हम हतोत्साहित होंगे तो हमें उत्साहित करेंगे. सारांश यह है कि हमें उत्तमतापूर्वक जीवन निर्वाह करने में हर तरह से सहायता देंगे।

मित्रता के लिए यह कतई जरुरी नहीं कि दोनों मित्र आपस में एक ही प्रकृति के हों, एक ही प्रकार का व्यवहार रखते हों, एक ही सोंच रखते हों बल्कि मित्रता दो विपरीत दिशाओं के लोगों के बीच ही सफल हो पाती है जैसे राम और लक्ष्मण की, दुर्योधन और कर्ण की। अगर आप मित्रता किसी ऐसे युवा से करना चाहते हों जो असभ्य हो, मदिरापान का सेवन करता हो, जो सिगरेट दिन में कई बार फूँक डालता हो, जो हमेशा परेशान रहता हो...तो उससे मित्रता यह सोच कर कतई न कीजिये कि आप उसे सुधार देंगे...बल्कि ऐसा भी हो सकता है आप उसका साथ पाकर बिगड़ जाएं...जैसा कि अक्सर होता है कि ज्यादातर लोग मांसाहार और मदिरा सेवन अपने युवा दिनों में अपने ऐसे ही साथी के संसर्ग में आने से शुरू कर देते है, क्योंकि दोस्त नामक शब्द का अर्थ शायद यहीं तक सीमित होता है और ऐसा न करने पर दोस्ती तोड़ने का भय पैदा करने की कोशिश करते हैं...दरअसल ऐसे युवा कभी दोस्त बन ही नहीं सकते...या ऐसी मित्रता कभी मेरी परिभाषा में शामिल हो ही नहीं सकती। दोस्ती में कभी भी कोई ऊंच-नीच होने की भावना नहीं होती...जो जैसा होता है वैसे ही विचार लेकर आगे बढ़े तो ही बेहतर होता है। दोस्त बस एक दूसरे को सही रास्ते में चलने के लिए विवश करते हैं। इसलिए ही मित्रता को उचित पैमाने और नियम के अंतर्गत बांधते हुए ही आगे बढ़ाने चाहिए ताकि आप एक दूसरे के आनंद में शरीक हो सकें और मित्रता का श्रेय ले सकें लोगों के सामने मित्रता का पर्याय बन सके। एक दूसरे की अच्छाइयों को ग्रहण करते हुए सुमार्ग के रास्ते पर चल सकें ताकि आने वाला भविष्य भी बेहतर बन सके। मित्रता आभासी दुनिया से शुरू करके आभासी दुनिया पर ख़त्म हो जाती है, लेकिन जब आभासी दुनिया से शुरू होकर जब आपके वास्तविक जीवन में उतर आती है तो वह मित्रता होती है वह इसलिए ही सफल होती है क्योंकि आभासी दुनियां में भी मनुष्य के आचरण का पता लग ही जाता है।

मित्र धर्म का पालन करना आजकल हर किसी के बस की बात नहीं इसलिए मित्रता भी क्षणिक ही रह जाती है। वह एक समय के बात किसी दूसरे व्यक्ति के साथ दूसरे रूप में जुड़ जाती है। मित्रता के अर्थ बदल गए हैं, जिसे शायद सही रूप में समझने के लिए मित्र के दोनों पक्षकारों की जरूरत होती है।

-प्रभात 

Wednesday, 8 March 2017

सच्चाई

सच्चाई से रू-बरू तो सब ही होते है पर एक सच्चाई से शायद नहीं। यह राज भी हो सकता है। वह है-
"कोई किसी को कुछ नहीं जानता तो कोई फर्क नहीं पड़ता पर अगर कोई किसी से परिचित है या उसे जानता है। इन सबके बावजूद उसे किसी बात को लेकर गलतफहमी हो गयी हो और वह नहीं समझता या नही समझना चाहता। इसलिए ही आगे उसके कदम जानने वाले व्यक्ति के विपरीत दिशा में बढ़ने लग जाते है तो गलतफहमी दूर करने के प्रयास में लगे प्रिय को कैसे मन में कचोटता है और क्या करे उसे समझ नहीं आता।"

