Saturday, 30 December 2017

मेरी डायरी के खुले पन्ने

प्रभात आपको जन्मदिन की शुभकामनाएं।

आपको पता है, आप 27 साल के हो चुके।  कैसी रीत है इस संसार की, कि यहां पर मानव अपने जन्मदिन पर खुशियां मनाता है इसलिए कि आज के दिन वह पैदा हुआ था। इसलिए कि आज उसकी उम्र एक साल घट गयी है। इसलिए क्योंकि आज के दिन के बहाने वह अपने उस पल को इस तरीके से जीना चाहता है कि शायद उसकी खुशियों में एक सहारा बन जाये कोई जो उस पल का गवाह बने जब केक कटे और प्यार से उस केक को खिला कर गले लगे। फिर बोले हैप्पी बथर्डे प्रभात।
क्या????
यही न कि जीवन के हर साल हम एक मित्र से मिलते हैं नए मित्र, नई सखी और नए लोग मिलते रहते हैं। हर समय कोई एक जाने वाले की जगह हाथ थाम लेता है। 

कुछ नहीं, आज के दिन यानी 28 दिसंबर 2016 को मैं चैन की नींद सो गया था। अगले दिन सुबह से लेकर शाम की महफ़िल ने बस इतना बता दिया था। कि जिंदगी न मिले दोबारा।

माँ के गर्फ़ से बाहर आकर बिल्कुल भी ऐसा नहीं लगा था कि जन्म और मरण की रीति भी चलती है। हां यह प्रक्रिया तब समझ आयी जब सुख दुख का एहसास हुआ। जब सोचना हुआ कि माँ और पिता का अर्थ क्या है जब पता चला कि जन्म की प्रक्रिया क्या है, जब पता चला कि शादियां क्या होती हैं, जब पता चला कि लड़का और लड़की में कुछ अंतर है। तब तक तो बिल्कुल नहीं जब मैं 10 वीं क्लास बोर्ड से पास नहीं कर लिया। क्योंकि मैं पांचवी क्लास तक फ्रॉक पहनने का जिद करता रहता था। 
12 वीं तक तो जनन की जानकारी भी अधूरी ही थी। रिप्रोडक्शन अध्याय तो समझ से बाहर था। जानकारियों का अभाव कहें या यूं कहें परदे में रहने की आदत थी।

29 दिसंबर 2017 का दिन आने वाला था और लगा कि जैसे कोई आहट दे रहा हो। कुछ चिंतन मनन करने के लिए। 25 तारीख से ही मन कर रहा था कि काश मैं अपने इस वर्ष को ठीक से समझ सकता। पुनर्विचार करता। क्या खोया क्या पाया समझ सकता। जिदंगी के इस पड़ाव पर ठहर सकता । इसलिए ही 28 और 29 दो दिनों की छुट्टी पर था। सोच रहा था कि मैं कहीं किसी ग्रह पर जाता जहां केवल मैं होऊँ। वहां कोई अग्नि की मशाल भी न हो। वहां किसी की आहट न हो। वहां चंद्रमा और तारे केवल अपने में मगन हों। वहां मानवीय स्मृतियां दखलअंदाजी न करें। वहां कोई इंसान भी न भटकता हो। वहां नदियां हों लेकिन शांत वे अपने में मगन हों। लेकिन ऐसी ख्वाहिश नहीं पूरी हो सकी। लेकिन, ऐसी ख्वाहिश जल्द ही पूरी करूँगा।

इसलिए क्योंकि मेरी ख्वाहिश पूरी नहीं हो सकी। क्योंकि ऐसी जगह शायद नहीं बनी कोई । है भी तो बाधाएं और पहुँच से दूर। है भी तो वहां जाने से पहले ही कई बंधन। घर परिवार से अभी बंधे हुए, सबसे बड़ी बात मित्र मंडली से विमुख नहीं है। लोग हमें खोज लेते हैं और हमें अकेले छोड़ना ही नहीं चाहते। इसलिए मैं वंचित रह गया इन चीजों से। 
लेकिन जब वंचित रह गया तो हुआ क्या क्या।। 29 के पहले चरण में यानी रात्रि 12 बजे से 5 बजे तक मित्र और गुरु दोनों कहलाने वाले परम आदरणीय जी और मेरे भाई का साथ मिला। कुछ समय बीच में बचा तो यूँ ही ख्वाहिश पूरी करने के लिए कई बार ध्यान मगन होने की कोशिश की, अंततः थोड़ी देर के लिए आंखे बंद की , फिर खोली और आईने को सामने रख कर आपने आपको देखने की कोशिश की। 
अंततः जो दिखा वही बता रहा हूँ।
मयखाने में जाने का फायदा तो होता है क्योंकि वह कम से कम कुछ उसी प्रकार के आनंद में मशगूल तो रह लेता है जैसा वह चाहता है। मैंने पता नहीं क्यों किस अवसाद से बचने की दवा ले रखी थी उसका असर कहें या यूँ ही कल्पना में खोने का डर, कि आंखों में जरा भी विचलन नहीं हुआ। बहुत कोशिश की लेकिन अश्रु धारा भी न बन सकी। मैं सकरात्मक ऊर्जा से भरपूर अपने आईने में खुद को निहारता जा रहा था। मिला क्या वही जो सच लगता है। 
दिल की आवाज में वही मासूमियत का चेहरा।
काश कोई समझ गया होता।
दिल की आवाज को पढ़ सके होता।
आंखों की नूर का अवलोकन कर पाता।
काश कोई
भावनाओं की प्रबल धारा और शून्य धारा में बहना सीख लिया  होता।
लेकिन नहीं, हमेशा कि तरह यही समझ सका कि मैं अंततः प्रभात हूँ सबकी तरह मगर यूनिक


