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Tuesday, 1 June 2021

काश सब अच्छा होता

 इन आंखों में अजब सी कशमकश है

काश सब अच्छा होता

उदासी हर तरफ है, लाशें हर तरफ हैं

काश कोई किनारा मिलता तो अच्छा होता

बढ़ी बेचैनी और झिलमिलाहट जिंदगी में

सब तरफ पसरा सन्नाटा आंगन में

महफूज कौन है, किसका साया है ऊपर

काश सब कुछ न उजड़ता तो अच्छा होता

प्रतिद्वंद और प्रतिकार में जी रहे हैं वो

किसी की मौत का इंतजार कर रहे वो

उन्हें मालूम नहीं कि जन्नत में कौन है एकाकी

काश कोई तो निहार पाता तो अच्छा होता

ये अंधेरा है, मालूम नहीं चांद भी देखेगा

अस्तित्व की बात है कौन अब रहेगा

सूरज तो निकलना बहुत दूर की बात है

काश अंधेरा ही छटता तो अच्छा होता

काश सब अच्छा होता!

#प्रभात

प्रभात

(मां के बीमार होने पर और बस में बैठकर लिखी पंक्तियां)

7-5-21

कर लो सारी संपत्ति सीज महामहिम

कर लो सारी संपत्ति सीज महामहिम

मैं तो चिल्लाऊंगा सिस्टम कोलैप्स हो गया

मेरी गुड़िया नहीं रही, मेरी पत्नी नहीं रही

मैं तो भड़काउंगा सब बिना इलाज हो गया

सुबह ही डॉक्टर ने माना कोविड नहीं

फिर नो मोर का सिग्नल देने आ गए

सुबह ही कार से आये थे छोड़ने

और अब अर्थी उठी है

सुबह ही सुबह ही सुबह ही सब गजब हो गया

घर में कोई नहीं बचा, सब अनाथ हो गया

माता जी तो मुंह से फूंक भरती रही हैं साँसों के लिए

आज वो बाप भी बहुत दूर निकल गया

कोई सिलेंडर लाते लाते निकल गया,

कोई कांधे में लादे लादे निकल गया



हैरत में हूँ कि कुर्की जब्ती में लाशों का कोई मोल नहीं सरकार!

क्या कुछ बचा है वही लूट लो अबकी बार

अच्छा बैठे हो गद्दी पर जब तक बैठे रहो

तुम्हारी दुकान तक कोई तो आएगा ही सही!

तुमको लाशों से सजाने कोई आएगा ही सही!

......

#प्रभात

Prabhat

25-04-21

मीडिया पर सवाल

सवर्ण मीडिया, बैकवर्ड मीडिया, धार्मिक मीडिया और बहुजन मीडिया सब लोग सुनें- ये सब आपने बनाया है, पत्रकारिता में इसका कोई स्थान नहीं होता। मैं इसका पहले से ही विरोध करता आया हूँ। मीडिया और मीडियम दोनों का मतलब समझिये और उसी के आधार पर काम करिए। वरना सच तो यही है कि फोर्थ पिलर बंटा हुआ है। बहुत नफरत लिए।

अगर आप वास्तव में पत्रकार हैं तो आप दिन रात किसी न किसी काम को लेकर खोए रहेंगे। किसी आम लोगों के काम को लेकर। काश मैं उसका ये काम करा पाता। आप जी जान लगाकर कम से कम उतना कर सकते जितना आपसे उसे हेल्प चाहिए। लेकिन बात ये है कि आप के पास नौकरी और उसके एसाइनमेन्ट के बाद शायद आप खाली ही नहीं रहते और फिर किसी और से सोशल होते ही नहीं। क्योंकि ज्यादा नजदीकियां बनाकर रखेंगे तो आपके साथ दिक्कत ये है कि कभी आप से वो काम लेने की बात करेगा। लेकिन आप उन्हें। फेवर तो दूर अपना रेपुटेशन जिसमें आप समझते हैं वही बनाने में लगे रहते हैं। आप जरा भी ध्यान या उसका काम नहीं कर सकते। आप सिर्फ उसकी बात की सुनकर एवाइड करेंगे या फिर उसके दुख में एक शब्द बोलकर चुप हो जाएंगे। आप चाहें तो उसकी खबर लगवा सकते हैं अगर उसके साथ कुछ गलत हुआ है। आप चाहें तो उसकी बात को एज ए मीडियम खुद भी उठा सकते हैं और आप चाहें तो अपने कॉन्टेक्ट्स से उसे उसका हक दिला सकते हैं उसके लिए न्याय दिला सकते हैं।

