Sunday, 6 December 2015

राम मंदिर छोड़िये...

मस्जिद बनाने वाले मुसलमान बताते है
मंदिर बनाने वाले खुद को हिन्दू बताते है
पर इंसान बनाने वाले को भगवान् बताते है  
बांटकर किसी फल के बीज को सताते है
क्यों हिन्दू और क्यों मुसलमान बनाते है
क्यों इंसान बनाने वाले भगवान बनाते है
पहले तो हिन्दुओं हरिश्चद्र और राम बनो
मुस्लिमों पैगम्बर और कुरआन तो बनों
पूजने वाले आजकल बाबर को पूजते है
स्वदेशी कबीर और रसखान को पढ़िए
बाबर छोड़िये नहीं तो देश हम बताते है
राम मंदिर छोड़िये नहीं तो राम-२ बताते है

-प्रभात 

Friday, 4 December 2015

कोई आभूषण हो तन में...

कोई आभूषण हो तन में तेरी ज्योति छिन जाये
तुम  हो  जो केवल मन में मेरे हौंसले बढ़ जाये
मैं सोंचू पल – पल तुझको तेरा रूप न हट पाये
ये होता है कैसे  बिन देखे ही दर्शन मिल जाये
तेरी बात ही ऐसी, सोंचू तो चेहरा खिल जाये
मेरी उम्मीद और ताकत का अंदाजा लग जाये
-गूगल
कोई आभूषण......................................
कितनी भी हो उदास राते, स्वप्न खुशियाँ लाये
सुबह को जगने पर तेरा प्यार मिला नजर आये  
कुछ पल न हो बातें साफ खामोशी दिख जाये
सोंचू मन से तो दो पल में मोती बन आसूं आये
खैर मेरी व्यथा व मेरा परिणाम, सब तुम ही हो
मेरी सफलता तब परिभाषा तुझको अर्पण हो
हरदम की खबरों में तेरा रूप विदित हो जाये
कोई आभूषण....................................
 -प्रभात  

Saturday, 21 November 2015

डायरी से ...

छोड़ कर घर अपना प्रेम का धन अपना किसी दृष्ट को तलाशती है

निरोग का जिस्म अपना नीर का प्रभाव भी सूखे नयनों को डुबाती है

प्रेम की करुण छाया में तो दशरथ सिधार गए, रामचन्द्र बनबास गए

समझ आया क्यों मंजिल की जुस्तजू में नयन भींगते-भाते चले गए


-प्रभात 

Friday, 23 October 2015

जब विविधता में एकता का प्रत्यक्ष प्रमाण हो

जब भारत की संस्कृति का विश्व में स्थान हो
जब रहन-सहन खान-पान में देशी लगाव हो
जब विविधता में एकता का प्रत्यक्ष प्रमाण हो  
-Google
जब बोली, भाषा का दूर–दूर तक प्रसार हो 
तो कौन सा समय है संस्कृति से खेलने का
राजनीति में प्याज और अरहर तौलने का  
किसानों की जमीन को तराजू में रखने का
देख नहीं रहे भारत की गरीबी भूखमरी को
कैसा संसद में बैठने बनने का अभिमान है
जाती-पाति से वोटो के लिए बेतुका बयां है
देश के विकास के भागीदार सभी समझ लो
किसानों की आत्महत्या के परिणाम देख लो
किसान अन्नदाता भूखा अब तक सो रहा
गन्ने उपजाने वाला केवल कर्ज में डूब रहा
जब भारत की दाल रोटी पर विदेशी छाप हो
जब गन्ने के गुण पर रसोईयों का गुणगान हो
जब बाजरे की रोटी और साग पर बाजार हो
तो इस स्थिति के लिए किसान क्यों बर्बाद हो
आजाद भारत में फ़ैली गरीबी में हिस्सेदार हो
जब यही की संस्कृतियाँ पूरे विश्व में जा रही हो
जब गाँव की परिभाषा का विस्तार हो चला हो
जब देश की महानता में सभ्यता दिख रहा हो
तो अपने ही देश में अब खतरे में क्यों है सभ्यता
मानवता की परिभाषा से दूर हो रही है सभ्यता
लड़कपन में बीमार करने आ गयी विदेशी सभ्यता
सभ्यता का पर्याय बन कर रह गयी अपनी सभ्यता
जब गुरुकुल की शिक्षा का प्रसार यही हुआ हो
जब नीति निर्माताओं का विश्व में नाम हुआ हो
जब प्रेम के लिए कृष्ण और महाभारत ग्रन्थ हो
तो मासूमों की जिन्दगी में आज आग लग गयी है
क्यों बेटियों की जिन्दगी भी दांव पर लग गयी है
धर्म को लेकर क्यों निर्मम हत्याएं आज हो रही है
जवाब है बहुत सारे समझ लो बस यही सभ्यता
अपने गाँव या शहर में बस चुन लो अपनी सभ्यता

-प्रभात 

Thursday, 22 October 2015

मेरी डायरी से...........