अगले कुछ घंटों की नींद के बाद कुछ लोग मिले जिनका जन्मदिवस भी उसी दिन था। कुछ मित्र मंडली में नए चेहरे कुछ पुराने.... सभी मेरे पास के खाली कोने को पाटते रहे। इस तरह से और वही सभी की शुभकामनाएं दिल को छू गयीं। कोई दिल से तो कोई मन से तो कोई हाथ से लिखा तो कोई काल्पनिक लिपि में। हाँ कोई तो बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कह दिया।
29 तारीख रात 9 बजे घर पर फ़ोन किया....पहली बार पिताजी ने ना कहते हुए भी शुभकामनाएं दे ही दिया वैसे ही ...हर बार दिल से दिल की तरह ही शुभकामनायें बिना कहे ही पहुँचती थीं...खैर यह भी एक ऐसा समय था जो भावनाओं की धारा में मुझे बहा ले गया ठीक उसी प्रकार जैसे किसी अमीर को कोई गरीब जीवन दान दे देता हो ..
फिर फेसबुक और व्हाट्सएप पर मित्रों की शुभकामनाएं...जिसने जो भी लिखा वहीं काफी है, इस भागदौड़ भरी जिन्दगी में ..समय निकल कर 2 आखर भी लिखना.

किसी तरह मेरे जन्म का उत्सव खत्म होने की बारी आई। एक बार और धक्का लगा कि ....2017 और इसके पहले क्या क्या हुआ।
मगर अचानक घड़ी की सुई ने मुझे बिना बताएं 12 से 12.5 बजा दिया यानी कि 30 तारीख जिसमें , वही बची खुची ख्वाहिश पूरी करने की फिक्र ।
2018 आएगा बिना रुके और शायद मेरे लिए काफी अच्छा हो।

अगर कभी मेरी आत्मकथा लिखी गयी या फिर मेरे जीवन का इतिहास तो 2017 मेरे जीवन का अहम भाग होगा । इसके बिना मेरी जिंदगी अधूरी होगी।
-प्रभात 

Friday, 29 December 2017

कविमन

अनगिनत बार हो गए इस आस में परीक्षा देने जाते
शायद वो इस बार परीक्षा केंद्र पर ही मिल जाए...
-प्रभात का सुप्रभात

