Sunday, 20 April 2014

विचारों की दिशा....

विचारों की दिशा

     आप सभी लोगों के स्नेह ने मुझे एक ऐसे विषय "विचारों की दिशा" पर लिखने को प्रेरित किया जिसका मन मैंने पिछले महीनों पहले बना लिया था और आज अचानक ही मुझे लगा अब तो शुरुआत कर ही देनी चाहये। विचार हर किसी के एक जैसे नहीं हो सकते इनमें कुछ न कुछ भिन्नता जरूर देखने को मिलती है. दिशा एक ऐसा शब्द है जिसे मैं यहाँ उसकी और प्रतिबिंबित करने की कोशिश ही केवल नहीं कर रहा हूँ अपितु इस शीर्षक को एक नयी राह देने की कोशिश कर रहा हूँ।
     इस बात की प्रमाणिकता का सवाल नहीं उठाया जा सकता की आज केवल- केवल विचारों ने या तो नयी सकारात्मक दिशा दी है और या इन्ही ने इसे नकारात्मक दिशा दे डाली है. यह हम सभी पर है की हमारे विचार किस दिशा की तरफ रूख करे. यह उसी प्रकार से है जैसे हमारे हाथ में गाड़ी हो और हम चाहे तो इसे आगे एक ऐसे रास्ते की तरफ मोड़ दे जिधर सन्मार्ग का रास्ता हो या फिर उसे उस तरफ मोड़ दे जिधर हमारा कोई अस्तित्व ही न रह सके. मुझे लगता है अब तक मैंने अपने विचारों की दिशा से आपको भलीभांति परिचय करा दिया हूँ. मैं जहाँ भी जाता हूँ वहां मेरे विचार उस स्थान की वजह से बदल जाते है.। मदिरालय में मेरे विचार कुछ और होते है तो मंदिर में कुछ और! अब मैं जब अपने विचार की दिशा को बदल रहा होता हूँ तो मुझे आनंद भी आता है और कभी कभी ख़राब अनुभव होता है। इसकी चाभी मेरे पास होती है और मैं उसी हिसाब से दिशा बदल लेता हूँ जिधर मेरा विचार घूमता है. जब हम कभी किसी बात पर थोड़ी बहस कर रहे होते है तो विचारों की दिशा कोई और होती है और जब उसी बहस से गाली-गलौज होने लगती है तो कुछ और, क्योंकि अब इसकी दिशा ने नकारात्मक स्वरुप ले रखा है.
     मैं ट्रैन में था मुझे विचार आया कि कुछ पढ़ लेते है संयोग से वहां कुछ ऐसी परिस्थिति थी कि वहां पढ़ नहीं सकता था क्योंकि सामने एक सुन्दर सी लड़की बैठी थी और वह मुस्कुरा रही थी. यह मुस्कराहट मुझे लगा कि उसे मुझे देख कर आया परन्तु जब मैंने देखा की वह एक मोबाइल को देख कर मुस्कुरा रही थी आभास हुआ की मेरे विचारों की दिशा पलट गयी वह तो अपने मोबाइल के चित्र या किसी के सन्देश देखकर मुस्कुरा रही थी मैंने उस समय मन ही मन मुस्कुराया जरूर था।  उसे मुस्कुराते देख कर मुझे ऐसा लगा की विचारों की दिशा तो एक सी है क्योंकि अचानक ही इस मुस्कराहट ने हम दोनों को आमने सामने कर दिया था. शब्द स्वर में समाहित न थे पर वे संकेत मुझे दिल में समाहित करने के लिए बहुत थे. हम कभी अनजान थे इस सफर में तो कभी मिले जुले स्वरुप में. और विचारों की दिशा ने ऐसा खेल खेला की मुझे यहाँ लिखने पर मज़बूर जरूर कर दिया हाँ इतना जरूर हैं की आज तक हम ट्रैन में मिलते जरूर है पहले की तरह पर वह किरदार निभाने वाली कोई और होती है।  उसने तो अपने विचारों की दिशा ही बदल डाली!
    घर पहुँच कर लगा की मैंने तो ऐसा काम किया हैं, दिल्ली में रहा हूँ ७ साल, पढ़ा हूँ, फिर फ़ैल भी हुआ हूँ और पास भी पर बहुतं कम। फिर भी अब मैं कुछ बनने जा रहा हूँ .… और अब तो जल्द ही दादी को कह सकूंगा की आपका नाती आपके जीते जी शादी कर लेगा पर घर जाकर मेरा विचार बदल गया क्योंकि घर का माहौल ऐसा था की मेरे विचारों को कुछ नयी दिशा दे डाली क्योंकि दादी जी अभी स्वस्थ थी और वो चाहती थी की मैं कुछ ऐसा करूँ जो सबसे अलग हो, जिसका हर जगह नाम हो. ऐसा करने की हिम्मत देने वालों की संख्या अँगुलियों पर होती है पर न हिम्मत देने वालों के विचार फेसबुक में कुल की संख्या के बराबर थी! मेरे विचारों की दिशा हर किसी से अलग लगती है अगर कभी कुछ नकारत्मक मोड़ आता है तो मेरे कुछ अन्य विचार स्वतः अँगुलियों से गिने जा सकने वाले लोगों से मिलते है जो मुझे सकारात्मक राह दिखला देते है.