लेकिन बात ये है कि आप समारोह की खबरें निकालेंगे। आप तो ऐसी खबरें निकालेंगे जहां आपको पैसा मिले, ख्याति मिले, प्रतिष्ठान में वाह वाही और बुके सम्मान मिले। आप तो खुद मना करेंगे। उसकी खबर को रोक देंगे। और रिपोर्टर तो कहना ही नहीं चाहता क्योंकि उसे डांट मिलेगी या फिर उसे उस काम में मेहनत करने से उसका सम्मान चला जायेगा। ये भी कहा जायेगा ये तो दूसरे का काम है। आपका अपना काम होगा तो आप तड़पने लगेंगे और फिर अगर आप किसी तरह उस मीडिया से बाहर हुए तो आपकी आवाज को उठाने वाला भी कोई नहीं रहेगा। ये फेसबुक पर एडिटर, रिपोर्टर और बड़े बड़े जगह की प्रोफाइल लगाकर केवल खुद की वाहवाही करवाना पत्रकारिता बिल्कुल भी नहीं है।

और अगर आप किसी का ध्यान नहीं रख पाते और किसी की इमेरजेंसी में सहयोग नहीं कर पाते तो आपका एडिटर, रिपोर्टर होना तो नाम की बात है दरअसल आप क्लर्क और चपरासी हैं उसमें कि आपने उस प्रतिष्ठान में अपने लिए कोई स्पेस नहीं पाया है। सोचकर देखिये आपके पास किसी का इनबॉक्स आये कि मेरी मदद कीजिये, ऐसी बात है...

आप उसके पोस्ट को सीन करके देखकर निकल लेते हैं। रिप्लाई तक देना उचित नहीं समझते या फिर उसके रिप्लाई में दुख व्यक्त करके निकल जाने में अपना भला समझते हैं तो क्या इसी काम के लिए कोई आपसे संपर्क करता है। या फिर आपको सूचना मिली कि आप शायद किसी के बुरे  दिनों में काम आ सकें लेकिन आपने तो उसे अनसुना कर दिया क्योंकि आपका लेवल आपके हिसाब से उसके काम लायक नहीं है। यकीन मानिए आपके साथ भी कभी कुछ होगा तो आप तड़पेंगे। आपको तो कोई मिलेगा ही नहीं। आप इस फील्ड अगर मजे लेने या पैसे कमाने के लिए आये हैं या फिर सरकारी नौकर बनने तो आपमें और फिर पत्रकार में बहुत अंतर है। आप पत्रकार नहीं हैं। न ही ऐसा शब्द आप पर शोभा देता है।

इसलिए मेरे पत्रकार दोस्तों आप अपनी जगह पहचानिए हो सकता है आपके काम कोई आ जाये या आप ही किसी के काम आ जाएं।

मतलब आंखों को गड़ा कर रखिये, ऐसा कुछ करिए जिससे आपकी आंखों के सामने कुछ गलत न हो सके। हां आपको इन समस्याओं को देखकर कभी कभार नींद नहीं आएगी। लेकिन जब आएगी तो बड़ी तसल्ली मिलेगी। जिंदगी का सुनहरा दिन होगा। मुझे आम लोग चाहिए, मुझे ओहदा देखकर आभासी दुनिया मे या रियल दुनिया में मित्रता करने में जरा भी दिलचस्पी नहीं है। आप चाहें तो मुझसे अलग हो जाएं ...

"इन सबसे अलग बात एक और कि आप दलित हैं और दलित आपके लिए केवल मायने रखता है। अगर आप ब्राह्मण हैं तो आपके लिए केवल सवर्ण मायने रखता है और आप ओबीसी हैं तो आपके लिए बैकवर्ड मायने रखता है। अगर आप इस बेस पर पत्रकारिता करने में लगे हैं तो आप पत्रकार नहीं घनघोर जातिवादी चोला पहने हैं जिसमें इंसानियत नहीं बल्कि एक विशेष जाति के खिलाफ घृणा हैं। यही  घृणा ही आपको पत्रकार बनने से रोकता है। क्योंकि आपके लिए एंगल केवल जाति और धर्म होता है।"

#प्रभात

Prabhat

13-6-20

जब बहुत याद आती हो

 जब बहुत याद आती हो किसी की तो कुछ भी लिखा नहीं जाता

जब याद ही नहीं आती किसी की तो और भी नहीं लिखा जाता

हां, लेकिन उसे लिखना हो तब

साथ की जरूरत होती है उसकी, लेकिन तब जब उसका साथ ही नहीं होता



जब बीते पल बहुत दूर हों, लेकिन मन उन्हीं पलों में खो जाता हो

कुल मिलाकर न लिखने में भी सुकून नहीं, लिख लेने में भी सुकून नहीं

क्योंकि उसे पाने में भी सुकून नहीं और उसके चले जाने में भी सुकून नहीं

फिर लिखा जाता है उसके आने और जाने के फासलों के दरमियाँ

एक खूबसूरत सा प्रेम जो किया नहीं, जो मिला नहीं बस एहसास किया है...