शायद इसलिए कहते है कि किसी को समझना एक द्विपक्षीय प्रक्रिया है और यह दुनिया का सबसे मुश्किल काम है।




Sunday, 19 February 2017

अंतिम ख़त

प्रिय रागिनी,
खतों के इस सिलसिले में मैंने अभी तक सैकड़ों ख़त लगभग तुमको लिख लिए है...कुछ को तुमसे छिपाया है कुछ को सबसे छिपाया है....मतलब तुमसे छिपाया तो इसका मतलब खुद से छिपाया...लगता है मैं तुमसे प्यार करता हूँ...अब तुम्हें तो यकीन हो गया होगा....लेकिन मुझे लगता है इस बार रागिनी तुम पत्थर नहीं मैं पत्थर हूँ”....क्योंकि तुम प्यार करती हो और मैं शिला बनकर तुम जैसे पवित्र नदी का मार्ग बंद कर देता हूँ...मैंने इसलिए ख़त लिखा की हर आशिकी की कहानी में प्रेमिका कुछ यादें अक्सर छोड़ जाती है...तुमने भी छोड़ दिया है भौतिक और नैसर्गिक दोनों ही बातों में....यादें मगर किसकी.....कुछ गुलाब के फूल की तो उसकी कुछ खुशबूं भी....कुछ गीत.....कुछ चंचल मन में थिरकती जिस्म का कोई इक हिस्सा और उस पर मधुर सौन्दर्य का एहसास कराती सूरत पर हंसी की वो गहराई, जिससे मैं ही शर्मा गया था...कुछ पल के लिए.

लिबास पर महक अब भी बरकरार है तुम्हारी साँसों की. तकिया बनकर संभाला तो मैंने ही था.....उन यादों का क्या, उन एहसासों की जो मेरे साथ २४ घंटे प्रतिध्वनि के साथ मुझसे बाते करवाते है .... क्या उनकी हत्या कर दूँ ...नहीं न....
तुम्हें .....याद है न तुम्हारे दांतों की कहानी ...अब मुझे तो याद नहीं...अक्सर बतियाते रहते है सुबह सुबह मेरे और तुम्हारे टूथब्रश इक साथ ही..पता नहीं क्या कहते है ...शायद यही कि तुम मुझे छुपा क्यों नहीं देते....मेरे और तुम्हारे बीच झगड़ा हो गया है उन्हें भी मालूम है.....इन सबके बावजूद कुछ न कुछ पता नहीं क्यों दिन रात तुम्हारी याद दिलाते है....शिला बनने के बाद भी मैं टूटना चाहता हूँ और मिट्टी में मिल जाना चाहता हूँ ...ताकि इश्क में दूरियों का प्रेम न तो अहसास करा सके.... न पास आ सके और न ही दूर जा सके .....न ही कभी मिल सके और न ही कभी बिछुड़ सके.....हाँ मैं टूट जाऊँगा जल्द ही देखना ये है कि मुझे तोड़ने के लिए अब किस ताकत का इस्तेमाल होगा और कौन करेगा.....सबसे पहले तुम या और मैं खुद ही......

चिंता मत करों रागिनी....तुम्हारे लिए इस वर्ष का आख़िरी ख़त शायद यही है.....इसके बाद बसंत ऋतु खत्म और उसी के साथ ये प्यार भरा ख़त भी लिखना बंद हो जाएगा....माफ़ करना मुझे परन्तु लोगों की इच्छा ही यही है....प्यार और इजहार करने का समय तो होना ही चाहिए.
तुम्हारा 
प्रभात
(तस्वीर गूगल से साभार)

Tuesday, 31 January 2017

रागिनी तुम पत्थर हो?

