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Saturday, 1 July 2017

प्रेम के शब्द

पहली मुलाकात
दिल्ली विश्वविद्यालय के केंद्रीय लाइब्रेरी में मिलते है ऐसा कहकर उसने फोन काट दिया लेकिन बहुत देर हो चुकी थी और अभी तक "सुबह" नहीं आया था। "सुरीली" बैठी हुई लाइब्रेरी में घंटों इंतजार करती रही। कभी घड़ी देखती तो कभी कुछ। घड़ी देख ही रही थी देखा सामने "पिंकी" खड़ी थी। अरे पिंका तू क्या कर रही है आश्चर्य से सुरीली ने पूछा। पिंकी ने मजाकिया ढंग से कहा अरे तू किसका इंतजार कर रही है बॉय फ्रेंड का । चल तू जानती नहीं मैं फ्रेंड तो बनाती नही बॉय फ्रेंड की बात ही अलग ही है...मुहँ टेढ़ा बनाते हुए सुरीली ने कटीले अंदाज में पिंकी को खूब सुना दिया। पिंकी ही थी जो इतना सुनाने के बाद फिर पूछा अच्छा ये बता सुरीली अभी किसी का इंतजार तो नही कर रही ...हां कर रही हूं तुझे क्या लेना देना । सुरीली ने इतना कहा तो पिंकी अपने किसी और काम से अपने संस्कृत विभाग की ओर मुड़ गई।
2 घंटे बीत चुके, और फोन में बैटरी चार्ज न होने की वजह से फोन आया और फ़ोन की स्क्रीन पर नाम फ़्लैश किया...; अच्छा सुरीली जी कहाँ पर है...सुबह ने पूछा। अरे सुनो सुभा जल्दी से आ जाओ इतना वेट तो मैंने आज तक किसी बॉय फ्रेंड का भी नही किया, मेरे फोन की बैटरी भी नही है, लाइब्रेरी में मिलूंगी। सुबह ने कहा, हाँ ठीक अभी इंतजार करना । हम मिलेंगे जरूर।
सायं 4 बजे तक पिछले 3 घंटे से इंतजार करते-करते सुरीली थक गयी थी उसे गुस्सा भी आ रहा था लेकिन उसे इंतजार करना भी ज्यादा गंवारा न था। वह बैठी हुई सुबह का रास्ता देखती कभी किताब के पन्ने खोल लेती।
थोड़ी देर बाद सुबह आया तो सुरीली ने यह जरूर कहा कि आ गए, थोड़ी मुस्कुराई मगर थोड़ी बहुत मजाक मजाक में नाराज भी हुई कि आज तो इंतजार करना पड़ा...जो मैं कभी नही करती। सुबह ने कहा तो कुछ नही बस मुस्कुराता रहा...शायद सुबह और सुरीली की इस तरह पहली मुलाकात थी जब केवल एक दूसरे के लिए मिले थे। तुम बहुत कम बोलते हो क्यों? फिर भी सुबह मुस्कुराता ही रहा, जवाब नहीं ही दिया । सुबह मन ही मन बहुत खुश था कि किसी ने आज उसकी वजह से इंतजार तो किया। अच्छा तो लगा मिलकर दोनों को ही। थोड़ी बहुत बाते हुई। लाइब्रेरी से किताब भी लिया तो एक दूसरे को आमने सामने देखकर दोनों खूब मुस्कुराए...आज से जैसे सुबह की जिंदगी में कुछ अच्छी तरह नई शुरुआत थी। बहुत दिनों बाद शायद खुशियों की बारिश हुई थी जिंदगी की घनी गर्मी के बाद...
प्रभात
#प्रेम के शब्द