#प्रभात

Prabhat

6-6-20

ठहरता है क्या समय?

ठहरता है क्या समय?

नहीं, लेकिन ठहरना चाहिये
ताकि मैं अपने पुराने पन्नों को उलट सकूं
और फिर जो कुछ हुआ उसे भूल जाऊं
कभी चाहूं तो सपनों को संजों लूं


और फिर समय को फिर अपने साथ चलाऊं
लेकिन समय का ठहराव तो जिंदगी में ठहराव है
जहां सांसे बंद होने लगती हैं
घुटन होने लग जाती है
सब कुछ पुरानी बातें याद आती हैं
लगता है कि अभी बस मैं रोक लूं सब कुछ
लेकिन सब कुछ नहीं होता
बंद हो जाता है फट से दरवाजा
और मैं, मैं नहीं रह जाता!
तस्वीर- गूगल इमेज साभार

मैं ही सोचता हूँ या आप भी?

 मैं ही सोचता हूँ या आप भी?

मैं सोचता हूँ कभी कभी। हां कभी-कभी क्योंकि लगता है कि मैं कभी कभी ही कुछ लिखता हूँ। हां तो मैं सोचता हूँ कि ये दौर क्या 1947 के पहले का है जब हमारे देश के लोग ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ समाचार पत्र में तरह तरह के उपाय करते  थे। वे अप्रत्यक्ष रूप से लिखते थे और ऐसा कुछ व्यंग्य के माध्यम से कह देते थे कि देश के लोगों को समझ आ जाता था कि किसकी बात हो रही है। वे हिंदी भाषी और क्षेत्रीय भाषाओं के महत्व को समझते थे इसलिए वे इन्हीं भाषाओं से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कुछ न कुछ प्रेस में लिख ही देते थे। कभी कविता लिखते तो कभी कहानी। ऐसा वे इसलिए करते थे क्योंकि अंग्रेज कभी भी उकसाने के आरोप में या दंगा भड़काने के आरोप में इन लेखक या पत्रकारों की गिरफ्तारी कर सकते थे।

आज सोचिए यह दौर है जब मैं अपनी अंगुली से यहां टाइप कर रहा होता हूँ तो दस बार सोचता हूँ कि कहीं किसी मेरे पोस्ट से सरकार को आपत्ति हो और सरकार विरोधी पोस्ट के एवज में मुझे देशद्रोही बता दे। कहीं उकसाने या भड़काने का आरोप न लगा दे। फिर भी मैं लिखता हूँ लेकिन सोचता जरूर हूँ कि अपनी तरफ से लिखने को लेकर हमेशा होशियार रहूं क्योंकि मैं देश का हित चाहता हूँ। सरकार का विरोध करने में मुझे दिलचस्पी नहीं है लेकिन आंखों देखी घटनाओं पर सवाल इन्हीं सरकारों से ही तो पूछा जाएगा? या फिर विपक्ष से। हां जब मैं सत्ता पक्ष के खिलाफ कुछ तर्क देते हुए लिखता हूँ तो मैं अपने अधिकारों का प्रयोग कर रहा होता हूँ उस अधिकार का जो कि नागरिक का अधिकार है। साथ ही अभिव्यक्ति और प्रेस की आजादी का जहां सवाल है। ऐसे में हमें विपक्ष के तौर पर देखने वाले लोग अगर कुछ कहते हैं तो मैं उनसे विपक्ष का आदमी होना स्वीकार करता हूँ लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं किसी पार्टी का हूँ। वामपंथी हूँ। या फिर समाजवादी हूँ। या फिर तथाकथित राष्ट्रवादी हूँ। या फिर तथाकथित देशभक्त और हिन्दूवादी हूँ। दरअसल मैं 'वादी' में कभी विश्वास रखता ही नहीं। मैं इन सबसे अलग एक इंसान हूँ और  इस देश का नागरिक भी। मैं नागरिकों के लिए सोच सकता हूँ। तो मैं हर आंखों से देखने वाली चीजों पर सवाल उठा सकता हूँ। मैं गांधारी भी नहीं हूँ कि मैं जानबूझकर पट्टी बांध लूं।