रागिनी तुम पत्थर हो?
प्रिय रागिनी
         आज रागिनी अपने आपको संभाल नहीं पा रहा हूँ और मेरी प्यारी रागिनी आज तुम्हे मैं पत्थर बता रहा हूँ। तुम्हारा न तो अपमान कर रहा हूँ न ही तिरस्कार। भला कोई प्रेमी कैसे अपनी प्रेमिका का अपमान कर सकता है और किसी के द्वारा करते हुए देख सकता है।
गूगल आभार 
देखो रागिनी, आज तुम जिस रूप में हो, उसमें तुम्हे पत्थर न कहूँ तो क्या कहूँ? तुम अपने आपको पत्थर नहीं मानोगे। लेकिन क्या ये सही नहीं कि तुम निर्जीव पत्थर की भांति ही हो। मेरे और तुम्हारे संवाद में बस इतना ही तो है मैं कहता हूँ और कहता रहता हूँ। संवाद इसलिए होता रहता है कि तुम कुछ बोलते नहीं लेकिन मैं अपनी सकारात्मक भावनाओं को हमेशा तुम्हारे उत्तर के रूप में ले लेता हूँ । तुम पत्थर ही तो हो कि तुम अपनी भावनाओं का इजहार करते ही नहीं और करते भी हो तो बस वैसे ही कि मैं अपना हाथ गुस्से में आकर तुम पर उठा लेता हूँ और तुम मुझ पर उलटे ही चोट कर देते हो।तुम प्रतिक्रिया देते भी हो तो ऐसी प्रतिक्रिया कि मेरी हिम्मत नहीं होती कि तुमसे दुबारा बात करूँ।
तुम पत्थर हो लेकिन वह पत्थर जिसे मैं पूजता आया हूँ। विश्वास किया हूँ। और उसके बाद भी तुमने मुझे हर विवशता में अपने आप से अलग किया है। मैं तुम्हारी शरण में तब तब गया हूँ जब जब मुझे अंदर से बहुत अकेलापन महसूस हुआ है। ऐसा हुआ भी है कि थोड़ी देर के लिए स्वीकार भी किया परंतु तुमने मुझे अंत में पत्थर ही अपने आप को बता डाला कि बात कितनी भी कर लो पर मैं तो पत्थर हूँ और पत्थर बन कर रहूंगी। क्या फायदा, तुम क्यों पूजते हो?
यह भी सही ही है आखिर जब तुम्हे पूजने वाले लोगों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जाए तो आपकी भक्ति के लिए एक भक्त कम भी हो जाए तो क्या होगा। रागिनी! तुम्हारे साथ भी कुछ ऐसा ही तो नहीं है? लगता है और तुम हमेशा ऐसा दिखाने का प्रयास करती आयी हो।
किसी पत्थर को पूजना और तुम्हारी खुद की महत्ता को न समझना रागिनी ठीक वैसे ही है जैसे एक निर्जीव पत्थर करता आया है। तुम तो एक ऐसी पत्थर के समान हो जो अपने आप में हर तरीके से सम्पूर्ण हो। तुम्हें क्यों ऐसा नहीं लगता कि किसी प्यार को ठुकराना बहुत ही गलत बात है। अगर वह प्रेम पूरी श्रद्धा से की गयी हो। जिंदगी में जो भी होता है वह अच्छा ही होता है। शायद तुम्हारी भी गलती न हो ऐसा भी हो सकता है कि तुम वही निर्जीव पत्थर हो जिसमें कोई भावना न हो, और जो केवल नदी में पानी के बहाव को रोक देता हो। अच्छे अच्छे लोगों को बैठने के लिए जगह देता हो और थोड़ी देर के बाद बिछुड़ जाता हो। लेकिन एक बात सोंचो कि ऐसे बहुत से लोग मिलते है कि वह बहती नदी में पास जाकर पत्थर पर बैठ जाते है और आनंद लेते हुए ऐसा सोंचते है कि पत्थर पर बैठकर कुछ तस्वीरें ही ले लिया जाए। और ऐसा करने के बाद वह पत्थर एक तस्वीर के रूप में उनके पास आ जाती है और वे पुनः दूसरी तस्वीर दूसरे पत्थर पर बैठकर खिचातें है और वे यह भूल जाते है कि वह तस्वीर कभी मैंने उस पत्थर के साथ ली थी। मैंने तो उस पत्थर को दिल में बिठा लिया है। मैं तो उसी एक पत्थर की शरण में दिन रात गुजारना चाहता हूँ। लेकिन इसलिए कि तुम पत्थर हो? ऐसा करने में असमर्थ हूँ ।
कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम सच बोल रही हो कि तुम पत्थर हो? और ऐसा करने के लिए विवश मात्र हो। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है और तुम पत्थर नहीं हो, तुम्हारे हजार बार भी यह कहने पर कि मैं पत्थर हूँ, ऐसा मानने को तैयार नहीं हूँ। परंतु शायद कभी कभी भक्त भी नाराज हो ही जाता है । जब मर्यादा पुरुषोत्तम राम समुद्र के पास बैठे हुए मार्ग पाने के लिए तपस्या करते रहे और उन्हें भी 3 दिनों बाद कुछ भी हाथ नहीं मिला केवल निराशा । और अंत में उन्हें ब्रह्मास्त्र चलाने के लिए धनुष निकालना ही पड़ा। तो मैं कौन हूँ ? मेरी भी नाराजगी लाजमी है। परंतु मैं धैर्य का सागर भी हूँ, और हर तरीके से दयावान और प्रेमी तो मैं ब्रह्मास्त्र भी चलाऊंगा तो भगवान राम जैसे ही, कि उस दिशा में अहित होगा जहाँ जरुरत होगी और औषधि उगेगी लोगों का कल्याण भी होगा। उससे इस पृथ्वी पर रह रहे किसी भी जीव का अहित नहीं होगा। शायद यही मेरा प्रेम है.
तुम्हारा प्रिय
............
प्रभात