किसी की परवाह करूँ तो मुसीबत बढ़ सी जाती है
कोई मेरी परवाह करे तो बेचैनियाँ बढ़ सी जाती है
चाहता हूँ जीवन में रहूँ अकेले, कुछ याद किये बगैर      
-गूगल 
सोचूं अलग तो कैसे जिन्दगी उदास जो हो जाती है  

अभी तक सपनों में डूबा खुद को अंदाज रहा था
कभी उड़कर हंस रहा था तो कभी गिरे रो रहा था
पता चला मुझे हकीकत का, उस वक्त नही मगर
जब आँख खुली भी तो फिर सपनों में लौट रहा था  

-प्रभात  

Sunday, 18 October 2015

वास्तविक और संवेदनशील

हम नन्हों के सपनों में, आग कभी लग जाती है
जैसे खेतों में चिंगारी पूरे समुदाय को ले जाती है
-Google

हर हाथों में हौसले से अगर हिम्मत दी जाती है
तो बरामदे में लगे पूरे घोसले तोड़ दी जाती है

बालक-बालक जब दौड़ रहा रेल पटरियों के बीच में
माताएं-बहने मांग रही है, दो जून की रोटी भीख में
कर रही है गुलामी औरों की, बालक बेच दी कोख में
ठुकरा-ठुकरा दी जाती जब अधिकारों से क्रीड़ा द्युत में

ऐसे जिन्दगी के चलने में रुकावट एक दिन आ जाती है
जैसे मैखानें में हर दिन जाने से सांस कभी रुक जाती है

घर का छप्पर अगर कभी लगता तो कूड़े के एक ढेर में
कब तब बेघर हो न जाए, चिन्ता है पड़ा सरकारी क्रेन में  
सारी देह तपन में रंगी नन्हा बालक पड़ा किसी ट्रेन में
दौड़ रहे है बचा रहे है जीवन, आतंक से और इस आग में

ऐसे नाम होते आँखों में हिंसा एक दिन जब देखी जाती है
इन कोमल से हाथों में हिंसक हथियारों की बू आ जाती है

देख रहे है संसद की गतिविधियाँ लगी हुयी है, जो खाने में
उजड़ रहा है परिवार गरीब का रोजाना नए क़ानून आ जाने में
नहीं हो रहा सुधार तंत्र का, पुलिस ही लगी है देश लुटाने में
हत्या, रेप, डकैती करवाती और राजनीति है पीछे भड़काने में

मजहब, भाषा, जाति के नाम पर हत्या अब हो जाती है
फिर से हम नन्हों का जीवन अंधकारमय देखी जाती है 

-प्रभात   


  


    


Thursday, 15 October 2015

गीतों के सुर- साज न बदले, फिर भी लिखकर गाने लगा हूँ

कुछ न चाहत, फिर भी लिखा हूँ प्यार के बंधन में बधकर
गीतों के सुर- साज न बदले, फिर भी लिखकर गाने लगा हूँ

आज कहीं से याद है आयी, पुरानी भूली सी उन बातों का
Google
चेहरे अब कुछ कह रहे, याद कर उन छोटी कई लम्हों पर
लो पूछ ही लो तुम भी, भोली सी आज सूरत मेरी देखकर
आज तक मैंने रूप न बदले, फिर भी प्यार में बदलने लगा हूँ

कितने अरमान से तुम्हे मैंने चुना था, तेरी मोहक सी बातों पर
मोह में कोई कैसे बदले, ये खुद की आत्मा से पूछने लगा हूँ

न कोई मेरी तकदीर बदली है न मौसम के मिजाज है बदले
आज पुरानी बात न संभले, फिर भी उसी को दुहराने लगा हूँ

कुछ अंदाज था तुम्हारा जो, नाम बस तुम्हारे प्यार का हुआ   
सच पूछो तुम नही बदले, फिर भी रश्में अपनी निभाने लगा हूँ  

जैसे तुम आये थे हवा बनकर, उड़ कर चले गए दूर कहीं पर
रिश्ते कैसे बने थे, आज भी जानना चाहता हूँ इतना रुक कर
कोई परिभाषा मैंने अगर गढ़ी, बदला था मैं सब तुम्हारा होकर
तुम न बदले, न मेरी परिभाषा, फिर भी सब ये बताने लगा हूँ 

-प्रभात 

Wednesday, 14 October 2015

कुछ कहना है!