लेकिन आज हो क्या रहा है। हमारे यहां इस वक्त प्रेस की आजादी पर खतरा है? जानते हैं क्यों क्योंकि प्रेस अभी आजाद ही नहीं है। नागरिकों पर खतरा है क्योंकि हम जैसे नागरिक अभी इस मानसिकता से आजाद नहीं हुए कि सब कुछ जो देखें सीधे लिख दें और कह दें क्योंकि अगर ऐसा करेंगे तो कोई योगी मुझपर यूएपीए लगा देगा। कौन आजाद है? यही सवाल है तभी पोस्ट लिखा गया है। क्या हम वाकई आजाद हैं इनकी सोच से। हम तो अपने देश के लिए लिखते हैं पढ़ते हैं और मरना चाहते हैं लेकिन ये हमें उससे अलग करवाने में लगे रहते हैं। जब देखो तब सब प्रभाव में हो रहा है।

अगर मेनस्ट्रीम मीडिया खुद गुलामी चाहती है तो सोशल मीडिया यूजर्स गुलामी न चाहते हुए भी गुलाम बनना स्वीकार कर लेंगे।

अच्छा तो यही होगा कि हमें लिखने के लिए कुछ सोचना न पड़े। हम आपका विरोध कर रहे होते हैं इसका मतलब हम आपकी नीतियों का विरोध कर रहे होते हैं। उन नीतियों का जो संविधान के आड़े आती हुई दिखती हैं जहां बंटवारा दिखता है। जहां एकतरफा कुछ दिख रहा होता है। जहां आपकी वजह से नागरिकों के अधिकारों की रक्षा नहीं हो पाती।आप अगर सोचते हों कि आप किसी की आजादी के साथ खिलवाड़ करेंगे तो नहीं कर पाएंगे। सच बोलने वालों की कमी नहीं होगी कभी। इस देश की परंपरा रही है। बेहतर होगा कि लोकतंत्र के चार स्तंभ से जुड़े लोग अपने कर्तव्यों को सोच कर प्रगतिशील बनें।

आज न्यायपालिका से उम्मीद लगाए रहते हैं लोग लेकिन वे उतना सोच ही नहीं पाते। क्योंकि न्यायपालिका अपना भरोसा खोता दिख रहा है। संवेदनशील मुद्दों पर अपनी संवेदनाओं का प्रयोग ही नहीं कर पा रहा इसका कारण है इनमें आने वाले लोगों की चयन प्रक्रिया, वरना इतना बुरा हाल सुप्रीम कोर्ट का तो कभी नहीं हुआ। कि जनमानस कभी जब सालों में किसी एक मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के द्वारा किसी मामले के संज्ञान लेने की बात को सुनता है तो उस छोटी सी बात को लेकर मीडिया बड़ी खबरें बनाता है और आम लोग उसे कई बार पढ़ते हैं क्योंकि वह सोचता है कि आज कोर्ट ने अपना धर्म निभाया है सुप्रीम होने का तभी सरकार से सवाल किया है। इसी तरह मीडिया में जब पत्रकार कोई आकर एक बार किसी दूसरे लोकतंत्र के खंभे पर बैठे आदमी के ऊपर जमकर सवाल करता है तो उसके उस सवाल को लेकर करोड़ों लोग खुश होते हैं वीडियो वायरल हो जाती है। इसी तरह जब कोई सांसद के ऊपर या नेता के ऊपर किसी घटना को लेकर सवाल उठते हैं और वह अपनी जिम्मेदारी समझते हुए इस्तीफा दे देता है तो जनमानस में उसके प्रति इज्जत बढ़ती है। लेकिन ऐसे लोग कम होते हैं। यही कारण है कि प्रशासन में भी एसपी कलेक्टर बहुत होते हैं लेकिन चर्चा केवल कुछ की होती है।

मेरा इतना कहने का अभिप्राय बस इतना सा है कि इन्ही। चंद लोगों में से हम लोग भी आते हैं जो जिम्मेदारी समझते हुए सवाल करते हैं। खुद को जोखिम में डालकर। लेकिन जरूरी ये है कि चारों लोकतंत्र के स्तम्भ अपनी जिम्मेदारी समझें एक दूसरे पर सवाल करें और आगे बढ़ें ताकि कोई भी नागरिक जनता, आम लोग सीधे सवाल करें और उन्हें किसी चीज का डर न लगे।

#प्रभात

Prabhat

28 may, 2020

 

"न कुमकुम, न वो"

 "न कुमकुम, न वो"