२७ जनवरी, १७

Monday, 30 January 2017

मेरी प्रिय डायरी,

मेरी प्रिय डायरी,
वो दिन याद है न जब मैं तुम्हें चाँदनी चौक पर मिला था। बहुत नहीं जानता था तुम्हारे बारे में ...बस इतना जानता था कि तुम मोटी हो और साधारण। इसलिए तुम्हें मैंने उठा लिया था। नहीं पता था कि तुम हर वक्त पर मेरा साथ दोगी। तुम तो अच्छे दोस्त की तरह मेरे बिस्तर पर तकिये के पास दुबक कर मेरा इन्तजार करते हो। मैं इतना बुरा हूँ कि तुम्हें हमेशा सबसे बाद में और बुरे वक्त में ही याद करता हूँ।
 -तस्वीर गूगल से साभार

तुमसे छिपाऊं भी क्या। तुम तो जानती ही हो। उस अवसर पर भी तुम्हे नहीं याद किया जब मैं सबसे ज्यादा खुश था। तुमसे संवाद करने की कोशिश भी किया तो बस 1 पंक्ति में समेट दिया। जब बर्फ ही बर्फ थे, वादियां हसीं थी। नैसर्गिक प्यार था। हवाएं चल कर मेरे मन को शीतल कर रही थी। नदी बगल से बह रही थी। चांदनी रात में खुले आसमान तले पत्थर पर बैठकर झरने की आवाज सुन रहा था। ऐसे समय में भी तुम्हें नहीं याद किया। लेकिन तुम जरा भी नाराज नहीं हुए और हर प्रकार की कलम को तुम पकड़ने के लिए महीनों इन्तजार करते हो।
तुमसे तो हर बात भी नहीं बताता लेकिन तुमने कभी मना नहीं किया कि मुझे छोड़ दो। तुम्हें तो लोग हर साल छोड़ देते हूँ लेकिन अभी भी मैं तुम्हें ही पकड़ा हुआ हूँ। पता है अभी तुमसे बहुत बात करना है मुझे...मुझे विश्वास भी है तुम ही एक ऐसी प्रिय दोस्त हो जो मुझे अच्छे से सुन लेते हो, बाकि दोस्त ऐसा नहीं कोई ....जो मुझे सुन सके। दुनिया का सबसे खराब इंसान मैं ही बन जाता हूँ, अगर किसी को अपना समझ चर्चा कर भी लेता हूँ। मैं हर बुरे वक्त में भी सबसे पहले अपने इस दुनिया में मिले हज़ारों दोस्तों के बारे में सोंचता हूँ और कोई ऐसा नही दिखता, जिससे मैं कुछ साँझा कर सकूँ।
बहुत सोंचने पर मेरे कुछ अपने लोग ध्यान आते है, जिन्हें मैं अपने आपको उनकी अमानत समझता हूँ, इसलिए भी उनसे नहीं कुछ कहता कि उन्हें तकलीफ हो जायेगी....और बात तो ये भी है कि मुझे शर्म भी आ जाती है। मैं पितृ भक्ति में खूब विश्वास रखता हूँ इसलिए मैंने हर जगह पिता को अनुसरण किया है। माता से भी छुपा लेता हूँ कुछ न कुछ क्योंकि अपनी अम्मी इस हालात में नहीं होती कि सब कुछ सुन सकें। इन सबके इतर तुम ही अंत में ध्यान आते हो। लेकिन तुमने कभी बुरा नहीं माना।