कुछ कहना है!

दोस्तों, आज वातावरण अनुकूल है. तभी लिखने बैठा. बहुत बार सोंचता हूँ और बीच में अपनी मन के बहस को छोड़ कर चल देता हूँ. कभी कभार जब उत्साह लिए कुछ पोस्ट जो मुझे आपके मुख रूपी पोस्ट बॉक्स से मिलते है तो उन्हें लेकर मैं टाइपिंग मशीन पर बैठ जाता हूँ. तुरंत ही मुझे उस ऊर्जा का उपयोग करने में आनंद आने लगता है. आज न जाने कितने दिनों बाद मैं अपनी कविता लिखने को विराम देकर कुछ लेख स्वरुप लिखने जो चल पड़ा हूँ वह भी किसी न किसी के पोस्ट बॉक्स की वजह से.

जब मैं अपने स्कूल में था तो हमें गुरूजी लोग बताया करते थे कि “अभी बहुत आगे आपको जाना है या तो अभी मन लगा कर पढ़ाई कर लीजिये नहीं तो बाद में तो करना ही पड़ेगा. यह आयु जिसमें अभी आप लोग हो इससे जब आप आगे जाओगे बहुत परेशानियाँ आयेंगी. वो दिन बहुत परेशानी वाली होगी आज तो आप लोग बच्चे हो हंसी आयेगी........... मेरी बात का कोई असर नहीं होगा परन्तु समयानुसार सब पता चल जायेगा”. शायद गुरूजी सही ही कहा करते थे उन बातों का अहसास तो समयानुसार अब ही हो रहा है. यह समय जिसमें हम कुछ कर रहे है बहुत ही भ्रामक और संदिग्ध सा लगता है. और वह भी तब और जब विश्वास अपने आप से ख़त्म होने लगता है. जो आप कल थे वो आज नही और जो आप आज है वह कल नही होंगे.

सब समय के अनुसार बदलता रहता है. यही तो जिन्दगी का मकसद है. आप शायद आज किसी बात को लेकर परेशान से होंगे और कल आप उन्ही बातों को लेकर हंस रहे होंगे. आज आप उसी परीक्षा में सफल नहीं हो रहे होंगे कल आप उसी में सफल हो रहे होंगे. आज आप को चाहने वाले बहुत है कल आपको चाहने वाले कोई नहीं थे या आगे आपको चाहने वाले कोई न होंगे. हमारी शक्ति जिस पर हम विश्वास करते है वह हमें दूसरों को देखकर कम और ज्यादा हो जाया करती है. यह आखिर क्यों होती है एक सवाल यह भी है. एक उदाहरण यह है कि आप के दोस्त अच्छी जगह पहुंच गए और आप वहां है जहाँ आपके दोस्त कभी आयेंगे ही नही और आप उन्हें सोंचकर अपनी जगह को किसी और के साथ समाहित कर रहे होते है. यह उदहारण हर किसी के साथ होता है और इस उदाहरण का परिणाम कभी बहुत बुरा होता है. जब यह बात समझने की कोशिश करते है कि हम आये अकेले है और हमारा मकसद कुछ और है. हम एक दूसरे से बिलकुल अलग बनाकर भेजे गये है तो आज हम किसी से तुलना क्यों कर रहे है अगर आप अपने आप पर विश्वास करके आगे बढ़ते है तो निश्चित रूप से सफल होंगे और आपकी सफ़लता अलग प्रकार की होगी और आप तभी भीड़ में पहचान भी सकेंगे.