प्रेम के शब्द


प्रिय रागिनी, यह खत अब तुम्हें नही लिख रहा हूँ यह अब मैं अपने आपको लिख रहा हूँ। मैंने मान लिया कि खत कोई और भी पढ़े आप न ही पढ़िए तो भी अच्छा ही है। क्योंकि रागिनी अब तुम केवल काल्पनिक चेहरा और अहसास लिए मुझे हमेशा अपने पास रखती हो। और मैं भी यही ही करता हूँ । मुझे पता है यह खत जो भी पढ़ेगा उसे यह कोई साहित्य की तरह लगेगा लेकिन यह साहित्य ही नहीं यह एक अमर प्रेम कहानी है। जो शायद कहानी के पात्र ही अनुभव कर रहे होते है।
लेकिन फिर भी सुनों रागिनी; दर्द और दर्द से उपजी जलन की आग, चिंता की रेखा, प्यार मुहब्बत का नाम सुन कर मुंह फेरने वाली शख्स में तुम ही नही हो अब मैं भी हूँ। अंतर इतना है कि तुम थोड़ा पहले और मैं बाद में हुआ। लेकिन प्रेम एक ऐसा सत्य है कि यह अमर होता है इसमें शरीर मर जाता है लेकिन आत्मा हमेशा जिंदा रहती है। यह आदमी से घृणा तो करने लगता है लेकिन यह उसकी अंतरआत्मा से कभी नही। इसमें जिस्म तो क्या इसमें अपने आपको बलिदान और समर्पित करने की चाह होती है। नहीं पता कैसे एक पक्षीय प्यार हो जाता है और कोई एक स्वार्थ सिद्ध करने में केवल लगा रहता है और साथ छोड़ देता है और उसके बाद भी प्रेम करने वाला उसे स्वार्थी नही करार देता उसकी गलत बातें भी सही लगती है। लेकिन अगर ऐसा दुबारा किसी और के साथ हो यानी अब प्रेम करने वाला दूसरा हो तो उसमें विश्वास करना शायद पहले कितना और जल्दी इतना आसान नहीं होता यहां प्रेम करने वाला अब हमेशा संशय की दृष्टि से देखा जाता है।
रागिनी तुम प्रेम नहीं कर सकती इतनी जल्दी क्योंकि प्रेम शायद सही ही कहा है पहली बार शायद आसान होता है दूसरी बार शायद बहुत कठिन। मैं प्रेम करता हूँ उस पर प्रश्नचिंन्ह उठना स्वाभाविक है। खैर सच बताऊं तो सही कहते हो प्रेम वगैरह कुछ नहीं सब बेवकूफी है। लेकिन शायद ये नहीं जानते कि प्रेम किसे कहते है। प्रेम में कुछ मिल जाये तो प्रेम कहाँ वह तो एक मिथ्या प्रेम है।
जब प्रेम में एक दूसरे के प्रति चाहत होती है, समर्पण होता है, त्याग होता है तो वह प्रेम हमेशा सजीव रहता है। दिल की धड़कनें अगर केवल प्रेमिका के नाम मात्र सुनने से बढ़ जाये। सांसे जोर जोर से चलने लगे। चेहरे के हाव भाव बदल जाए तो यह प्रेम है। हर बात को महत्व देना और उसी के अनुसार व्यवहार करना, किसी भी बात से सबसे ज्यादा तवज्जो प्रेमिका को देना प्रेम है। भोजन करते वक्त या कोई और काम करते वक्त भी इस प्रेम के आगे सब बेकार लगने लगे। यहाँ तक कि कोई दूसरा आपके जीवन में मिल जाए तो भी उसे आप स्वीकार नहीं करेंगे। आप चाहकर उसे अपना प्रेम नहीं दे पाएंगे न ही उसके साथ ज्यादा दिन तक राह पाएंगे अगर कोई सचमुच प्यार करने आपसे आया हो और आप किसी और को चाहते हो। यही शायद प्रेम है।