 वे हमेशा झगड़ते है, वे हमेशा मारते है, वे हमेशा चिढ़ते है आदि ऐसी लाइनें है जिनके विचार एक जैसे नहीं होते और वे यही रास्ता चुन लेते है क्योंकि अपने आपको वहां ये ऊपर रखने की कोशिश करते है और मेरे विचार को दबाते है जबकि रास्ता एक है आप विचारों की दिशा को समझे और उस तरफ रूख करे जिधर उसका सकारात्मक निष्कर्ष निकलने वाला हो. मैं खुश हूँ आप खुश है केवल इस लिए क्योंकि आपने विचारों की दिशा को समझा और जाना है आपको अंदाजा है उस रास्ते की और जाने का जहाँ आप अपने विचारों का अच्छी तरह सद्पयोग कर सकेंगे।

    मैं उन्हें समझा रहा था जो आज तक न मिले थे और उन्हें ज्ञान दे रहा था जिन्हे जरुरत भी नही. ऐसा इसलिए था क्योंकि विचारों की दिशा उस तरफ थी जिधर मुझे अहसास हुआ की यह एक ऐसे मोड़ से गुजरेगा जहाँ सुकून होगा। ऐसा हुआ भी पर उन्हें इस बात का आभास न था की मेरे विचार उनके लिए क्या थे उन्हें अगर होता भी तो वे बहुत आगे निकल गए थे क्योंकि कोई दूसरा एक ऐसा वातावरण तैयार कर लिया था जिनके विचार उनसे मिलते थे. और नकारात्मक राह की तरफ मुझे जाना पड़ा.।फ़िर अचानक ही मेरे विचारों की दिशा पलट गयी और फिर वैसे हो गया जैसे मुझे जरुरत थी भविष्य में जाने की. यह मेरे विचारों की परिणति थी और कुछ नहीं।

  विचारों की दिशा में अभी इतना ही आगे फिर इसी दिशा में रूख करेंगे<<<<<<<<<
   



Thursday, 17 April 2014

मुझे काटों में चुभा समझ लो।

  फूल समझो या फल समझ लो
मुझे राहों में खिला समझ लो
तुम राही नजरअंदाज कर लो
या चाहो तो मेरा गम समझ लो


 मेरा जीवन तुमसे अच्छा है
समझने वाले खुद से समझ लो
पैरों से नहीं पर से समझ लो
तुमसे अच्छा मेरा जीवन है



 थोड़ा अपने को तुम खुश रख लो
बस आगे बढ़ने की बात हो जब
निश्चल सोच से तुम निकल लो
मुझे काटों में चुभा समझ लो....


-प्रभात