हाथ को पकड़े हुए वह चलती जा रही थी। मुझे लगा कि कहीं मैं उसे कुछ ऐसा न कह दूं कि वो हाथ छोड़ दे, लेकिन मैं चाहता था कि वो हाथ तो छोड़ ही दे। क्योंकि, मुझे समाज की चिंता खाई जा रही थी। मैं कैसे अपने ऊपर टिप्पणी सुन सकता था या हंसी का कारण बन सकता था? लेकिन मैं चाहता था कि मैं उससे कैसे कहूँ कि वो बुरा न माने। मैं उसे काश समझा पाता कि मैं उसका हाथ अकेले में थामना चाहता हूँ, जहां वो और मैं रहूं... कोई और नहीं। मुझे इस बात का डर था कि कहीं वो न देख ले जिसे मैंने कभी कहा था कि "मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ"...लेकिन, उसने तो मना कर दिया था। और अब बातें भी नहीं होती थीं। लेकिन, मेरी चिंता यही थी कि मैं तो एक से ही प्यार करने की बात कह सकता हूँ। बेशक, करूं मैं दोनों से। मैं चाहता था कि मैं हाथ को थामे रहूं अगर मैं छोड़ भी दूं तो वो फिर पकड़ ले। क्योंकि मेरा हाथ तो किसी ने पकड़ा ही नहीं था। हां, मैंने पकड़ना चाहा तो उसका हाथ छूट ही गया था। मुझे याद है, कैसे मैं उसके साथ चलता जा रहा था।



अचानक से उसे ऐसा लगा कि मैं उसका हाथ छोड़ रहा हूँ। उसने कहा नहीं कुछ लेकिन, मेरे हाथ बढ़ाने पर अब वह दूर हो गई थी। बहुत दूर। मैंने देखा कि उसकी बस आ गयी है। और वह चढ़ रही है। मैंने बहुत बुलाया आवाज लगाई.....कुमकुम।

लेकिन, अब तो वह बहुत दूर हो गयी थी। आवाज मेरे पास ही लौट आई और मैं उसे समझा न सका।

अगले दिन मैंने उसे देखा जिससे, कभी बात भी नहीं हुई थी।जिसने मेरा कभी हाथ नहीं पकड़ा। न ही पकड़ना चाहा, लेकिन, आज वह रुकी। और मेरे सामने आ गयी। जैसे लगा कुछ बोलना चाहती हो। उसने कहा- क्या यही प्यार है? कल तो तुम उसका हाथ पकड़ कर चल रहे थे। मैंने सोचा कि उसे समझा लूं। मैंने कहा- हां चल रहा था लेकिन, वो मैंने नहीं, उसी ने पकड़ा था।

अभय तुम कैसे हो सब पता है, यह कहते हुए वह भी दूर चली गयी।

मैं बोल नहीं सका कि मैं उसे प्यार करता हूँ या फिर कुमकुम को। लेकिन, बात अजीब थी। आज तो मैं कुमकुम को हाथ पकड़ने की बात कहकर उसके करीब रहने की बात कर रहा था, कुमकुम को पता चले तो वो भी अब बस की तरह कभी नहीं लौटे। और इधर तो उसने कभी हाथ नहीं पकड़ा, लेकिन उसने ये साबित कर दिया और एहसास करा दिया कि मैं किसी को प्यार नहीं कर सकता।

मैं उदास होकर मुंह नीचे किये हुए चला जा रहा था और सोच रहा था कि क्या मैं उन दोनों से ही दिल की बात कह सकता हूँ? क्या मुझे सचमुच प्यार करने की बातों पर ही टिके रहना चाहिये था।

इसी वाद विवाद का परिणाम निकला कि आज मेरे पास न कुमकुम है न ही वो।

नोट- तथाकथित काल्पनिक कहानी लिखने का उद्देश्य कि खुद से यह सवाल करना कि रिश्तों को संजोने के लिए क्या कुछ कहने की भी जरूरत होती है?

#प्रभात

Prabhat

26 may, 2020

 

Monday, 25 May 2020

जब मैंने उससे पूछा कि खैरियत है


जब मैंने उससे पूछा कि खैरियत है सब? उसने कहा- हां। मैंने फिर पूछा, ऐसे कैसे बोल रही हो। कुछ और नहीं बोलोगी? नहीं, बस ठीक है। मैं चाहता था कि वो सब कुछ बक दे। मगर सम्भव न था। मैं दूर था बहुत। चाहकर भी उससे सारी चीजें पूछ तो नहीं सकता था। अचानक से फ़ोन कट गया। मैं पूछने लगा- हेलो, हेलो कुमकुम! किसने किया ऐसा? मैंने तेजी से पूछना चाहा, गुस्से में मैं उठा तो देखा मेरा शरीर पसीने से भीगा पड़ा था। क्या? यह सच नहीं था, खुद से ही सवाल पूछने लगा! एकाएक रात के 4 बजे जगने के बाद नींद नहीं आ सकती थी। लेकिन सोया भी कहाँ था, सब कुछ खुली आँखों से ही तो हो रहा था।
तस्वीर-गूगल साभार