उसकी आहट में मैं भरे बाजार में खो गया।
पहली मुलाकात और अंतिम विदाई की यादों में।
इस तरह जैसे उसने दूर से ही छू लिया हो
मैं बेताब होने लगा, सांसे जैसे रुक गयीं हो
तेजी से भागा और उसके आगे रुका
जैसे ही उसने चेहरा घुमाया और फिर
मैं रुका ही नहीं, वह कोई और ही थी.....
https://static.xx.fbcdn.net/images/emoji.php/v9/fd0/1/16/1f602.png😂
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शुभकामनाओं की चाहत में कविमन लिए प्रभात-
आजकल शब्दों से लड़ रहा हूँ, शब्द मिल नहीं रहे कि मैं अपने मन के भाव को व्यक्त कर सकूं, पिछले 1 घंटे से लिख रहा हूँ, मिटा रहा हूँ और फिर लिख रहा हूँ, फिर समझ आया...कि न लिख पाऊंगा कभी....लेकिन जिद है कि इतना तो कह सकता हूँ न कि क्या हो रहा है ऐसा....
इक सागर प्यासा है
इक कहानी अधूरी है
दृश्य बने कुछ ऐसे लगा कि जैसे मेरे भीतर से कोई बहुत खास बहुत दूर चला गया हो, वह जितना पास था अब उतना ही दूर भी। जिंदगी कभी-कभी उसे मेरे पास ले आती है मगर देखता हूँ वह पास है मेरे, बहुत आसपास, घूम-घूम के मेरे अंतर्मन में भी, लेकिन वह अनायास ही परदा डाल कर एक कहानी को मार रही है।
मैं हर बार जब भी पास आती है तो सहम जाता हूँ, आँखे विपरीत हो जाती हैं, ढाँढस के बीज लिए आसपास कोई नहीं दिखता, और इतना सब कुछ देखते ही देखते......एकाएक जैसे मैं ही टूट कर बिखर जाता हूँ.....कुछ भाग जो मुझे सम्पूर्ण बनाता है वह अपूर्ण हो जाता है।....मीन बिन पानी तड़पने लगती है....
पानी की तलाश में फिर से शब्द के पास आने की कोशिश करता हूँ, लेकिन वह फिर कहती है कि आसमान को अभी देखो नहीं उस पर परदा लगा दो, क्योंकि अगर तुम देखोगे तो बरसने लगेगा बेमौसम ही।
उस पर पहरा बिठा दो जो तड़प रहा हो सब कुछ होने के बाद भी.....केवल धर्म संकट की वजह से।
खैर न समझिएगा, क्योंकि मैं खुद भी अब कह नहीं पा रहा हूँ कि शब्द क्यों नहीं पद्य के रूप में बंध रहे। सोचा वही लाइन लिख दूँ। मगर ये जिदवश लिख दिया बस...वैसा नहीं लिख सका जैसा चाहता था । प्रयास जारी तो है....जल्द ही लिखूंगा शायद....शुभकामनाएं दीजिये।
-प्रभात

प्रभात की ओर से सुप्रभात...

प्रभात की ओर से सुप्रभात...


मधुर व कुछ बढ़िया सा राग सुनाने रागिनी आ पहुँची। शीतल और मुस्कुराती हवा के साथ आकर गले लगाकर मानो उसने मुझमें असीम सकारात्मक ऊर्जा का संचार करा दिया।
अभी उसे आये कुछ ही पल बीते थे कि जोर-जोर से गरजते हुए बादल के साथ बारिश होने लगी। आसमानी गगन का पता नहीं पर अपने घर में सभी मगन दिख रहे थे। कबूतरों का पता नहीं पर घोसलों में बैठे अंडों से निकले नवजात बाहर आने को बेताब हो रहे थे। थोड़ा सा धुंध छटा तो देखा कि आश्चर्यजनक रूप से खड़ा पहाड़ सफेद बर्फ की चादर लपेटे मुझे देख रहा था और रागिनी उसे देखकर शरमा गई और मेरे पीछे मुँह छिपाने लगी। मैंने हँसमुख रागिनी को जैसे ही पकड़ा वह खिलखिला उठी। तभी सामने ध्यान गया तो रोमांचक दृश्य सामने था। सफेद बर्फ से ढकी चोटी के बीच सूरज सामने आने की कोशिश कर रहा था। लालिमा लेकर वह रागिनी को छूने की कोशिश कर रहा था। इससे रागिनी में उमंग आने के साथ-साथ उसके हाव-भाव भी बदल गए। थोड़ी देर में रागिनी के राग के साथ ही कोयल की कूक ने समां बांध दिया। अब बारिश न रही और न ही वह लालिमा। इन सबके बावजूद रागिनी और मैं, पहाड़, सूरज और कोयल सभी हैं मगर सब अपनी दुनियां में मस्त अलग-अलग।


Thursday, 7 December 2017

सफरनामा

साझा काव्य संग्रह के लिए मेरी रचनाएं "सफरनामा" पुस्तक में प्रकाशित हैं। आप सभी इसके साक्षी बने, इसके लिए आभार व्यक्त करता हूँ। 
यह मेरी चौथी साझा काव्य संग्रह की पुस्तक है।
25/09/17











 

पिताजी, इस कदर मुझे डर है

पिताजी, इस कदर मुझे डर है
आपके न होने का
कि मैं मर्जी से शादी करने की जिद
छोड़ देती हूं
मैं अपनी सारी खुशियों को
आपके सहारे छोड़ देती हूं
आपकी खुशी के लिए
क्योंकि जानती हूँ बेटियाँ 
शायद सब कुछ नहीं कर सकतीं
अगर कर भी सकती हैं तो 
शादी के लिए रिश्ते आप ही ढूंढेंगे
मैं अगर ढूंढ़ भी लूंगी
तो मुझे त्यागना पड़ेगा,
अपने प्रियतम को
अपने बंधनों को
अपनी खुशियों को
और अपने बचपने को
और सबसे बड़ी बात
मुझे कठोर बनना पड़ेगा
दिल और दिमाग दोनों से
मुझे असर नहीं करेंगी
ठंडी और गर्म हवा
जीवनरूपी रंगमंच पर
किरदार निभाऊंगी 
चेहरे पर खुशी होगी
अंदर से टूटी नहीं दिखूंगी
लेकिन मैं 
असंवेदनशील बन जाऊंगी......

