Sunday, 24 January 2016

जो आसरा कुछ दिया था


हो गयी है बाग़ वो खाली जहाँ कभी हरियाली थी
पेड़ों पर झूला और उन पर नन्हों की खुशहाली थी
फसल कटी नहीं जब तलक नियमित रखवाली थी
कटने के बाद लोकगीत और खेतों में दीवाली थी
पानी भरे खेतों को देखे अरसा बीत गया लगता है
हीरा-मोती बैलों को कथा सुने वर्षों बीता लगता है
चना-मटर के खेतों में जाने के सपने बस आते है
अरहर के खेतों में छुपा-छुपी खेलों में खो जाते है
सरसों के लहलहाते फूलों पर बैठी तितलियाँ कहाँ
एकादशी के गन्ने और गन्नों से पीटते सूप गए कहाँ
हो गयी है लुप्त दीवाली, खलिहानों में उजियाली थी
आँगन में चटाई और धूप सेंकते दूध की प्याली थी
तालाब के किनारे जाने पर कुछ सूखा सा लगता है
कुओं की बारी आने पर कुछ विलुप्त हुआ लगता है
नदियों के कोलाहल में ध्वनि प्रदूषण हुआ लगता है 
घर के आँगन का पानी मेढक बिन सूना सा लगता है
हो गयी है तब्दील शाम बिनतारे आकाश के बाहों  में
मिट गयी है इन्द्रधनुष की लाईनें मौसम के बदलाव में
हो गयी है अमर कहानी जहाँ से बदलाव शुरू हुआ था
ठहर गयी है प्रकृति की वाणी, जो आसरा कुछ दिया था
     -प्रभात   


  


स्वतंत्र विचार

स्वतंत्र विचार

-Google image

          इतने दिन हो गए न कोई लेख न ही कोई संवाद. ..ऐसा लगता है विचारों की दिशा ही बदल गयी हो परन्तु ऐसा न होने का एक महत्वपूर्ण कारण मेरे परतंत्र होने से है मैं हूँ तो स्वतंत्र परन्तु केवल 26 जनवरी को और 15 अगस्त! वहां जब मेरे हाथों में एक माईक होती थी और “जय हिन्द जय भारत” के स्वतंत्र नारे लगते थे. स्वतंत्रता तो उसे कहते है जब कोई मजबूरियां मेरे सामने नहीं आती अपितु आती है तो बस अकेले. जब कोई सवाल मेरे पास आये तो उसका स्वतंत्र जवाब आपके पास जाए. जब कोई तत्त्व मुझसे भिड़े उसका जवाब मेरी स्वतंत्रता से ही मिले. इंसान को जब स्वतंत्रता मिल जाती है तो वह जिम्मेदारियों से लद जाता है और अगर ऐसा नही होता तो वह कुछ अनर्थ कर लेता है. इन सबके पीछे एक उद्देश्य होता है वह नाता, रिश्ता, परिवार, समाज, संस्कृति और बहुत सी अनकहे या कहे विचार.
          
         मेरे अपने विचारों में स्वतंत्रता की परिभाषा बन-बन कर बदलती जाती है जैसे तरंगों का बन-बन कर लुप्त होना. स्वतंत्र विचार मेरे मन कभी-कभी जब आते है तो मैं उनके पीछे मकसद की और भागने लग जाता हूँ और अंततः ज्ञात होता है कि यह भी एक परतंत्र विचारधारा है. इसका मतलब कुछ खास नही है.... विचार आते है तो वह मेरे स्वयं के ही होते है वह मेरे अपने ऊपर निर्भर करता है कि कब और कैसे किन विचारों में खोया जाये...अर्थात हम इसे स्वतंत्र ही मानेंगे.
कभी-कभी जब मेरे विचार किसी फल की प्राप्ति के लिए कोई संघर्ष कराते है अगर उस संघर्ष से कुछ मिल जाता है तो वह विचार स्वतंत्र मालुम पड़ता है और वही जब संघर्ष कुछ गवां देता है तो वह विचार परतंत्र लगने लगता है. हकीकत यह है कि हम हमेशा ही विचारों की उलझनों में परतंत्र ही होते है क्योंकि वहां “मैं” की जगह “हम” का समावेश हो जाता है. सदैव ही ऐसा होता है किसी चीज़ की प्राप्ति के लिए मकसद हमारा प्राप्ति होता है चाहे वह स्वतंत्र हो या परतंत्र.

          जब किसी की शादी हो जाती है तो उसे बंधन में बंधना होता है वह रिश्तों का, जीवन भर साथ रहने का हो सकता है परन्तु वहां यह बंधन अवश्य होता है जिससे हमारी स्वंत्रता का ह्रास होने लगता है. और एक दिन सारे स्वतंत्र विचार परतंत्र विचार बनकर सामने आने लगते है. यह तो हम जानते है परन्तु यह भी हकीकत नहीं है. स्वतंत्र विचार तो उसी दिन से परतंत्र या पराये हो जाते है जब माँ की गोंद में जन्म के बाद आ जाते है और जब तक बड़े नहीं हो जाते तब तक पारिवारिक रिश्तों में बंधे हुए विचारों से अवगत हुआ करते है और दूसरों को अवगत कराया करते है. फिर भी कुदरत की देन से एक नए वातावरण में प्रवेश करते ही फिर से विचार स्वतंत्र होने लगते है परन्तु इसमें कुछ समय लग जाता है. वास्तव में अब भी विचार स्वतंत्र नही है व भी किसी वातावरण में बंधे हुए प्रतीत होते है परन्तु अनुकूलतम स्थिति में सचमुच हम स्वतंत्रता की ओर प्रवेश करने लगते है.