मुझे उससे मिले 3 शरद ऋतु बीत चुके थे। उसने बताया था कि मुझे मेरी माँ की याद आती है। वह दुनिया से तभी चली गई, जब वह होश संभालने लायक हुई। और शरद ऋतु खत्म होने के बाद अचानक से पिताजी का भी साया उठ गया। अब उसके घर में वो और छोटा भाई थे। यही सब सोचते सोचते उसके अंतिम मिलन की बात सामने आ गई। जब उसने कहा था कि अभय तुम मेरे पास से चले जाओ। मैंने कुछ नहीं पूछा था क्योंकि उसने मेरे जाते हुए कुछ बोला नहीं था। मैं खुद से
ही सवाल कर रहा था, ऐसा कहने के पीछे कुमकुम के पीछे का उद्देश्य क्या था? नहीं पता, मगर मेरे कुछ कहने के बाद शुक्रिया के साथ रिप्लाई आया था एक बार। अचानक उसने मुझे सोशल मीडिया पर भी छोड़ दिया।

पिछले 3 सालों में मैंने कभी याद नहीं किया। मगर कुछ ही देर पहले सोते समय ही किसी ने मुझे कॉल पर बताया, अभय। तुम्हें पता है, वो चली गई अब? कहाँ? अचानक से इस प्रश्न का मतलब क्या था, लेकिन वो तो चली गई थी..अब कहाँ से चली गई...? उसका भाई हफ्ते भर पहले वायरल फीवर से चल बसा। और वो खुद इसी तड़प में खत्म हो गई, इतना कहकर मनोज ने फोन काट दिया।

अब जब सोकर उठा था तो मैं अपने आप से यही पूछ रहा था कि क्या 3 शरद ऋतु पार करने के बाद चौथे शरद ऋतु में मैं खुद नहीं जाता? देश मे सब कुछ बंद था शरद ऋतु आते आते तो 1 साल होगा फिर तो खुल जाता सब कुछ! जिंदगी पटरी पर आ जाती। शायद उससे कुछ तो कह पाता...नहीं मेरा सवाल ही गलत है कुमकुम ? क्यों?

मुझे पूछना चाहिए अपने आप से कि मैंने सब कुछ जानते हुए कि तुम अकेली हो और फिर तुमसे एक बार बात करने की कोशिश क्यों नहीं की। यह जानते हुए कि तुमने छोड़ तो दिया मगर मैंने तो नहीं छोड़ा। मैंने यह पूछने की क्यों नहीं हिम्मत की कि तुम्हारे घर में अब तुम 2 हो और तुम्हारी रोटियों का इंतजाम कैसे हो रहा है? मैंने यह जानने की कोशिश नहीं की कि तुम इस बंदी में कैसे 4 महीने बिता सकी हो? मैंने यह जानने की कोशिश नहीं की कि तुम उस शरद ऋतु में क्यों कह गए थे कि चले जाओ! और फिर यह भी नहीं जानने की
कोशिश की कि तुमने क्या कुछ इस बीच खोया...मैं पसीने में था लेकिन मेरा पसीना उस गर्म मौसम का भी था जो अब चल रहा था? मैंने अपनी आंखों में एक बूंद भी न देखा कि गिर रहा हो? मैं इसके बाद कुछ सोच नहीं सकता था, अंत में बस इतना ही सोचा था कि क्या मैं संवेदनहीन अब हुआ हूँ। क्या अब मैं एक बूंद आंसू गिराने के भी काबिल नहीं रहा? ऐसी अमानवीयता का फल मुझे क्या मिलेगा?

नोट- तथाकथित काल्पनिक कहानी लिखने का उद्देश्य सब कुछ भुलाकर एक दूसरे से हाल चाल पूछ लें।


#प्रभात

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ताला


ताला
***
किसी भी प्रकार का ताला उसके मन की आवाजाही को नहीं रोक पाता वो तो बस गुस्सा, द्वेष, मनमुटाव, खींझ, आह, दर्द, नफरत की बयार में खुद को पाता है। आजादी की भावना पनपती है। अगर वह दोषी नहीं है तो जेल में बंद कैदी कभी सुकून से अपने अच्छे पलों को जी नहीं पायेगा वो तो बस उसका विद्रोह करने के लिए तैयार रहेगा। इसी प्रकार किसी इंसान को कोई बंधक बनाए, मारे पीटे अत्याचारों की गंगा बहा दे, लेकिन अंत सांस तक वो बस उससे बदला लेने की सोचेगा। वो चाहेगा कि उसे सबक सिखाएं। इंसान अपने स्वार्थ के लिए अपने लिए चहारदीवारी भी बना लेता है।
तस्वीर-गूगल साभार