प्रभात
तस्वीर: गूगल साभार



एक सुबह

*एक सुबह*
मैं दिवाली में घर गया और वापसी में जब ट्रेन पकड़ा तो माँ ने काफी गंभीरता से हर बार की तरह कुछ ऐसा ही कहा
कहाँ पहुँचे हो, सीट मिल गई, खाना खा लिया...मेरी कम बात करने की आदत है हां सब ठीक है कहकर, फोन रख दिया।
लेकिन.....शायद वह कुछ कहना चाहती थीं।

सुबह ट्रेन दिल्ली पहुंची मैंने कॉल कर कहा माँ मैं कमरे पर पहुंच गया। माँ ने कहा अच्छा, ठीक और सब बढ़िया है?
हां...मैंने कहा, लेकिन सवाल था और सब बढ़िया है तबियत ठीक है ऐसा पूछने का मतलब...कुछ और पूछना चाह रही थीं...क्योंकि मेरी तबियत गड़बड़ थी तो नहीं

अगले दिन फिर सुबह कॉल आया, सोते हुए 10 बजे मैंने कॉल उठाया और कहा हां अम्मी.....ऐसे ही किया हाल चाल पूछने के लिए, अभी उठ रहे हैं क्या, बहुत देर हो गई... माँ ने कहा।
हां आजकल 4 बजे तो सोता हूँ तो देर तक तो सोऊंगा
और कोई बात है क्या? सब ठीक है न?
हां.... माँ ने कहा
फिर 3 घण्टे बाद 1 बजे दोपहर दुबारा कॉल आया....मैं सोकर उठा था....हां अम्मी बताइए कैसी हैं....बस ऐसे ही किया अभी सो रहे हैं क्या.....माँ ने पूछा
हां अभी थोड़ी देर पहले उठा हूँ। और बताइए....मैंने सहज उत्तर दिया
अच्छा तो अभी तक कुछ खाए भी नहीं होगे?..इसलिए काफी कमजोर होते जा रहे हो....माँ ने कहा
हां अब उठेंगे लेट तो लेट ही खाएंगे...अभी वैसे कुछ खा लिए हैं खाना तैयार हो रहा है बाकी....मैंने कहा।
माँ ने कहा....अच्छा एक बात बताओ दिवाली में आए मैंने देखा काफी उदास से रहते हो, क्या हुआ कोई तकलीफ है क्या? इस बार काफी शांत-शांत से थे....कुछ किसी से बोलते भी नहीं थे...मेरे मन में सवाल उठ रहा था ....रहा नहीं गया मैं सोची पूंछती हूँ आखिर क्या बात है....कुछ हो बात तो बताओ उसको साँझा करोगे तो दूर होगी समस्या....बताओ किस तरीके की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और पारिवारिक इनमें से कौन सी समस्या है...???
मैं सुनकर दंग रह गया, माँ तुमने मेरी खामोशी को कैसे पढ़ लिया.....मैंने कहां कुछ नहीं वो वैसे ही आपको लगा होगा।कुछ भी तो बात नहीं। मैं ठीक हूँ और ठीक रहूंगा।
माँ ने अधूरे मन से आश्वस्त होकर कहा ...ठीक है खुश रहना चाहिए.....
फोन कट गया, लेकिन मैं पूरे दिन माँ के ख्यालों में डूबा रहा और सोचता रहा...कि मां के लिए जितना लिखा जाए कम ही है...
उन्हें शब्दों में लिखा ही नहीं जा सकता...
माँ और मेरी जिंदगी
तेरे जीने का सहारा हूँ, बचपन से लेकर अब तक दुलारा हूँ माँ
तेरे दिल को जानता हूँ माँ, मेरी खामोशी को पढ़ लेती हो माँ
भीड़ में अगर मैं खो जाऊं तो दिन रात ढूंढ़ती रह जाओगी माँ
अक्सर ढूंढ़ता हूँ तुम्हें किसी और में, तुम मुझे ढूँढ़ लेती हो माँ
इसलिए माँ
मैं हवाओं में बहकर दूर चाहे जहाँ पहुंच जाऊं, तुम्हें शक तो होगा
मैं शून्य से धरा पर या धरा से शून्य तक चला जाऊं, वाकिफ तो होगी
मैं पत्ती बन पतझड़ में मुरझा भर जाऊं तुम्हें दर्द तो होगा
समुंदर में मैं कहीं डूब जाऊं तो गहराई का तुम्हें एहसास तो होग
मेरी खुशी का आधार तू है तो तेरी जिंदगी का आधार तेरा बेटा है माँ
मैं किताब हूँ और मेरे हर पन्ने को पढ़ लेती हो माँ....मेरी आँखों को और चेहरे को पढ़ने वाला तेरे अलावा कोई दूजा रिश्ता नहीं देखा माँ..
-प्रभात


यादों के झरोखों से

यादों के झरोखों से...