          जब ऐसी अनुकूलतम स्थिति आती है तो हमें अपने आप पर इतना भरोसा हो जाता है कि हमारे अपने पूर्व के विचार जो स्वतंत्र प्रतीत हो रहे थे अब वे परतंत्र महसूस होने लगते है और हम ऐसी सभी विचारों का विरोध कर बैठते है परन्तु इससे अपने रिश्ते, समाज और परिवार को आघात भी पहुँचने लगता है. जब ऐसी स्थिति आ जाती है तो हम फिर एक ऐसे बंधन में बंध जाते है जहाँ हमारी स्वतंत्रता छिनने लगती है परन्तु यह हमारे ऊपर होता है कि हम अपनी स्वतंत्रता को कैसे बनाये रखे.

          समग्र रूप से अब भी जब हम एक बंधन से निकलते है वह है बचपन तो स्वतंत्र है परन्तु शादी के बाद एक ऐसा बंधन जिसमें फिर से हम परतंत्र महसूस करते है इससे भी निकल सकते है वह हमारे ऊपर ही निर्भर करता है कि कैसे. मेरा मतलब किसी का त्याग करना नहीं केवल अपने कुछ परतंत्र विचारों का त्याग करने से है.

         चूंकि हम समाज में रहते है इसलिए भी हम स्वतंत्र नहीं है वहां तो हम पूरे ब्रह्माण्ड से बंधे हुए है ऐसा तब महसूस होगा जब कभी हमारी दृष्टि उस और जायेगी. पहले पहल बंधन समाज होता है गाँव-शहर और देश फिर संसार. ऐसा बंधन हमारी जायज और नाजायज दोनों प्रकार की जरूरतों के कारण होता है. और असली परतंत्रता का स्वरुप यही मिलता है. जिससे निकलना शायद असंभव है या हमारी सोंच से परे है. जब ऐसी स्थिति का हमें अहसास होता है तब हमें भगवान् की ओर मुड़ना पड़ता है और तभी बुध्द, कबीर, सूर, ईशा, पैगम्बर और बहुत सारे स्वतंत्र विचारों का प्रवेश होने लगता है. तभी वन गमन, योग, ध्यान, मुनि, साधु, सन्यासी जैसे स्वतंत्र उपायों का अहसास होने लगता है और न जाने क्यों हम त्याग की ओर  चले जाते है जहाँ से हमारे संघर्षरत जीवन का एक नया अध्याय शुरू हो जाता है और उलझनों उलझनों में इन्हें ही भगवान मान लिया जाता है.

           अब सोंचता हूँ तो लगता है कि अंतिम सत्य तो स्वतंत्रता ही है हर कोई इसीलिये इसकी तरफ मुड़ता है और न जाने कहाँ कहाँ किस किस ओर चला जाता है कुछ अपना विचारों का यह अध्याय जल्दी ही पूरा कर लेते है कुछ थोड़ी देर में........

           मिलता जुलता लेख विचारों की दिशा..............(2)......इसे भी जरुर पढ़े. साभार 
-“प्रभात”      

Saturday, 23 January 2016

अच्छे वक्त को कभी लौटना भी होगा...

क्योंकि कहानी लिख दूंगा
क्योंकि नया ज्ञान दे सकूँगा
कहीं रहस्य ही सुलझा दूंगा
अकेला ही सब कर लूँगा
इसलिए ही छीन लिया मेरा भाग्य
और फिर मेरा ज्ञान, मेरा अहंकार
मेरी शक्तियां, मेरे हौंसलों का तार
क्यों संसार में मुझे आना था
पाने के सिवाय लुटवाना था
जिन्दगी भीष्म सा होना था
खबर बिजली का तार था  
मकसद मेरा कामयाब होना नही
मेरी जरूरतों की प्राप्ति होना नही
इतिहास के पन्नों में सिमटना नही
मजबूरियों का इलाज़ होना नहीं
बस उम्मीद और बहुत इंतज़ार पर टिकना है
हकीकत को छिपाना नहीं उनसे निकलना है
मेरे ज्ञान का कोई तो ठिकाना होगा
हौंसले बढाने का कोई बहाना होगा
मिलकर नही पर अकेले जाना होगा
भागदौड़ में ही हिम्मत जुटाना होगा
और फिर किस्मत आजमाना होगा
जो होना है सही गलत कुछ तो होगा
अंत में चलना है तो चलना ही होगा
देखना..बुरे वक्त के भी अपने पैमाने है
अच्छे वक्त को कभी लौटना भी होगा


