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Thursday, 15 October 2015

गीतों के सुर- साज न बदले, फिर भी लिखकर गाने लगा हूँ

कुछ न चाहत, फिर भी लिखा हूँ प्यार के बंधन में बंधकर
गीतों के सुर-साज न बदले, फिर भी लिखकर गाने लगा हूँ

आज कहीं से याद है आयी, पुरानी भूली सी उन बातों पर 
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चेहरे अब कुछ कह रहे, याद कर उन छोटे कई लम्हों पर
लो पूछ ही लो तुम भी, भोली सी आज सूरत मेरी देखकर
आज तक मैंने रूप न बदले, फिर भी प्यार में बदलने लगा हूँ

कितने अरमान से तुम्हें मैंने चुना था, तेरी मोहक सी बातों पर
मोह में कोई कैसे बदले, ये खुद की आत्मा से पूछने लगा हूँ

न कोई मेरी तकदीर बदली है न मौसम के मिजाज हैं बदले
आज पुरानी बात न संभले, फिर भी उसी को दुहराने लगा हूँ

कुछ अंदाज था तुम्हारा जो, नाम बस तुम्हारे प्यार का हुआ   
सच पूछो तुम नही बदले, फिर भी रश्में अपनी निभाने लगा हूँ  

जैसे तुम आये थे हवा बनकर, उड़ कर चले गए दूर कहीं पर
रिश्ते कैसे बने थे, आज भी जानना चाहता हूँ इतना रुक कर
कोई परिभाषा मैंने अगर गढ़ी, बदला था मैं सब तुम्हारा होकर
तुम न बदले, न मेरी परिभाषा, फिर भी सब ये बताने लगा हूँ 

-प्रभात