Friday, 2 October 2015

हिंसा कौन करे और अहिंसक कौन बने...

हिंसा कौन करे और अहिंसक कौन बने
लेकर कई प्रश्न जब हिंसा की ओर चला
बोला उसने पहले अपना खून करो  
और नहीं तो मेरा खून
मैंने कहा ये क्या है पहले मेरा कोई गुरु बने
जो समझाएं मुझे हिंसा के बातों को
बोला उसने किसी राक्षस से बात करो
डरते-डरते रावण से सपनों में ही बात हुयी   
उसने आते ही ऐसे चीखा
दांतों को ऐसे रगड़ा
कि बहरा ही हो चला
अब सुनने की जब बारी आयी तब तक
रावण जिन्दा था और थोड़ी देर में
शंख बजा श्रीराम आये
मेरा बहरापन दूर हुआ
रावण का खून हुआ
सपनों में ज्ञान हुआ
हिंसा को मारो या अहिंसक बनो
या तो हिंसा तुम्हे मारेगी या फिर तुम इसको
पापी हिंसक बने पुण्य के भागी अहिंसक बने
अब मैं हिंसा के पास चला और मैंने कहा
कि मैं अपना खून नहीं तुम्हारा करता हूँ
क्योंकि मैं अहिंसा का साथ देता हूँ
तुम्हारा खून नहीं किया तो मेरा खून होगा
और न जाने कितनों का सर्वनाश होगा
भीड़ हिंसा के साथ चलती है
अहिंसक एक होता है और अकेला
जो कि हमेशा जाना जाता है
भीड़ के साथ चलना मतलब अपना नाम डुबोना
समाज के कल्याण में भागीदार बनें और महान बने
एक खून के लिए कई खून न करो
या भीड़ में हिंसक न बनें और ऐसे फालोवर न बने
केवल अहिंसक बने और केवल अहिंसक बने

-प्रभात   

9 comments:

  1. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    नई पोस्ट : तलाश आम आदमी की

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  2. अपने ब्लॉगर.कॉम ( www.blogger.com ) के हिन्दी ब्लॉग का एसईओ ( SEO ) करवायें, वो भी कम दाम में। सादर।।
    टेकनेट सर्फ | TechNet Surf

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (03-10-2015) को "तलाश आम आदमी की" (चर्चा अंक-2117) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. सार्थक रचना की प्रस्‍तुति।

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