#प्रेम के शब्द
तुम्हारा
प्रभात

Thursday, 4 May 2017

प्रेम के शब्द

नहीं पता था कि दिल्ली और लखनऊ की इमारतों में क्या फर्क है। उत्तर प्रदेश का पिछड़ा जिला बस्ती से आया हुआ एक साधारण सा बालक जो जो देखा सब कुछ चाँद, तारे को करीब से देखा हुआ सा प्रतीत होता। सब कुछ असहज था जितना सहज वह था उतना सहज कोई हमउम्र का लड़का मिलना तो दूर की कौड़ी थी। वक्त में जो सुबह अर्थात भोर था वही सुबह उसके नाम से उसकी बातों में दिखता था। हर तरफ से सूर्योदय ही दिखाई देता था। वो कॉलेज का इमारत तो मानों उसने कभी ब्लैक एन्ड वाईट टीवी में देखा था वह भी याद नहीं। कुछ देखा था। लग रहा था कि सब सपने है। उसकी बहुत कोशिश थी कि वह अपने माँ - बाप को सब कुछ दिखा दे। लेकिन दिखाना तो दूर कह कर बताना भी नहीं आता था। अवधी के शब्द तो ठीक से चल नही रहे थे। खड़ी बोली वह सीख रहा था। शांत चित्त होकर जब कॉलेज के क्लासरूम में बैठा हुआ श्यामपट्ट को निहार रहा था। तो ज्यादातर बार निगाहें दूर हो जाती थी। ऐसा इसलिए कि उसने कभी किसी लड़की को देखा ही नही था। और ज्यादातर लडकियां श्यामपट कर सामने से गुजर रही थी। घर के माहौल का उस पर इतना असर था कि नजरें लड़कियों की परछाईं पड़ते ही दूर चली जाती थी। लेकिन उदास चेहरा लेकर सीट पर बैठा ही था कि इतने में लगा कोई पास आ गया। उसने सुना "हाय"। पहली बार लगा कि कुछ मांग रही है। उसने हंस दिया लेकिन गंभीरता से पूछा क्या कहे? बहुत धीरे से कहने के बाद वह इतना डर गया कि उसका माथा पसीने से भीग गया। लड़की ही थी जो उसे देखकर तुरंत पूछा योर नेम। थोड़ी बहुत अंग्रेजी पता था। सो समझ तो गया उसने तपाक से कहा कि "सुबह सन ऑफ डॉ आकाश"। वाउ वेरी नाइस। इतना कहकर वह चली गयी। सुबह ने शायद पहली बार किसी को पास आकर इतना कहते हुए सुना था। वह पलट कर पूछ नही पाया था कि आपका शुभ नाम क्या है? लेकिन क्या करता वह इतना ही तो कर सकता था कि वह दूसरे दिन का इंतजार करता।
दूसरे दिन सुबह ने देखा पूरे क्लास में वह लड़की कहीं पीछे बैठी हुई दिख रही थी। उसने मन ही मन में कहा क्या हुआ लगता है मैंने ढंग से बात नहीं किया या उसका लेवल थोड़ा ऊंचा है जो मुझसे आज कुछ बोली नहीं। कैसे लोग है एक दिन पास आकर बोलते है और दूसरे दिन कोई जानता भी नही। ये सब मन ही मन सोंच रहा था। ये भी सोंच रहा था कि नाम तो पूछ लूं लेकिन हिम्मत न हुई। सुबह के साथ सुबह होने ही वाली नही थी। ऐसा सोचकर फिर वह वापिस होस्टल के कमरे में चला गया। और सोंचता रहा कि उसने आखिर बात तो किया। बात ही तो किया था। अब तक ये भी पता चल गया था कि वह काफी सुंदर नहीं थी, लेकिन सुंदर थी मेरे लिए। उसकी लंबाई काफी नही थी। लेकिन उसकी आवाज में एक जादू था। उसके हाव भाव मेरे से लग रहे थे। पर क्या सचमुच मेरे जैसे? मन मे इतने सवाल लिए सुबह, सुबह होने का इंतजार कर रहा था। नींद नही आ रही थी। लेकिन नींद आना ऐसे समय काफी सहज था। सुबह की सोंच और नींद में प्रत्यक्ष सम्बन्ध था।
#प्रेम के शब्द (आगे जारी है...)
-प्रभात




