Thursday, 17 April 2014

मुझे काटों में चुभा समझ लो।

  फूल समझो या फल समझ लो
मुझे राहों में खिला समझ लो
तुम राही नजरअंदाज कर लो
या चाहो तो मेरा गम समझ लो


 मेरा जीवन तुमसे अच्छा है
समझने वाले खुद से समझ लो
पैरों से नहीं पर से समझ लो
तुमसे अच्छा मेरा जीवन है



 थोड़ा अपने को तुम खुश रख लो
बस आगे बढ़ने की बात हो जब
निश्चल सोच से तुम निकल लो
मुझे काटों में चुभा समझ लो....


-प्रभात 

12 comments:

  1. बहुत सुन्दर और सार्थक।
    --
    आपका ब्लॉग फालो कर लिया है।
    अब फीड मेरे पास आतीं रहेंगी ।

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    1. तहे दिल से शुक्रिया !

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (17-06-2014) को "अपनी मंजिल और आपकी तलाश" (चर्चा मंच-1646) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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    1. शुक्रिया पढ़ने के लिए.....

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  4. मन के सुन्दर निश्छल भाव.....

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  5. बहुत बढ़िया।

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    1. बहुत धन्यवाद!

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