सुबह हो गयी है। छप्पर तले भागलपुरी चादर ताने नींद से जगा था। हर तरफ चिड़ियों की चहचहाहट और गायों की मी... की जोर जोर से आवाज आ रही थी। पास में आवलें के पेड़ पर बैठा पट्टू भी सुरीली आवाज में कुछ कह रहा था। कोयल की कूक के क्या ही कहने। दादाजी चारा काट रहे थे। मौसम ऐसा था....जैसे शिमला की हल्की कोहरे वाली सुबह...टिप-टिप की बजाय, बहुत हल्की बूंदा बांदी...गन्ने के ढेर आंगन से हटाए जा रहे थे। दादी कह रही थीं कि जाग जाओ भईया...उठो तो आज दीवाली है । का लेवक बा..जाता दिया, चूल्हा, घंटी...खेले वाला सारा सामान लइके कोहार आय हईं।
जल्दी से जागकर बैठे तो देखा हर तरफ घर की सफाई हो रही थी। आज स्कूल भी नहीं जाना था....लिपाई चल रही थी। जमींकंद की खोदाई हो रही थी। आंगन गोबर जी लिपाई से चमक रहा था। तुलसी के पेड़ के आस-पास मनोरम दृश्य लग रहा था। गुलाब की पंखुड़ियां पूरे वातावरण को महँका रही थीं। बछड़ा और पिल्ला सब खेल रहे थे। भौरें और तितलियां मंडरा रही थीं। दादा-दादी कह रहे थे कि पढ़ लो आज कुछ सब याद हो जाएगा। मैं सोचा इससे अच्छा क्या हो सकता है। सामाजिक विज्ञान की कॉपी निकालकर आग्नेय, अवसादी और रूपांतरित शैल सैकड़ों बार पढ़ डाला कि याद हो जाएगा आज तो दीवाली है...हां एक बात है। सबसे कठिन लगने वाला यह विषय मुझे याद हो गया।
अब शाम होने वाली थी। दिन-भर टहल-टहल कर खूब जाता से आटा पीसे और चूल्हा के ऊपर बटुली रखकर खूब पकाया।अच्छी-अच्छी मिट्टी की बनीं प्लेटों का जमकर फायदा उठाया। सुबह से मिठाईया खा-खा कर अघा गया। था। आखिर बच्चा तो और क्या कर सकता था। हां रात को दीपावली को लेकर इतने उत्साहित थे हम कि दिया रख रख कर थक गए थे लेकिन हारे नहीं थे। 200 दिया लिए थी अम्मी लेकिन उसे जिद करके 300 करा दिया था। दादी जी काजल बना रही थीं। और सभी लोग गणेश जी और लक्ष्मी जी की पूजा कर रहे थे। आस- पास के लोगों को मिठाईयां देने गए। अच्छे पकवानों में से मनपसंद मेरा एक पकवान पूरी और कंद की सब्जी खाने जा रहा था। दादा जी और घर के सभी लोग साथ बैठकर हँसी मजाक कर रहे थे। खाना खाते-खाते बोल उठा दादी जी ये बताइए आज राम जी कैसे लौटे थे....अब भी अयोध्या में कोई होगा? अच्छा अमावस की रात क्या है? ये सूप जो पीटा गया था एकादशी में ....ईश्वर आवें दलिद्दर जाएं...ये क्या है? इतने में नींद खुल जाती है....और पता चलता है समय बहुत आगे आ चुका है....आज दीवाली तो है मगर वो जश्न नहीं, आज सब कुछ वही है मगर वो लोग नहीं...सच में सब सपना बन जाता है।

मेरी दोस्त

-google
मेरी दोस्त मैंने तुम्हें एक ही खत लिखा था
पता था दोस्त, वो मेरा अंतिम खत था
मुझे पता नहीं क्यों यही लगा था, यह अंतिम ही है

