Monday, 25 May 2020

उसके वस्ल का कारण निहित हो


जब मौसमों की तारीफ में उसके वस्ल का कारण निहित हो
तो हिज्र के आगोश में सब अच्छा कहाँ होगा

#हिज्र- वियोग
#वस्ल-संयोग

#प्रभात

Prabhat

चिंतन, मनन, उदासी, क्रंदन सबकी अलग कहानी है


चिंतन, मनन, उदासी, क्रंदन सबकी अलग कहानी है
वर्षों हुये करुणा में डूबे व्यथा वही पुरानी है

सागर, नदी, तालाब, गगन हर ओर अंधेरा छाता है
विस्मय करती नहीं बाधाएं सब कुछ आता जाता है
हां मन बोझिल, तितर बितर अंदर ही घुटता रहता है
जब भी देखूँ आलिंगन को तो आंसू भी बहता रहता है
हास्य, मधुर, शीतल, सिहरन सबकी अलग कहानी है
वर्षों हुए हास्य में डूबे अब बदली कहीं कहानी है
चिन्तन....

क्या लिखूं आगे

#प्रभात

बहुत अंधेरी रात और गलियां बिल्कुल सूनी


बहुत अंधेरी रात और गलियां बिल्कुल सूनी हैं
स्ट्रीट लाइट्स बंद पड़े हैं
शहर में बाहर बस एक लंगड़ी कुतिया है
कुछ दुबले पतले जानवर भी जुगाली कर रहे हैं
ये उसी स्वप्न की बात है जिसमें मैं दुनिया में अकेला था
 
आज वही सब देख रहा हूँ, क्या आप भी देख रहे हैं?

दिन भर भूख की चिंता में माँ के पास चावल का एक कटोरा है
उसके सहारे पलते उसके 2 नन्हें बच्चे दूध पीने को व्याकुल हैं
खपरैल का मकान पक्का तो है मगर उसमें अभी पंखा नहीं है
हां बिजली के तार हैं मगर उससे जलते 40 वाट के पीले बल्ब हैं
लू के चलने के बीच पसीने से तर मुंह पर आँचल का टुकड़ा है
दुपहरिया में मजदूरन की ऐसी बेबसी और लाचारी जो कभी एक बार दिखती थी

आज दिन रात देख रहा हूँ, क्या आप भी देख रहे हैं?

मर्द रिक्शा चालक शहर में फंसा बहुत दूर तक अब भी अकेला है
छूट गया है साथ संबंधों का मानो अलग थलग रहने का झमेला है
उसके पास तो घर भी नहीं, ना ही दाना पानी है
गुजर बसर के चक्कर में यही नई कहानी है
इतनी दूरी पैसों और जिस्मों की कभी टूटते इश्क़ में दिखी थी

आज ये सब घर-घर देख रहा हूँ, क्या आप भी देख रहे हैं?

दुकानों का बंदीकरण और शहरों की गति का रुकना
मानों गांवों तक हवाओं का ठहरना और साँसों का रुकना हो
हां, क्योंकि बदली हवा का एहसास कमरे में बंद है
हम तो लगातार एक कोने में बंद हैं
दवाओं से लेकर दुआओं तक सब खाली खाली है
सब जगह ताला बंदी है जैसे नाले बीच में एक पतली पगडंडी है

सबको अवसादग्रस्त देख रहा हूँ, क्या आप भी देख रहे हैं?

#प्रभात

Prabhat

अभी दूर की बात है


अभी दूर की बात है माचिस की तीली और उसका छू जाना उसकी सतह से यहां
लेकिन चिंगारी निकलते हमने कहीं तो देखा है...
हां बहुत से देश हैं ऐसे ही जहां 'वायरस' का छूना बाकी है
ये ऐसे है जैसे कि चिंगारी से फैली हुई है आग कुछ दूरी पर
उस आग को हम भी देख रहे हैं उलट पुलट कर
शायद कह रहे हैं कुछ लोग अभी
कि बहुत दूर है
यहां आना मुश्किल है
कुछ कह रहे हैं आएगा भी तो हमारे घर तक पहुंचना मुश्किल है
कुछ तो कह रहे हैं अब कर लिया जतन, अब कुछ करना ही मुश्किल है
दिन रात उथल पुथल और उसकी मीडिया की बकैती में
हम परेशान हैं इस पर कि
माचिस किसने दी, किसने रगड़ा सलाई, किसने छुई सतह, किसने फैलाई आग और किसने जलाई ये दुनिया
और फिर भी हम देख रहे हैं उस फैलती आग को
कैसे बचें, क्या करे उससे बहुत दूर निकलकर
एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप और नफरतों के बयार में
कुछ सुलगा रहे हैं इंसानियत की बीजों को ताकि खत्म हो जाएं इंसान,
उससे पहले ही कि दूर तलक लगी आग पास पहुंचे
अभी भी मीडिया में मंडराते पतंगे उसी लौ में जलने को तैयार हैं
दूर से आमंत्रित कर रहे हैं औरों को भी
और अभी भी जब वह आग बहुत करीब आ गई है
बेपरवाह है मीडिया, जनता, और सरकार
बस दिख रहा है
कहीं कोई भिनभिना रहा है
कहीं कोई जला रहा है
कहीं कोई बजा रहा है
और कहीं कोई बजवा रहा है, जलवा रहा है...
कहीं अब आग पहुंचने से पहले ही सब कुछ खाक न हो जाये....!

#प्रभात

Prabhat