ये दोस्ती भी तुमसे एकतरफा ही है क्या?? कि अपने स्वार्थ के लिए तुमसे हाथ मिला लेता हूँ और तुम हो कि मुझसे इतना प्यार करते हो कि कभी नहीं समझे कि मैं स्वार्थी हूँ। शायद इसलिए कि तुम्हें तरजीह तो देता हूँ आदि से अंत तक...अब तक। आगे भी तुम ही सुनोगे और सुनाओगे। संवाद जारी रहेगी दोस्त तुमसे....इसलिए कि तुम मेरे अपने हो। और सबसे अच्छी बात कि तुम्हें पकड़कर ऐसा लगता है कि मेरा सर दर्द भी ख़त्म हो गया है, मेरी सोंच खुल जाती है। मेरे आंसुओं से एक नयी रचना का सृजन हो जाता है। एक नयी प्रेरणा जन्म लेती है। हौंसलों को नया आयाम मिल जाता है। इसलिए दोस्त नाराज मत होना....चलो खुद हो भी जाना पर मुझे तो मत ही करना दोस्त......
@प्रभात



यात्रा वृतांत

यात्रा वृतांत
        चलिये दोस्तों आगामी 6 जनवरी को परीक्षा खत्म होते ही कहीं घूम लिया जाए। बहुत ठण्ड है, ऐसी जगह चले जहाँ बर्फ देखने को मिल जाए। खूबसूरत वादियां हो, जहाँ हम सब प्रकृति प्यार में पड़कर कुछ समय के लिए उसी में खो जाए। बहुत बड़ी पहाड़ी हो। जहाँ नदियां पास से होकर बहती हो। अच्छा तो शिमला चल लिया जाए? किसी ने कहा। नहीं डलहौजी चल लिया जाए। दूसरे ने राय दिया। आखिर डलहौजी, धमर्मशाला और खासकर मैक डोनाल्डगंज जाने पर हम 16 लोगों की सहमति बन गयी। जैसे जैसे समय पास आता गया, साथ घूमने जाने वालों की संख्या दिन प्रतिदिन घटती चली गयी जैसे बाढ़ आने के बाद एकाएक उत्साह नजर आता है और धीरे धीरे उसका भयावह रूप समझ आता है। जैसे जैसे दिन बीतते जाते है तो पानी 1 - ,1 फुट कम होता जाता है और 3-4 दिनों बाद बिल्कुल कम हो जाता है, जब पानी थोड़ा बहूत ही बचा होता है तो सब कुछ अस्त व्यस्त सा गन्दा माहौल देखने पर प्रतीत होता है। ठीक वैसे ही स्थिति हमारी 6 तारीख यात्रा पर जाने से पहले 4 तारीख को हो चली थी। अब साथ चलने वाले घुम्मकड़ों की संख्या मात्र देखने में 5 ही बची थी।




