Tuesday, 21 February 2017

विहान

यूँ ठहर गया है चाँद जैसे झिलमिल सा संसार जैसे 
खुशबूं का अहसास जैसे पावन हरिद्वार जैसे
महलों का जीवन है, सोने में लिपटा हुआ है
सब कुछ मिला हुआ है, जीवन खिला हुआ है
फिर अँधेरा क्यों है, बदली है आसमान में जैसे
सूरज नहीं तो सवेरा कैसे, चिड़ियों का बसेरा कैसे
शायद बदला है इंसान जैसे, प्रेम और प्रमाण जैसे
रामायण में श्रीराम जैसे, सीता का अपमान जैसे
अभिमन्यु है मैदान में जैसे, छूट गया सब साथ कैसे
सूख गया है तालाब जैसे, व्याकुल है शैवाल जैसे
होता वही आया है, लिखे गए जो विधान जैसे
मन चंचल है अब भी, थोड़ा तो समझ लो छुईमुई 
जागृत होगा पुनः रोम रोम, होगा जीवन प्रेम मयी
तिमिर छटा होगा वैसे, होगा विहान हृदय में जैसे

-प्रभात

Sunday, 19 February 2017

अंतिम ख़त

प्रिय रागिनी,
खतों के इस सिलसिले में मैंने अभी तक सैकड़ों ख़त लगभग तुमको लिख लिए है...कुछ को तुमसे छिपाया है कुछ को सबसे छिपाया है....मतलब तुमसे छिपाया तो इसका मतलब खुद से छिपाया...लगता है मैं तुमसे प्यार करता हूँ...अब तुम्हें तो यकीन हो गया होगा....लेकिन मुझे लगता है इस बार रागिनी तुम पत्थर नहीं मैं पत्थर हूँ”....क्योंकि तुम प्यार करती हो और मैं शिला बनकर तुम जैसे पवित्र नदी का मार्ग बंद कर देता हूँ...मैंने इसलिए ख़त लिखा की हर आशिकी की कहानी में प्रेमिका कुछ यादें अक्सर छोड़ जाती है...तुमने भी छोड़ दिया है भौतिक और नैसर्गिक दोनों ही बातों में....यादें मगर किसकी.....कुछ गुलाब के फूल की तो उसकी कुछ खुशबूं भी....कुछ गीत.....कुछ चंचल मन में थिरकती जिस्म का कोई इक हिस्सा और उस पर मधुर सौन्दर्य का एहसास कराती सूरत पर हंसी की वो गहराई, जिससे मैं ही शर्मा गया था...कुछ पल के लिए.

लिबास पर महक अब भी बरकरार है तुम्हारी साँसों की. तकिया बनकर संभाला तो मैंने ही था.....उन यादों का क्या, उन एहसासों की जो मेरे साथ २४ घंटे प्रतिध्वनि के साथ मुझसे बाते करवाते है .... क्या उनकी हत्या कर दूँ ...नहीं न....
तुम्हें .....याद है न तुम्हारे दांतों की कहानी ...अब मुझे तो याद नहीं...अक्सर बतियाते रहते है सुबह सुबह मेरे और तुम्हारे टूथब्रश इक साथ ही..पता नहीं क्या कहते है ...शायद यही कि तुम मुझे छुपा क्यों नहीं देते....मेरे और तुम्हारे बीच झगड़ा हो गया है उन्हें भी मालूम है.....इन सबके बावजूद कुछ न कुछ पता नहीं क्यों दिन रात तुम्हारी याद दिलाते है....शिला बनने के बाद भी मैं टूटना चाहता हूँ और मिट्टी में मिल जाना चाहता हूँ ...ताकि इश्क में दूरियों का प्रेम न तो अहसास करा सके.... न पास आ सके और न ही दूर जा सके .....न ही कभी मिल सके और न ही कभी बिछुड़ सके.....हाँ मैं टूट जाऊँगा जल्द ही देखना ये है कि मुझे तोड़ने के लिए अब किस ताकत का इस्तेमाल होगा और कौन करेगा.....सबसे पहले तुम या और मैं खुद ही......

चिंता मत करों रागिनी....तुम्हारे लिए इस वर्ष का आख़िरी ख़त शायद यही है.....इसके बाद बसंत ऋतु खत्म और उसी के साथ ये प्यार भरा ख़त भी लिखना बंद हो जाएगा....माफ़ करना मुझे परन्तु लोगों की इच्छा ही यही है....प्यार और इजहार करने का समय तो होना ही चाहिए.
तुम्हारा 
प्रभात
(तस्वीर गूगल से साभार)

Friday, 17 February 2017

वो अजब रात

वो अजब रात याद आते रहे

शब्द बुनते रहे यूँ सुनाते रहे
बात होती रही तुम पास आते रहे
फोन कट गया लगा फोन आते रहे
वो अजब रात ...
प्यार में गले लगते लगाते रहे
नींद को तुमसे बाँट लेते रहे
बात होने के बाद राह तकते रहे
वो अजब रात...
हुई बातें सोंचकर मुस्कुराते रहे
इश्क़ में तुमसे जुड़े जाते रहें
दोस्त कहकर फिर रुलाते रहे
वो अजब रात...
-प्रभात
(20/01/17)
तस्वीर गूगल साभार

अहसास

पुलिया के पास से गुजरती उस रेल को मैंने एक दिन देखा तो था..उसी रेल के एक डब्बे की तरह तुम दौड़ती हुयी बेहद करीब पहुंच गई थी नहीं पता था...इतनी जल्दी तुम आकर मुझे गले लगा लोगी। पास में बहते हुए नदी की धारा के तीव्र वेग के साथ मेरे रूह को छूती हुई सरयू का पानी शायद तुम्हारे अहसांसों में लिपटी हुयी थी। सरसों के लहलहाते खेतों में दूर तलक एक सन्नाटा पसरा हुआ था...सूरज भी डूब रहा था....इस डूबते सूरज को देखकर तनिक एहसास तो हुआ कहीं हो न हो मेरे अंदर का प्रभात भी काफी कम समय में निराश हो गया था...
कहाँ पता था कि दौड़ती रेल की पटरियों पर मेरा और तुम्हारा इस तरह आकर स्नेह से मिलना शायद जिंदगी की पटकथा का ऐतिहासिक क्षण होगा। थोड़ी देर में अँधेरा जब अपना असर दिखाने लगा था...तो हमें डर तो लगा, लेकिन कुछ जगमगाते जुगनुओं के प्रकाश में मुझे यह एहसास हो गया था कि प्रभात अपना असर जल्द ही उसी जगह पर आलोकित सूरज के साथ ही दिखाने लग जाएगा...आ जाओ रागिनी हम एक दूसरे को इस अन्धकार में भी देख लेंगे...हाथों से छुए बगैर केवल सुनकर तुम्हारे दिल की धड़कन और रेल की पटरी पर आवाज।


-प्रभात