उदाहरण के लिए,स्वार्थी मनुष्य चाहे वो लॉक डाउन से या क्वेरेंटाईन से मजदूरों के ऊपर वार करके अपनी सुरक्षा कर रहा हो। या फिर अपने आपको बचाने के लिए वो किसी और पर बंदिशें लगा रहा हो, चाहे वो पत्रकार हो, चाहे वो नर्स हो, या फिर चाहे वो डॉक्टर हो। मेरा मतलब जो उसकी सेवा करने के लिए विवश हो अपनी और दूसरे की इच्छा दोनों के अनुरूप भी हो सकता है ये। अगर ऐसा होता है तो ये अमानवीय की परिभाषा को तय करता है। आप अगर जिम्मेदार नागरिक हैं तो बस अपने स्वार्थ के चलते दूसरों पर ताला नहीं लगा सकते। अगर वो आपकी जान नहीं बचा सकता तो आप जैसे 10 लोगों की जान तो बचा ही रहा होगा।

लेकिन हमारे वेद, पुराण, कुरआन सब फेल हो जाते हैं जब मनुष्य अपनी जान की परवाह के लिए जिम्मेदारी को न समझते हुये आप पर ताला यानी अंकुश लगाता है। यदि ऐसा न हो तो हम बड़ी से बड़ी आपदा से निकल सकते हैं। ताला लगाने वाला आपका अपना सगा ही होता है जो मोह की संज्ञा में बांध देता है, इसमें आपके गार्जियन आपका मकान मालिक या आपका रिश्तेदार या फिर आपका मित्र भी हो सकता है। वह अपनी सुरक्षा के लिये या यूं कहें अपने मोह से आपकी सुरक्षा के लिए तमाम जतन करता है। उस जतन में एक्सट्रीम लेवल में आप पर दबाव से ताला लगा देता है जिससे वह असहाय हो जाता है। यकीन मानिए आप अपने बच्चों को अगर इसलिये सेवा करने के मौके से दूर करेंगे कि उसकी जान बची रहे तो उसकी जान बहुत जल्दी ही चली जायेगी। ठीक उसी प्रकार ताला लगाकर किसी को रोकना वो चाहे आपका कितना सगा ही क्यों न हो, किसी चीज से रोकने की विधि नहीं है।

अगर आपको ताला लगाना हो तो असल जिंदगी के स्वरूप को समझना होगा। आपको समझना होगा कि ताला लगाना है तो आप अपने पर लगाएं। जहां भी आपको नियम कानून बनाना है वो अपने आप के लिए खुद बनाएं। आप को जागरूक होना है। दूसरों को करना है लेकिन इसके लिए ताला का विकल्प कभी नहीं होता। अंकुश लगाने के उद्देश्य में खुद की स्वतंत्रता और पराधीनता छिपी है आप किसी और की स्वतंत्रता छीन नहीं सकते। आप किसी को गुलाम भी नहीं बना सकते। अगर इस मानसिकता का बोध हर किसी को हो जाये तो वह खुद अपने दायरे में रहेगा। और जब दायरा अपने आपको हर किसी को पता होता है तो दीवार या चाहरदीवारी अपने आप ही बन जाती है। लक्ष्मण रेखा अपने आप खिंच जाती है। आप खुद अपनी परवाह और दूसरों की परवाह करते हैं और फिर ये जो ताला दिखता है ये ताला केवल मन का ताला होगा, किसी दुकान का ताला नहीं होगा।

#प्रभात

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फेसबुक पर आने वाला हर शख्स पत्रकार है।


फेसबुक पर आने वाला हर शख्स पत्रकार है। आपको अपनी अहमियत और मर्यादा का पता होना चाहिये। आपको नारद मुनि से सीख लेनी चाहिए। भाषा-शैली और वाद विवाद यहां तक कि संवाद की उच्चतम सीमा तक पहुंचना लेकिन स्पष्टवादिता और सहिष्णुता के साथ।

आप बेबाक हैं लेकिन आपकी बेबाकी में खून खौलता है, आप निराशा के बीज से अपने दूसरों को निर्जीव करते हैं। आप अपनी हास्य के माध्यम से बारम्बार रावण का अभिनय करते हैं। आप अपने अपमान का बदला लेने के लिए ऐसे तड़पते हैं जैसे द्रौपदी लेकिन उसके जरूरी नहीं कि हर कोई दुर्योधन ही हो। आप इंसान में मजहब की लाइन खींचते हैं तो खास मकसद होता है कि उसके अस्तित्व को ही चुनौती दे दूं। आप गरीब-अमीर, सवर्ण-पिछड़े, हिन्दू-मुस्लिम, पढ़ा लिखा- अनपढ़ के बीच ऐसी रेखा खींचते हैं कि वह लक्ष्मण रेखा हो जाती है नवजातों के लिए यानी हर अनजान के लिए। हर मासूम के लिए।