       4 तारीख को ही मनाली जाने का प्लान बनता है। देव प्रभाकर जी की कृपा से गाड़ी भी सायं बजे के आसपास जुबली हाल के पास आकर खड़ी हो जाती है। कुल लोग जुबिली हॉल के गेट से जनवरी को प्रस्थान करती है। जय हनुमानजय भोले जैसे जयकारों के साथ गाड़ी आगे बढ़ने लगती है।
दिल्ली से आगे हरियाणा में जाकर एक बार हम सभी रुकते है। पार्टी मूड में सभी सामान खरीदते हुएकोल्ड ड्रिंक्सउसका चखना अर्थात चिप्स के साथ खाते पीते हुए आगे बढ़ते है। अब कार करनाल रोड पर रुकती हैहम सभी उतरते है फोटोग्राफी होती है। मेरेजयदीपआकाश और देव के अतिरिक्त बचे ड्राइवर और अपने अब खास मित्र रिंकूअतिरिक्त साथी राहुल जी से अब बातों ही बातों में बहुत अच्छी दोस्ती हो जाती है। सभी लोगों में कोई भी एक दूसरे के लिए अनजान नहीं रहा। रात्रि का खाना खाते है और आराम से कार में बैठ जाते है। गाड़ी टोल टैक्स से होकर गुजरती हैरात्रि के बज चुके होते है। टोल बूथ पर प्रेस का कार्ड दिखाया जाता हैऔर टोल वाला थोड़े पैसे लेते हुए अपनी गाड़ी को आगे पास कर देता है। अगले टोल आने की तैयारी में देव जी ने डी एस एल आर कैमरा गले में लटका लिया। मैंनेआकाश जी और सभी ने अपनी स्थिति पत्रकारों की तरह बना लिया। प्रेस का कार्ड रिंकू भाई ने संभाल लियाअब शायद उस स्थिति में अपने आपको संभाल लिया थाजैसे कि थोड़े समय पहले गाड़ी चलने से पहले फेसबुक पर तीन फोटो आकाश जी ने डाल रखा थाकैप्शन था..."पत्रकारों की टोली मनाली रवाना होते हुए।"
रात भर रुकते हुएचिप्स खाते हुएदिल्ली के पर्यावरणीय प्रदूषण का धुंआ पीते हुए आगे हरियाणाचंडीगढ़ होते हुए कोल्ड ड्रिंक्स का आनंद लेते हुए हम सभी आगे पहाड़ों की ओर बढ़ चुके थे। कई मौकों पर प्रेस की अपनी गाड़ी रोक कर बेइज्जती करने की कोशिश की गयी परंतु हमारा बाल भी बांका नहीं हुआ। पहाड़ों की ओर आते ही कार में स्पीकर में लगे गाने का आनंद 100 गुना आने लगा था। जीता था जिसके लिए.....पर तो बवाल हो जाता था। कारकार न रहते हुए एक स्पीकर में गाने चलने की वजह सेएक क्लब बन चुका था। हम अनुशासित पत्रकारों का।
पहाड़ों की ओर प्रस्थान करते हुए देव भाई ने अपना क्रांतिकारी स्लोगन पेश कियाक्या....छोड़ना गलत थाहम सब एक साथ बोलते है कि... नहीं । इस पर भी देव भाई को हम सभी का उत्तर हजम नहीं हुआ और कहते हैएक बार और पूछना चाहता हूँ क्या......खैर ये विषय नहीं था। विषय था यात्रा वृतांत का।
....फिर मिलते हैअभी तो मनाली की ओर जा रहे है।

-प्रभात
नोट: ध्यान दीजिए अब तक जो कुछ पढ़ा हैशत प्रतिशत सच्चाई के साथ लिखा गया है। कुछ भी छुपाया नहीं गया है।


Wednesday, 11 January 2017

कहानी प्रेम की...