लेकिन सच को स्वीकारना मुश्किल ही था
हां, न चाहते हुए भी लेकिन मैंने बताया था
कि यह तुम्हारे नाम मेरा पहला और अंतिम खत है
दोस्त मैं कवि नहीं हूं जो केवल कल्पना करु
मेरे ख्याल और मेरे शब्द सब तुम्हारी देन है
और लोग इसमें कवित्व के गुण ढूंढ लेते हैं
मेरी दोस्त अगर मैं कवि होता
तो मैं तुम्हारी होठों को मधु प्रेम बता रहा होता
और तुम्हारे चेहरे की चाँद से तुलना कर रहा होता
तुम्हारे घुंघराले बालों को मैं मोर मुकुट की
तरह शोभायमान कहता, और इतना ही नहीं
तुम्हारे आंसुओं को श्रृंगार बता रहा होता
लेकिन नहीं दोस्त,मैं वही कहूंगा जो तुम थी
मैं वास्तविक ही सुनाना पसंद करता
और सबसे बड़ी बात तुम खुद यही सुनना पसन्द करती थी
हां दोस्त, तुम्हारे केश हो या होठों का प्रेम
वो मेरे लिए था....और निश्चित रूप से वह ऐसा ही था
मैंने कभी अतिशयोक्ति नहीं बोला मगर
सच बताऊं तुम्हारी हाला वाले होठ भी मुझे 
बहुत मीठा अनुभव कराते हैं।
जिसे तुम सोचती की मुझे अच्छा नहीं लगेगा
या तुम कहती कि आज तुम अच्छी नहीं दिख रही
तुम फ़ोटो नहीं खींचा सकती
उस दिन भी मुझे वैसे ही लगती थी जैसे हर दिन
इतना आकर्षक की आज तक भूल नहीं सका हूँ
मैं चाँद को उतना नहीं याद करता,
मोर मुकुट देखने की लालसा नहीं हुई कभी
लेकिन मेरी दोस्त, तुम्हें देखे बिना एक कसक सी रहती है
मैं अपने आपको उतना ही खुशकिस्मत मानता हूं
जितना कि उस रात को 
जब हम एक ही चादर तले हाथ पकड़े मुस्कुरा रहे थे
जितना कि उस रात को 
जब तुम मुझे भेजने सड़क तक आई थी
उसके बाद तुम मेरी तरफ वैसे ही देख रही थी, जैसे मैं
जितना की वो दिन 
जब मेरे बोलने से पहले किसी को 
बता देती थे, कि ये ऐसा नहीं है या ऐसा है
तुम अपना हक जताती थे, और
बिना कुछ कहे मेरे कंधों पर अपना सिर रख देती थी
मेरी दोस्त, तुम्हारा शुक्रिया कहूँ तो अच्छा न होगा
क्योंकि शुक्रिया कहना तो हमने दोस्ती में छोड़ ही दिया था
शुक्रिया के बदले तुम्हारा जो स्नेह मिलता था
बहुत सुकून मिलता था
हां मेरी दोस्त, जो शरारतें थीं वो मेरे लिए तुम्हारा स्नेह था
पानी की बूंदों से भिंगोना, या तुम्हारा घर के दरवाजे पर आकर खड़े हो जाना
या कहूँ तुम्हारा मुझे कभी भी जगा देना 
और केवल मेरी तरफ एक बार देखना
मेरे सौ बार शुक्रिया करने से कहीं अधिक शुक्रिया के कायल हैं
वो रातें जिसमें तुम और हम एक दूसरे को अंधेरे में भी देख लेते थे।
वो मुस्कुराहटें जो लबों पर एक दूसरे की बिना चुम्बन किये ही जाती थीं
वो रातें जिसे तुम कहती थी कि मैंने कुछ गलत बोल दिया था
मुझे वो गलत भी सही लगता था
वो जगह जिस पर हम बैठे घंटो 
एक दूसरे को ढांढस बधाते थे
वो सब कुछ याद है न, मैंने सिर्फ इसलिए लिखा मेरी दोस्त
कहीं ऐसा न हो कि इन एहसासों को दबाएं ही मैं विदा जाऊं
मेरी दोस्त मैं छोड़ना चाहता हूं कुछ यादें तुम्हारे साथ भी
मेरी दोस्त, जानता हूँ, मैंने रुलाया है
तो खुद भी रोया ही हूँ
हां दोस्त जहाँ तुम रो रहे थे, वो दृश्य मेरी आँखें भिंगोने के लिए काफी है
कहां तक मैं कहूँ कि हवा तुम साक्षी थे
या कहूँ धूल तुम साक्षी थे....हां सभी थे।
तुम्हारी झल्लाहटें या तुम्हारे माथे पर चिंता की लकीरें,
मेरे लिए भी चिंता के विषय बनते
तुम्हारा डांटना कहूँ या 
वही मेरी जिंदगी और मकसद थे