रास्ते में मैं चल रहा था चलते चलते मैंने अपने प्रेमिका के मिलन की कल्पना करने लगा. मुझे कल्पना करते ही मुझे वही प्रेमिका हर किसी में दिखने लगी और इतना सशक्त कल्पना रहा कि कुछ ही छड़ों में मेरा उस प्रेमिका के सामने दर्शन भी हो गया. क्योंकि मैंने अपने अहसास इस तरह से जुटाए कि सब एक दूसरे से जुड़ते चले गए. पहले तो मैं प्रेमी बना और मेरे प्यार की इतनी शक्ति थी जिसे मैं हर किसी में इस तरह से देखा कि हर सामने वाले को देखकर मेरी साँसे बढ़ सी गयी मुझे बिलकुल अलग सा अहसास हुआ और मिलने के बाद तो मैंने बस हाथ ही बढ़ाया बात करने का अंदाज, मेरे चेहरे की चमक सब कुछ बदल सा गया. मेरे सोंचने का सन्दर्भ ही बदल गया. ऐसे वातावरण में जब ये सारे बल काम करने लग जाते है तो इन्हें कोई रहस्य बताता है और कोई सपना नाम देता है. मैं तो इसे सांख्यिकी के विषय का प्रायिकता का सवाल मानता हूँ क्योंकि ऐसा कभी कभी ही होता है जब सब कुछ अनुकूल हो. हाँ लेकिन यह शक्ति आपने किसी से चुराई नहीं यह आपके ऊपर निर्भर करता है और आप में समाहित है. जब आपने इस बात की कल्पना करनी शुरू की होगी तो शायद आपने मन से सोंचा था और मन से किया गया काम में एक अलग आनंद होता है जिसका अहसास आप तभी ले सकते है जब आप को उससे प्यार हो.

आप जिन्दगी में सपने बुन रहे होंगे और आप निश्चित रूप से उसमें सफल होंगे बस आपको हर चीज को अपनी तरह से व्याख्या करना आना चाहिए. जब आप सपने बुनने लगते है तो आपको कहीं पर अगर शक, हिचकिचाहट हो तो आप उसे अपने अन्दर से तुरंत बाहर करने की कोशिश कर लेनी चाहिए. किसी से “वो” यह कह रहा है, “वो” ऐसे है “वो” नहीं आप मैं शब्द केवल अपने पास रखे अहंकार किसी से भी न हो चाहे वह आप स्वयं क्यों न हो. क्योंकि आपने यह जरुर देखा होगा जो कल आप कह रहे थे आज आप उसके अतिरिक्त कुछ कह रहे है क्योंकि जिन्दगी में सब कुछ संभव और परिवर्तनीय है. जो आज अपरिवर्तनीय लगते है वह भी किसी न किसी रूप में परिवर्तनीय है बस आपको सोंचना है कि किस रूप में.

“जब में किसी इंटरव्यू के लिए गया और मैंने कुछ नहीं बताया. जब मैं परीक्षा दिया मैं असफल रहा. जब मैं किसी के सामने दिखता हूँ तो मुझे शर्मीला लड़का कहकर बुलाता है. जब मैं किसी के सामने आता हूँ तो मुझे बोरिंग कहकर पुकारता है. जब मैं किसी के सामने गया उन्होंने मुझे निराशावादी ही कह डाला. इतना ही नही हद तो तब हो गयी जब मेरे होने का ही उन्होंने सवाल उठा दिया.” ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि आप को वो नही जानते जो आपको देखकर आपसे ही कह रहे है या अपने आप से वो कह रहे है. वो कह रहे है ऐसा प्रश्न ? आते ही हम क्या कह रहे है इनपर उस पर ध्यान देने की जरुरत है. और आपको यह पता है ये जो कहा जा रहा है इसका सीधा सम्बन्ध यह है कि आप पर असर पड़े. निश्चित रूप से नकारात्मक असर ज्यादा होगा सिवाय सकारात्मक है. ऐसी बातो का जवाब आप अपने आप से पूछिए और अगर नहीं आता तो कल्पना कीजिये कि आपने किसी कारण -वश ऐसा सब होने दिया है और ये मायने नहीं रखते उनके विचार अपरिवर्तनीय है. वो तो सब एक सकारात्मक जवाब से या सकारात्मक कोशिश से बदल जायेंगे. बस आप इन्हें ही बदलने की कोशिश करें. आप के पास हो सकता है इंटरव्यू के समय किसी प्रकार का मानसिक दबाव बन पड़ा हो. हो सकता है आप उस वातावरण में आप कल्पना न कर पा रहे हो. आप चीज़ों को भूल कर अपने आप में विश्वास कर आगे बढिए.