कहानी प्रेम की...
अपनी रसोई के दुकान पर मिलने का दिन था। सौरभ के आने का इंतजार था। रात के 7 बज गए थे। ठण्ड का दिन था। डिनर तो साथ ही करना था। बहुत खुश था। उसने कॉल पर अभी अभी बताया था कि अरुण भाई मैं थोड़ा लेट हो गया हूँ आ रहा हूँ, पर आधे घंटे और लगेंगे। इंतज़ार करने की आदत तो थी ही इसलिए अरूण बैठ कर वही इन्तजार करने लगा। उसने सोंचा क्यों न व्हाट्सएप पर ही चैट करके वक्त बिता लिया जाये। इतना सोंचते ही क्षण भर में ही मानसी का कॉल आता है। अरूण कहाँ हो? किसके साथ हो? आज कोई मेसेज भी नहीं न ही कोई कॉल। जल्दी आओ व्हॉट्स एप पर । एक साथ इतने सारे सवाल सुनकर लगा कि जवाब दे देना चाहिए परंतु ठीक है ! इतना कहकर उसने व्हाट्स एप ओपन किया , मानसी के 20 मेसेज पड़े थे। ...और सौरभ के 2 मैसेज ..उसने सौरभ को उसके इस मैसेज का रिप्लाई कर दिया कि आज मैं तुम्हारे रूम पर ही रुकूँगा। सौरभ को रिप्लाई इतना ही लिखा कि हाँ दोस्त रूक जाना, नही भी रुकते तो रोक लेता। आखिर दोस्त से मिलना भी तो बहुत दिनों बाद ही तो हुआ था।
अब मानसी के मैसेज पढता ही कि उतनी देर में... क्या हुआ जैसे 10 मैसेज और मिल गये। अरुण ने कहा अरे रुक जाओ प्रिये। वेट.....!!! ,मानसी ने कहा ...ओके।। अब मैसेज पढ़कर रिप्लाई क्या ही करता ? आज तो उसे मिलना था। मानसी ने सुबह ही उसे मैसेज किया था आज हम मिलकर साथ डिनर करेंगे। पिछले 2 साल की दोस्ती और एक दूसरे को इस तरह से चाहना शायद जरुरत भी था। आज से 2 साल पहले ही सौरभ से भी मुलाकात होगी। सौरभ और मानसी तब एक दूसरे के अच्छे दोस्त थे, इतना ही पता था अरूण को। और तभी ही एक दिन बात ही बात में सौरभ ने, मानसी का नंबर मांगा था और सौरभ ने अपने प्रिय दोस्त अरूण को तुरंत ही नंबर दे दिया था और सबसे पहली बार बात भी सौरभ ने ही कराया था।
मैसेज में सॉरी लिखकर अपना व्हॉट्स ऍप ऑफ कर लिया यह कहते हुए कि मानसी आज सौरभ के साथ हूँ बाद में बात करता हूँ। कुछ समय बीत गए थे। अब अरुण को सामने से सौरभ आते हुए दिखा। मुस्कुराकर गले लगाया और दोनों ही बैठ गए। पानी पीते हुए एक दूसरे से बात चल ही रही थी, कि अचानक ही मानसी का कॉल आ गया। अरूण ने फोन उठाते हुए कहा कि हां मैं बाद में बात करता हूँ दोस्त के साथ ही हूँ। सौरभ ने अरुण से पुछा: अपनी गर्ल फ्रेंड से मिलवाओगे नहीं? अरे क्यों नही सौरभ, कल ही मिलवाता हूँ। सौरभ मुस्कुराया । कुछ यादें कचोट रही थी सौरभ को। क्योंकि सौरभ जिसे प्यार करता था वह लड़की उसे छोड़ गयी थी। कारण उसे आज तक नही पता चला। डिनर करके आने के बाद सौरभ रात भर अपनी चाहत के बारे सोंचता रहा वहीं अरूण अपनी मानसी से लगातार बातें करता रहा। मानसी अरूण से बहुत ज्यादा प्यार करती थी। वह कल भी आ गया जब सौरभ से मानसी को मिलना था नाम और चेहरा दोनों ही नहीं पता था। सौरभ के सामने अरूण जैसे ही मानसी को लेकर आता है। सौरभ पहली नजर में मानसी को देख अपने आपको संभाल नही पा रहा था। फिर भी बीच बीच में हल्की झूठी मुस्कराहट के साथ वह सौरभ और मानसी का साथ दे रहा था। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उसकी चाहत आज अरूण की गर्ल फ्रेंड बन चुकी है। जल्दी -जल्दी में वहां से निकलने के बाद सौरभ कुछ सोंचता है।अरूण आज अपने साथी को उदास देख पूछ लेता है। सौरभ आज तुम काफी उदास लग रहे हो जबसे मानसी से मिल कर आये। क्या बात है दोस्त? सौरभ अपनी कहानी अब बताता है।.... मानसी से मुझे प्यार था परंतु मानसी मुझे नहीं पसंद करती थी। जब तुमने नंबर माँगा था उसके बाद से ही मानसी मुझसे बात भी करना बंद कर दी थी। आज इस हालात में तुम्हारे साथ मुझे देखा नहीं जा रहा।
इतना सुनते ही अरूण ने कहा, मित्र मैं छोड़ दूंगा मानसी को .. बोलो तुम्हारे लिए और क्या कर सकता हूँ । इतना कहते हुए वह ऊपर आसमान की ओर देखने लगा। पल भर में दबे आँखों में एक साथ पानी के बुलबुले आँसुओं के रूप में सामने आ गए। इसके साथ ही सौरभ की आँखे भी नम हो गयी, दोस्त का इस तरीके का त्याग देखकर उसके विवशता के लिए धन्यवाद तो देना ही था साथ ही साथ उसका अपने प्रेमिका से प्यार का पक्ष लेने में जरा भी संकोच न हुआ। अब सौरभ नम आँखों में ही उसे समझा देता है। दोस्त तुम किसी तरीके से अपने आप को उससे जुदा कर लो। खुद ब खुद तुम। अरूण आखिर मना भी कैसे करता वह दोस्त के लिए अपनी चाहत को छोड़ देना ही उचित समझता था। उसने अगले दिन ही उसने वह सब बोल दिया जो शायद किसी भी सम्बन्ध को बिगाड़ने के लिए काफी ही था। अगले सुबह जब अरूण ने मानसी का कॉल उठाया तो मानसी बोली आज खुश तो बहुत होंगे तुम्हारा दोस्त जो आया है...मानसी मेरी बात सुनो एक बात कहना है...अरूण ने तेजी से 1 सांस में बोलना शुरू किया ही था...और उधर से मानसी को लगा कि वो शायद कुछ और अच्छी अपनी जिंदगी के संबंध में बात करने वाला है.
अरूण ने बहुत ही जोर जोर से बोला ..मानसी सुनों, देखो तुम मेरी जिंदगी के बारे में कुछ भी 1 परसेंट भी नहीं जानती। मुझे जैसा समझती हो वैसा नहीं हूँ मैं। मैंने जो जो बताया था वो सब झूठ बोला था। मुझे तुमसे प्यार नहीं है। न तो पहले कभी करता था और न ही अभी करता हूँ।
मानसी सिसकते हुए शायद अब संभलने की सोंच ही रही थी कि एकाएक जैसे बादल की गर्जन होती है वैसे ही जोर से बोलते हुए आँखों में पानी को दबाये हुए अरूण ने कहा; मानसी तुम्हे क्या लगता है। माफ़ करना पर मैं तुमसे इसलिए कम बात करता हूँ क्योंकि मैं ज्यादातर समय उससे बात करता हूँ जिससे मेरी शादी होने वाली है।
इतना बोलकर अरूण ने एक बात और कहा कि अब तुम मुझे न कॉल करना और न मैं तुम्हे। 
मानसी अब कुछ बोलने लायक तो नहीं रही बस वह सामने से आते हुए अपने पुराने दोस्त सौरभ से पूछ ही बैठी अरे सौरभ ...कुछ बोला तो नहीं। परंतु तब तक सौरभ ही पूछ बैठा कि आँखों में आंसू आज कैसे? क्या बात है बताओ?...
-प्रभात