मेरी दोस्त, तुम्हें और तुम्हें लिखकर मैंने गलतियां की
होंगी
लेकिन मैंने वहां वही लिखा जैसा सोचता हूँ, जैसा देखता हूँ
और इसलिए लिखा कि क्योंकि मेरी दोस्त तुम पढ़ो
कोई और नहीं क्योंकि दोस्त दूरियां हममे है
और असर दूसरे पर नहीं हम पर पड़ता है
उस वक्त जब हम बहुत दूर हो
इतना दूर कि कभी मिल भी न सके
इसलिए लिखा..........
फिर शायद तुम एक बार सोचो कि मैं क्यों लिख रहा था.....
लेकिन हां फिर भी तुम मत पढ़ना, क्योंकि ये प्यार 
कोई पढ़ने की चीज नहीं है, ये बस फील करने की चीज है
दोस्त तुमने जो सिखाया, वो ये कि खाना और उसके बाद दूध भी पीना है
हां दोस्त तुमने ये भी सीखा दिया कि ब्रश करना है
दोस्त तुमने मेरी माँ की तरह मुझे साबुन से नहाना भी बता दिया था
मेरी दोस्त ये कहने का अधिकार है न?
दोस्त मैं नहीं रहूंगा जब तो मेरी कविता तुम्हारे
जीने की वजह होगी
तुम्हें टूटने से बचाएगी
हां दोस्त तुमसे यह भी कहेगी कि उस पल में लौट चलो
लेकिन दर्द होगा बस इस बात की, कि नहीं समय कभी पीछे नहीं जाता
लेकिन खुशी भी होगी कि कोई दोस्त तो था सचमुच
हां मुझे तो खुशी ही है इसलिए दोस्त मैं चलता हूँ
आज नहीं रोऊँगा बस इतना ही कहूंगा
मेरी दोस्त मेरे इस जीवन में तुम्हारी जगह कोई और नहीं ले सकता
हां दोस्त..... तुमसे विदा लेता हूँ
लेकिन एक सवाल के साथ, आखिर तुम बिना कुछ मुझसे कहे कैसे रह लेती हो?
मेरी दोस्त,
जो बातें तुम बता देती थी मुझे जो किसी और को नहीं बताती थी
वो आखिर किससे कहोगी…?



मां-अम्मी

*मां-अम्मी*
मेरी माँ मेरी जिंदगी
मेरी माँ मेरी खुशी

मेरी माँ मेरा वो सब कुछ
जिसकी वजह से सांसे चल रही हैं
माँ तुम्हें अम्मी बुलाऊँ
या मेरी अम्मी तुम्हें केवल स्मरण कर लूं
मिलती है मन को तसल्ली
जीवन भर मांगा ही है मां
लेकिन इसके बाद भी
मेरी अम्मी बिन मांगे 
वो सब कुछ दे देती हो
जिसे कोई आज तक नहीं दे सका
माँ दुलार देना, गोदी का सहारा
हाथों से सहलाना, पुचकारना
मां तुमने आँचल से छिपाया, क्या नहीं बनाया
मेरे लिए कपड़े से लेकर कलम तक पकड़ाया 
माँ मन्नतें मांगी मेरे लिए, मां खुद बिन खाए
मुझे गरम रोटी ही खिलाई
अम्मी खुद के लिए जो नहीं कर सकी
अपने हिस्से की हर वो चीज मुझे दिलाई
मां तुमने जीवन दिया, पाला पोशा 
इसके बाद मां अब केवल मुझे तरसती हो
देखने को, इसलिए नहीं कि मां तुम अकेली हो 
इसलिए कि मैं कैसा हूँ
ये नहीं कहती मां कि मुझे जरूरत है तुम्हारी
ये नहीं कहती मां कि तुम मेरे लिए कुछ करो
मां मैंने हक जताया बिना हक के
मगर अम्मी तुमने कभी नहीं हक जताया 
कि तुम कोई आदेश दे सको
मां तुम निवेदन करती हो
इसलिए मां हो
लेकिन मां तुम एक पत्नी भी हो
मां तुम एक बहन भी हो
मां तुम एक बहू भी हो
मां तुम एक बेटी भी हो
मां तुम वो सब कुछ हो जिसकी वजह से मैं हूँ
अम्मी तुम्हारी चिंता की लकीरें बेशक मैं ना समझ पाऊँ
मगर मां तुम हमेशा ही मेरी चिंता की ही लकीर नहीं
मेरे भाग्य और मेरे भविष्य को भी पढ़ लेती हो
मां तुम मेरी अम्मी हो
मेरी माँ मेरी जिंदगी.....