फिर आप अपने जिम्मेदारियों से भागने लगते हैं ठीक उसी तरह जैसे भीष्म अपनी प्रतिज्ञा की ढाल पर भरी सभा में चीरहरण के गवाह बनते हैं, ठीक उसी तरह जैसे द्रोणाचार्य, युद्ध में अपने सर्वश्रेष्ठ शिष्य से लड़ने पहुंच जाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे शांतनु गंगा के वसीभूत होकर राजा का कर्तव्य भूल जाते हैं और महाभारत हो जाता है।

हमारे सामने हो रही मौतों को इसलिये हम चर्चा नहीं करते क्योंकि वो असहाय, बेसहारा और प्रसिद्ध नहीं होता, हिन्दू मुस्लिम एंगल नहीं मिल पाता क्योंकि वह सत्ता या विपक्ष इनमें से किसी का नहीं होता लेकिन लिंचिंग तो हर रोज ही होती है। रेप तो हर रोज ही होते हैं। हैवान इंसान को हर रोज मारता है। वर्दी खूनी हर रोज हो रही है। लेकिन ये सब हम वैसे ही भुला देते हैं जैसे पांडवों व कौरवों के बीच हुए युद्ध में सैनिकों का हर दिन कटना, मरना। चाहे वे धर्म का साथ दे रहे हों चाहे वे अधर्म का।

सबसे ताकतवर इंसान इस संसार में बहुत लंबी आयु प्राप्त करता है। ताकतवर मतलब वही डार्विन ने जैसा कहा था। वह अगर लड़े भी तो हत्या तो कमजोर का ही होगा। उसके लिए अदालतें जैसी चीजें भी कुछ नहीं होती उन्हें भी साथ देना पड़ता है। उसके लिए विधि बनते हैं और विधि बदलते भी हैं। उसको प्राण देने के लिए संसार के सारे वैद्य आस पास घूमते रहते हैं। ये ठीक वैसे ही है जैसे भगवान अवतार लेते हैं किसी को मारने के लिए। चाहे वो कृष्ण को लें या राम को। हां आप चाहें तो रावण को भी ले सकते हैं। लेकिन इसमें भी 2 ताकतवर के बीच केवल एक ही ताकतवर जिंदा रह सकता है।

अंत में बस इतना ही कि मौत तो सबका ही होना है। अपराध तो हर मौत पर है। गुनाह तो हर रोज होता है। सजा तो हर दिन मिलता है। चर्चा तो हर रोज होती है। सोचता तो हर कोई है। निशाने पर किसी न किसी को आना है। प्रायश्चित सबको करना है। सभी के प्रकार हैं और सभी की अपनी अपनी व्याख्या। लेकिन सर्वश्रेष्ठ तो वही है जो ताकतवर है उसी के विचारों का भार होगा, हां ये अलग बात है कि कमजोर भी अपने विचारों से मात देने की उसे कोशिश करे लेकिन हो सकता है वह एक दिन असफल ही हो जाये, क्योंकि वह एकलव्य भी बन सकता है और सूतपुत्र कर्ण भी।

आप अगर वास्तव में जीना चाहते हैं तो ताकतवर और कमजोर बनने के बीच में जीने की कोशिश कीजिये। आप अपने विचारों में कट्टरता का लोप कर दीजिए। आप सहनशील होइए और गंभीर भी। आप गुस्सा करिए मगर अच्छी सोच के साथ, जिससे किसी अच्छे का अहित न हो। आप ज्ञान की रेखा खींचकर बंटे मत रहिए। आप ज्ञान लीजिये दोनों तरफ की तराजू से तौलिए जिसका पलड़ा भारी हो उसे संतुलित करिए केवल ज्ञान के प्रकाश से, केवल खोज से। फिर इस पलड़े में और उस पलड़े में जो भारी हो उसे भारी महत्व दें लेकिन यह भी ध्यान रखें संतुलन करना आवश्यक है इसलिए जितना अधिक भार दूसरे की तुलना में पहले वाली की है उतना ही उसे फिर से ज्ञान से ही संतुलित कीजिये। देखिये यही न्याय का सिद्धांत है। इसी से कर्म और जन्म सुनिश्चित है। कमजोर यानी कम भारी वाले पलड़े पर बैठे इंसान/हैवान की मृत्यु को आप मत सुनिश्चित कीजिये। वो अगर संतुलित करने पर आपसे संतुलित नहीं हो पा रहा तो वह एक्सक्ल्यूड हो ही जायेगा।

#प्रभात

Prabhat