सफलता और असफलता हर किसी को मिलती है आज सफलता कल असफलता. हर शब्द के दो रूप हो सकते है. यह भी परिवर्तनीय है तो बस आप परिवर्तन करते जाईये. प्रकृति का नियम है, और जिस दिन से आप यह समझ लेंगे कि जो कुछ है उसके लिए अगर आप जिम्मेदार है तो आप ही उसमें परिवर्तन कर सकते है. आप सफल तो होंगे. ऐसे समय में खुशिया मनाईये. असफलता के समय में धैर्य रखिये. आशावादी खुद से बनिए. खुद के लिए ही कीजिये तो बेहतर होगा. जहाँ तक संभव हो उन चीज़ों से प्रेम भी खूब कीजिये जिनसे आपकी जिन्दगी अच्छी रहने वाली है. जो आपका मार्गदर्शन कर सकें. आज इतना ही कहना है, जल्दी ही फिर मिलेंगे.


-प्रभात,
सधन्यवाद  

Friday, 2 October 2015

हिंसा कौन करे और अहिंसक कौन बने...

हिंसा कौन करे और अहिंसक कौन बने
लेकर कई प्रश्न जब हिंसा की ओर चला
बोला उसने पहले अपना खून करो  
और नहीं तो मेरा खून
मैंने कहा ये क्या है पहले मेरा कोई गुरु बने
जो समझाएं मुझे हिंसा के बातों को
बोला उसने किसी राक्षस से बात करो
डरते-डरते रावण से सपनों में ही बात हुयी   
उसने आते ही ऐसे चीखा
दांतों को ऐसे रगड़ा
कि बहरा ही हो चला
अब सुनने की जब बारी आयी तब तक
रावण जिन्दा था और थोड़ी देर में
शंख बजा श्रीराम आये
मेरा बहरापन दूर हुआ
रावण का खून हुआ
सपनों में ज्ञान हुआ
हिंसा को मारो या अहिंसक बनो
या तो हिंसा तुम्हे मारेगी या फिर तुम इसको
पापी हिंसक बने पुण्य के भागी अहिंसक बने
अब मैं हिंसा के पास चला और मैंने कहा
कि मैं अपना खून नहीं तुम्हारा करता हूँ
क्योंकि मैं अहिंसा का साथ देता हूँ
तुम्हारा खून नहीं किया तो मेरा खून होगा
और न जाने कितनों का सर्वनाश होगा
भीड़ हिंसा के साथ चलती है
अहिंसक एक होता है और अकेला
जो कि हमेशा जाना जाता है
भीड़ के साथ चलना मतलब अपना नाम डुबोना
समाज के कल्याण में भागीदार बनें और महान बने
एक खून के लिए कई खून न करो
या भीड़ में हिंसक न बनें और ऐसे फालोवर न बने
केवल अहिंसक बने और केवल अहिंसक बने

-प्रभात   

Thursday, 1 October 2015

डायरी के १० सितम्बर, २०१५ के पन्ने से

स्वागत है हर किसी का
जो हौंसले बढ़ाते हो
मैंने उम्मीद नहीं तोड़ा
तुम्हारी इन्ही खूबियों की वजह से
आज हूँ जहाँ वहां
कई तरह के जीव है
कोई हौंसले बढ़ाता है
तो कोई गिराता है
मकड़ी का जाला याद आता है जब
तब मुझे सहारा नज़र आता है
दिल  चाहता है कि मैं भी जाला बुनूं
नहीं प्रभात! तुम जाले बुनो मगर
ऐसे जाले जो कभी टूट न सके
उन जालो में केवल तुम्हारा घर न हो
बल्कि समस्त विश्व समाया हो
वह प्रेम का केवल रूप हो
उसे केवल तुम ही बना सको
ताकि लोग मकड़ी की तरह
तुम्हे याद कर सके
परन्तु याद रखना
कुछ हासिल करने के लिए
या किसी से और बेहतर करने के लिए
योगदान स्वरुप कोई न कोई होता है
ऐसे गुरु से ली गयी विद्या का
अहंकार कभी न हो

-प्रभात 

Tuesday, 29 September 2015

दूसरा ताजमहल नज़र आएगा

जिस वक्त पर मिल रहे है यह दूर अगर होता
चंद लम्हों की इन तस्वीरों में कहीं और होता  
प्रेम की प्रेरणा यूँ  इतनी सहज नज़र न आती
तकदीर बदल जाती और बात बिगड़ न पाती
यूँ रोशनी भी रहती और सादगी भी दिखती
नजरों में किसी पैमाने की बात उड़ न आती
पर कौन जानता है वह वक्त क्यों न आ पाया
जिस ओर रोशनी थी वहां तक जा न पाया
चला था सब कुछ छोड़ के यूँ मंजिल ढूँढने
बाकी सब कुछ पाया पर वह वक्त न आया
बीत रहा है जीवन इन्ही सपनों की उड़ान में  
पथरीली राह में और दुर्गन्ध तूफानी बयार में
हौंसला है कभी यहाँ गुलफाम नज़र आएगा
जब वो नज़र आयेंगे तो संसार नज़र आएगा
अभी तो केवल “शब्द केवल” से मिल रहे है
क्या पता यहाँ दूसरा ताजमहल नज़र आएगा  
-प्रभात 