-प्रभात


मैंने जीवन को देखा

मैंने जीवन को देखा है खूब गहरी खाई से
बैठा था आसमान पर, जमीनी सच्चाई से
मैं पृथक नहीं हूं क्षण भर, बाधाओं के आने से
अपने दिल की गलियों में पत्थर मारे जाने से
टूटा और हारा बहुत हूँ, जीता हूँ तो खुद से
कान के तार जुड़े हुए हैं डर लगता है कहने से
वक्त मिलता है सोच समझ कर कुछ कहने को
याद बनाकर अधूरे सपनों को फिर से जीने को
आंखों में आंसू आते है, मन हल्का हो जाता है
नहीं पता, जाते हैं तो फिर अचानक क्यों आते हैं
वो अलग थलग होकर भी नहीं चैन से रह पाते हैं
जिनकी वजह से आंसू आते उन्हें भी क्यों आते हैं
बुलबुला बन कर खो जाऊँगा मैं तुझमें होने से
तुमने छूकर देखा है दिल को बहुत करीब से
-प्रभात

मेरा भ्रम था

मेरा भ्रम था, मेरा सच बोलना
मेरा भ्रम था, कुछ अपना होना
मेरा भ्रम है अब खुद का होना
मेरा भ्रम है तुम्हारा होना
मेरा भ्रम है फिर भी है जीना
बिन भ्रम कुछ नहीं है पाना
बस चलते जाना, चलते जाना.....
ठीक वैसे जैसे कस्तूरी मृग
ठीक वैसे जैसे मृग तृष्णा
ठीक वैसे जैसे चाँद में जानवर
ठीक वैसे जैसे जल में रोशनी
ठीक वैसे जैसे परछाईं.....
देखते रहो धरती से आकाश को
देखते रहो समुद्र से बादल को
देखते रहो विश्वास से भगवान को
देखते रहो इंसान को गुमान से
धूल से दीया और दीया से बाती को
दीया से धूल को और धूल से माटी को.....
चाहो तो जिंदगी को मौत से निकालो
चाहो तो जिंदगी से मौत निकालो
विश्वास है तो भूत है, भूत है तो भविष्य है
ईश है, देव है, अरूप है तो रूप है
सत्य है तो झूठ है, भ्रम का प्रमाण है
प्रमाण है, क्या है? कुछ भी नहीं......
भ्रम है या ये भी नहीं?????????
-प्रभात


Tuesday, 10 October 2017

जाने दो

 *जाने दो*
वो जाते हैं तो चले जाने दो
कभी किसी को पछताने दो
मुड़ कर देखो मत कुछ
उनको भी आगे बढ़ जाने दो
कितना भी मुश्किल आए
लबों को मुस्कुराहट लाने दो
पढ़ लो अनगिनत कहानियां
दूसरों को खामोश हो जाने दो
ढूंढ लो एक रिश्ता और किसी में
किसी रिश्ते को बिछड़ जाने दो।
रास्ते हर बार नई आने दो
कदम अपने रुक न जाने दो
हार हो तो स्वीकार कर लो
किसी की जीत तो हो जाने दो
आंसुओं को कभी रोको नहीं
इन्हें वक्त पर निकल जाने दो।
लम्हा-लम्हा यूँ ही जीते चले जाओ
जो जुड़ते है उन्हें जोड़ते जाओ
कभी अंत होगा जो याद बनेगी
गुजरे पल कोई तो गुजर जाने दो
किसी को इतिहास बन जाने दो
वर्तमान को अतीत बन जाने दो
-प्रभात



लिखने लगा हूँ मैं

लिखने लगा हूँ मैं ..जो सहने लगा हूँ मैं
आदत सी हो गयी... अब जो कहने लगा हूँ मैं
कसमें है वादें है झूठे... खाने लगा हूँ मैं
होश में भी आके मैं... सब बताने लगा हूँ मैं
फ़िक्र नहीं है खुद की भी...तो गाने लगा हूँ मैं
बड़े बदनसीब बनकर आये है हम-2
जीने के लिए सारी... जिन्दगी भी है कम
चलते चलते सपनों में ....खोने लगा हूँ मैं
दुनिया वालों मेरी सुध भी ले लो-2
हंसने -गाने के सुख भी दे लो
जाने कहा से अब.....डरने लगा हूँ मैं
सहने लगा हूँ .....बस कहने लगा हूँ मैं



कह नहीं सकता

कुछ कहना था आज तुमसे, लेकिन आज कह नहीं सकता।
हां थोड़ा बहुत मज़ाक और कुछ अपना ज्ञान बांट नहीं सकता।
आज मैं तुमसे कुछ कह नहीं सकता।
कुछ बचे हुए सवाल नहीं कर सकता और अब जवाब
ढूंढ नहीं सकता।
जो वादे थे वो चाहकर पूरा कर नहीं सकता।
हां कुछ उलझनें तुम्हारी सुन सकता हूं मगर उन्हें मिटा नहीं सकता।
आज मैं तुमसे कुछ बाँट नहीं सकता।

#मजबूरियाँ# जीवन की सच्चाई#