प्रेम के शब्द

प्रेम पर न ही बोला जाए कुछ, ऐसा लगता है क्योंकि इसकी तह में जाने पर पता चलता है ये प्रेम का बस आँचल ओढ़े है और अब इस समाज में प्रेम जैसी चीज दरअसल है ही नहीं। बहुत दर्द है प्रेम में। प्रेम में बहुत जलन भी है, चिंता है। करुणा है। चीत्कार है। अगर ये सब है तो इसका मतलब इसमें पड़कर प्रेम के सकारात्मक पक्ष जो शायद आजकल कहने मात्र के लिए मिलते है जैसे खूबसूरती, मुस्कुराहटें, खुशियां, हँसी जैसी चीजों का सुसाइड ही करना है।
लेकिन आप नकारात्मक ही क्यों हो। यही तो देखने को आये है। तो देखिए....सब कुछ सकारात्मक रूपी नदी के किनारे से। जहां काँटों के बीच में गुलाब जैसा फूल प्यार लेकर बैठा हो। जहां कराहते पक्षियों के बीच पपीहे की आवाज हो। जहां मटमैले पानी के वेग के साथ कुछ चमकते बुलबुले प्रकाश से हाथ मिला रहे हो। जहां उलझनों की राह हो मगर बिना किसी सहारे के हर राह पर चलकर केवल एक राह की ओर गुजर जाए जिधर केवल आप और आपकी दुनिया हो। लोग खुद- बखुद आपको ढूंढ़ने की कोशिश करेंगे।

@प्रभात

Thursday, 20 April 2017

प्रेम के शब्द

हवा का अहसास तब तक नही कर पाता जब तक वह किसी वृक्ष की डाली को झुका नही देता। ऊंची गगनचुम्बी इमारतों को गिरा नही देता। और तो और किसी शरीर मे ठिठुरन नहीं पैदा कर देता। इसी तरह से कुछ प्रेम को भी अनुभव किया जा सकता है। प्रेम का अहसास तब ही हो पाता है जब दो दिल किसी वजह से टकरा जाते है। जुड़ते है तो वह प्यार की खूबसूरती या उसकी गंभीरता या इन दोनों की वजह से उत्पन्न एहसास द्वारा अनुभव नहीं ही मिल पाता।
-Google image
अक्सर प्रेम एक ऐसा रोमांचक विषय बनकर मेरे दिलों दिमाग मे सैर किया करता है जहां एक ऐसी नदी बहा करती है जिसमें केवल विष भरा होता है। लेकिन उस विष को पीने के बाद धीरे- धीरे मन आराधक हो जाता है। उपदेशक हो जाता है। मोहित हो जाता है। स्वप्नों की दुनियां में खो जाता है। अक्सर थोड़ी देर के लिए मन सबसे ज्यादा स्थिर इन्ही एहसासों की तरंगों के साथ होता है। जहां इस तरह विचरण करती मनोदशा में अन्य सब कुछ द्वितीयक रूप में दिखने लगता है ।
प्रेम का पाठ किताबों में न तो बचपन में पढ़ा था और न ही अब। मगर प्रेम का खूबसूरत पाठ पिछले कुछ सालों में मैंने भरपूर पढ़ लिया है। हो सकता है आप बचपन में ही पढ़े होंगे। लेकिन एक ऐसे समय के साथ यह पाठ पढ़ने का अलग ही महत्व होता है। ये सच है इश्क हमने नही पढ़ा। यदि इश्क ने लोगों को बर्बाद किया है तो वहीं इश्क ने लोगों को साहित्य पढ़ाया भी है। हो सकता है इश्क ने कोई कहानी खत्म कर दी ही, किसी का जीवन ले लिया हो। लेकिन इश्क ने ही कुछ को इतिहास के पन्नों पर कैद भी किया है। अक्सर इश्क में लोगों को कहते सुना है, प्यार मत करना बहुत बेकार चीज है। शायद ऐसा कहने का आशय ही यही होता है कि इश्क का स्वाद ले ही लिया जाना चाहिए भले ही इश्क कोई करता नहीं यह स्वतः हो जाता है।
#प्रेम के शब्द (जारी है...)