-प्रभात  

Wednesday, 13 January 2016

मानों शाम आज सुबह से कुछ पहले आ गया

मेरी दादी 
मानों शाम आज सुबह से कुछ पहले आ गया
बारिश की कुछ बूंदों से घना कुहरा सा छा गया











हवाएं मंद सी मुस्काती सरयू तट चली जाती है   
और फिर मुझे छूकर किसी की याद दिलाती है
बाग़ में अमरुद आज अकेला तना लिए खड़ा है  
सरपत के पीले कंटीले झुण्ड सब हमें देख रहे है
पानी के कुओं में आज क्यों अजब सा सूखा है

कौओं का बसेरा पुराने छप्पर के पास टिक गया
लगाकर आग अचानक चूल्हे में जैसे आ गया

पुराने पकवान होली के और दिवाली में नहीं है
पुराने स्वाद झूलों पर भी शब्दों में अटक गए है
चना मटर और नागपंचमी किस पोखरे में पड़े है
कहानियों को चलते-चलते जो कही थोड़े सुने है
आज विमर्श में मुख पर हल्की मुस्कान बिखेरे है
   
मैं शून्य तक देख कर जब वास्तविकता पर आया
यकीन नहीं हुआ फिर भी सब कुछ छोड़ आया

लगता है यह मिट्टी जैसे खिलौने जैसा किस्सा है
किसी खिलौने से सही यह मेरी दादी का रिश्ता है


-प्रभात 

Monday, 11 January 2016

कि विपत्ति धीरज का रुख मोड़ कर लद नही जाती

कि विपत्ति धीरज का रुख मोड़ कर लद नही जाती
खुले आसमान में तूफ़ान कभी असर नहीं दिखाती
गगनचुम्बी इमारतो को हवाए जब चाहे तब गिरा दे
-गूगल साभार 
मगर बिना सीखे कोई परीक्षा सफल हो नहीं पाती

कि मधुमक्खियाँ भी आजकल शत्रु को पहचानती है
हाथ लगाने पर आक्रामक हो ढूंढ ढूंढ कर मारती है
संभल कर बैठे रहो अगर तनिक कुछ देर ही सही
देखो कैसे फिर डरा-डरा कर वापिस चली जाती है  

कि कोई ढिबरी अँधेरे में जब चाहे तब प्रकाश कर दें
शीतल-शीतल सी हवा में थोड़ी गर्म अहसास भर दे
रात भर में ही जलकर दूसरे दिन नया तेल मांगती है
मगर सूरज की गर्मी और अहसास कोई और कैसे दे         

मेरी प्रतिभा है अगर तो मुझसे मंजिल दूर नहीं होगा
वक्त पर न ही सही बिछुड़कर कभी मिल ही जायेगा
बिना बाधा के कोई मंजिल हासिल हो जाये तो क्या
कहा वह आनंद और प्रतिभा का उपयोग हो पायेगा

नईया रोकने के लिए एक जलकुम्भी ही काफी है
जंगल साफ़ करने के लिए बस चिंगारी ही काफी है
कोई अद्भुत धरा पर काम हुआ है तो कही पर अगर
असंभव होता है संभव केवल एक विवेक काफी है  


-प्रभात 

Saturday, 9 January 2016

त्याग अगर बांटा जा सकता तो

ईश्वर भी कितना अजीब है कितने निस्वार्थ भाव से कभी कभी इस पृथ्वी पर कुछ ऐसे मनुष्यों को छोड़ जाता है जिनमें कुछ की जिन्दगी केवल कुछ ही समय के लिए होती है, कुछ को जिन्दगी भर मौत से लड़ते रहना होता है, कुछ को दास बनकर रहना पड़ता है, कुछ को हमेशा दुःख ही भोगना होता है....ये जिन्दगी भी कैसा भेदभाव करती है कि जिन्दगी के कुछ सुख सुखीवान व्यक्ति से बंट नहीं पाते..अभी तक न जाने कितनी कहानिया सुनी है कि यहाँ राम, भीष्म, अर्जुन, कुंती, कर्ण, श्रवण और न जाने कितने लोग ऐसे आये थे जिन्होंने केवल त्याग ही किया है वास्तव में ऐसा त्याग अगर बांटा जा सकता तो......


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कभी फूल मिलते है कभी पत्थर जिन्दगी तरसती है ख्वाब एक बनकर
कभी उड़ान या कभी गहराई बनकर, चला देती हैं नया परिणाम बनकर  
क्या सोंचा था क्या हो जाता है पाने के लिए सब खोता हूँ लुट-लुटकर    
गवाँना है सब कुछ जब इस जिन्दगी में तो प्रेम भी कैसे समझ लूँ न लेकर
देखूं प्रतिज्ञा में भीष्म पल रहे थे और  श्रवण पितृ भक्ति की कहानी ढोकर  
चाँद जहाँ है और प्यारी चांदनी वहां मैं बेसुध-निर्जीव पड़ा हूँ युग युगोत्तर
कभी राह मिलते है बेसहारे कही पर ढूंढता है उन्हें प्रभु नया जीवन देकर
कभी कैसे सहारा एक मिले, मंजिल भी दूर हो जाती है ठुकरा-ठुकरा कर

-प्रभात