Monday, 14 September 2015

महत्व रूपी दृश्य देखने के लिए कमी रूपी दर्पण का होना आवश्यक है !

महत्व रूपी दृश्य देखने के लिए कमी रूपी दर्पण का होना आवश्यक है !  

आज जो भी हूँ
केवल तुम्हारे वजह से
तुम्हारे सपने पूरे हो गये है
तुम्हारे इच्छा की पूर्ति आज हुई है
बस जो तुमने चाहा वो सब हुआ
क्योंकि मैं तुम्हारे राह पर चला
परन्तु एक कमी है
वह यह कि तुम ही नही रहे
ये समय का सच है
समय के अनुसार
मैंने चलने की कोशिश की
मगर लगता है हार गया
ये कमी मुझे खलता है
तुम होते तो आज
इस तरह से ये शब्द
यहाँ नही लिखने पड़ते
तुमने देखा नहीं तो
अब मैं ये कैसे किससे कहूँ
कि तुम मेरे संजय हो
और तुम हर दृश्य से अवगत हो
तुम व्यास हो
और हर समय से अवगत हो
प्रभात
 


Sunday, 6 September 2015

मेरे पिताजी

                           मेरे पिताजी

एक सच्चे, अच्छे और नेक इरादों की पहचान है पिताजी
बचपन से लेकर अब तक सहारे की खदान है मेरे पिताजी

अँधेरे में रोशनी दिखाते
मुसीबत से हर निकालते
भीड़ में हाथ पकड़ते
हर किसी खड़ी मंजिल के आधार है पिताजी
शिक्षक, वैद्य जैसे गुणों के सरताज है पिताजी

असफलता में साथ देते
सुलझे से ख्वाब देते
चेहरों को जो पढ़ लेते
असीम साहस त्याग के परिचायक है पिताजी
प्रीत, लगन, अनुपम प्यार के सार है पिताजी

वृक्ष की तरह छाया देते
फूल की तरह मुझे सींचते
तूफ़ान से हर बचा लेते
जो भी हूँ जैसे भी अब तक उसके कारण है पिताजी
चिंता, क्रोध, असाध्य रोगों के निवारण है पिताजी

संतान सुख के लिए लड़ते
युद्ध रण-भूमि में चल पड़ते
अन्याय कभी सहन न करते
खुद कष्ट सहकर मुझे हंसाने के लायक है पिताजी
मेरे घर से लेकर संसार तक के सहायक है पिताजी

हर समय एक नया सीख देते
परिवर्तन की, है बात करते
असंभव को संभव बनाते
अनुभव, अनुशासन, आचरण के ज्ञान है पिताजी
मुझे लगता है मेरे लिए एक ही भगवान है पिताजी

-प्रभात  

Sunday, 30 August 2015

उपस्थिति में अनुपस्थिति का आभास कर ले..........

उपस्थिति में अनुपस्थिति का आभास कर ले
युद्ध को शीघ्रता से विराम कर ले

झगड़ा नही है कोई मानव धर्म
महाभारत से जाना है धर्म-अधर्म
जीवन के कुछ दिन बेहिसाब मिले है
खुशियों के लिए सौगात मिले है
दो-चार दिनों में सम्पूर्णता का आभास कर ले
उपस्थिति ...............(1)

जीवन है एक पतवार समझो
खेकर सही किनारे लगाकर देखो
मिलती है खुशियों का अनुपम उपहार
कुछ पा लेने और कुछ करने का साहस अपार
थोड़े में ज्यादे का आभास कर ले
उपस्थिति ...............(2)

लक्ष्य दिखे बस अर्जुन जैसा
जो चाहे बन जाए वैसा
मोह-प्रेम और अपने में विश्वास रहे
क्रोध, जलन और भय से दूर रहे
असफलता में सफलता का आभास कर ले
उपस्थिति ................(3)

-प्रभात