Thursday, 24 August 2017

हुनर इस जिंदगी में

हुनर इस जिंदगी में जो सीखे, सब उसकी खुशी को लगाता हूँ
अपनी खुशी उससे मांगता हूं और वो खुद भी यही करती है
हम ऐसा नही कर सके कि खुशियां दोनों को मयस्सर हो
चिता को देख लेगी शायद वो मगर चिंता नही छोड़ेगी
दिलों को बर्बाद कर ले शायद मगर वो कहना नही छोड़ेगी



आरजू मन की बस मन तक ही रह जाती है
राहें अलग हो जाते हैं, रास्तों में कीचड़ रह जाती है
लाख सजाए दीपक मगर अंधेरे में रहना है
शायद जिंदगी को जिंदगी बेवजह कहना है
हम दोनों ही नही समझते और समझना शायद चाहते हो
दीवार गहराई तक ले आए नींव में शायद बरकत हो
हम ऐसा नही कर सके कि खुशियाँ दोनों को मुकम्मल हो

चोट बहुत करती है जब अचानक बिछड़ जाए
आंसू तभी बहते है जब बिछड़ कर फिर मिल जाये
मिलकर कभी इतना नही पा सके कि सम्मानी ए खुशियां हो
एक दिल पर उसका हाथ और एक दिल पर मेरा हाथ हो
इसे कौन कहेगा कि जिंदगी किताब बन कर ही रह जाए

हम कुछ भी हो, गुनाह इस जिंदगी का ही लगता है
शायद तोड़ दिया था उसका दिल जो अब तक जुड़ नही पाया
बेआबरू होकर नींद में घायल उसे भी कर रहा होता है
टूट गयी सारी तहजीब हमारी रिश्तों को जोड़ने में
शायद आंच आ गयी थी कभी हमारे दिल के तहखाने में
चाहकर भी शायद कभी ही कुछ मिल सका हो
हम ऐसा नही कर सके कि खुशियां दोनों को मुकम्मल हो

-प्रभात
तस्वीर गूगल साभार




जिसे मैं सुनाऊँ

एक आह रुक गयी है, सीने की सीने में 
वो सुनने वाला ही कहाँ, जिसे मैं सुनाऊँ

मेरे खिड़की से आज भी वो दिखती है
उसके लौट के आने का इशारा कहाँ
निमंत्रण दर दर दिया रूह तक आने का
वो लौट जाती है, थोड़ी दूर आने के बाद
कचोटते है बार- बार, संवाद के तीखे शब्द
वेदना में लिख देता हूँ, पर बता न पाऊँ

हार मान लिया मैंने सच्चाई बताते-बताते
लम्हें निकल गए, छूट गए वादे- इरादे
बेशब्री था जिसका हमारी जिंदगी में 
आज, कल हो गया, हम अधूरे रह गए
राहें अलग भी न हुई, मंजिल वही रहा
चाहता हूँ कहूँ, तुमसे ही न कह पाऊँ

सोने लगा हूँ हर पल दिन में जख्म लिए
भींगता है स्वप्न दिन- रात, गहरा घाव है
मुनासिब नही ज़िंदगी में क्या, हवा चले
चैन से रहूं और पहले जैसे दिन रात ढले
खामोशी में है बरकरार, मेरा दिल सच्चा है
कह देना, शायद मैं कभी न समझा पाऊँ

-प्रभात
तस्वीर गूगल साभार


Tuesday, 1 August 2017

फिर से वही बारिश आ गयी

बारिश का मौसम आ गया है। बहुत सारी यादें तरोताजा होने लगती हैं। अक्सर यादें जुड़ी होती है जिन्हें हम प्रेम करते है। प्रेम लगभग एक ही प्रकार का होता है और उस प्रेम का कभी अंत नही होता चाहे वह राह चलते किसी अजनबी से हो जाये या वेश्यालय में रहती किसी नारी के साथ। चाहे वह प्रेम किसी सजीव से हो जाये चाहे वह प्रेम किसी निर्जीव पदार्थ से हो जाये। प्रेम एक भावना है जो बिना किसी संवाद के या किसी सूरत के या बिना किसी शरीर का हिस्सा बने भी जीवित रह सकती है। प्रेम का साहित्य बहुत विविध है। इसे समझना और लिखना दोनों ही कठिन है।
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1..फिर से वही बारिश आ गयी
बचपन आ गया तुम आ गयी
मां झूला झूलाने फिर आ गयी....
कागज की कश्ती उतारा है जैसे
मीलों पानी में चलना सिखाया है जैसे
हम सबने खिलखिलाया है फिर से
मां तुम आयी याद आयी किलकारियों की गूंज
तरंगों का पानी में बनना और ढेले के डूबने की गूंज
झिलमिलाते सपने और दोपहरिया याद आ गयी
हां दरेसी में गहरे पानी में आमों का बहना
फिर बाल्टी भर आम लेकर चखना
और सुबह जागने से पहले मेढकों का जगना
टर्र टराना और उसके बाद बादल का दहाड़ना
सुबह दादी का जगाना और फिर बछिये का बोलना
सावन में मंदिर जाना और मेला जाना
फिर से बचपना आ गया और तुम आ गयी
मां, पिताजी की डांट याद आ गयी
बचपना आ गया तुम आ गयी।
फिर से वही बारिश आ गयी......
2..फिर से वही बारिश आ गयी
प्यारी दिल्ली आ गयी तुम आ गयी
रिमझिम सावन आ गया, बूंदें आ गयी
उजड़े दिलों में फिर से मस्ती आ गयी
कोंपलों पर गिरी आसमानी बूंदें
तुम्हें छूयीं और फिर मुझे छू गयीं
वो रास्ते जहां से तुम गुजरी थी
मैं गुजरा था, आखों में नमी गुजरी थीं
वफ़ाएँ मौसम में थी, मौसमी हवाएं थी
ठिठुरने का तुम्हारा अंदाज मुझे छू गई थीं
भींगे हाथों का मेरी कलाई पर आना फिर
सनम तुम्हारी बारिश की चाय और तुम आ गयी
वो उड़ती हवा में तुम्हारी जुल्फें
बारिश में देखती तुम्हारी काली आंखें
केवल देखना तुम्हें और तुम्हारा मुझे देखना
पता नही क्या क्या फिर कह गयी.....…..
धीरे - धीरे मेरी आंखों के सामने बादल छा गयी
वो बारिश की यादें और आंखों में नमी आ गयी
फिर से वही बारिश आ गयी!!
-प्रभात
तस्वीर गूगल से साभार


आंखों ने जो अब तक देखा!!!

इतने असहज मत हो मेरे दोस्त। आत्महत्या का विकल्प कभी मत चुनना । चाहे तुम्हें कोई त्रस्त कर दें या तुम खुद से त्रस्त जाओ। चाहे खुद से टूट जाओ या तुम्हें कोई तोड़ दे। जिंदगी किसी की वजह से नही बनी न ही किसी की वजह से जीना चाहिए। 

-Google


याद करो जब आप बचपन में थे तो आपके साथ कौन था?
क्या आप किसी की वजह से अपनी जिंदगी खोना चाह रहे हैं जो इसकी वजह मात्र कुछ सालों में बना है?
यार बनते रहते है लोग जुड़ते रहते है, फैसले होते रहते है, कभी कोई अपना होता है तो कुछ दिनों बाद वही पराया, फिर कुछ दिनों बाद वही अपना भी हो सकता है। जिंदगी के इस सफर में अच्छे लोग कम ही होते है जो आपके हर दुख में सहयोग कर सकते हैं।
आप इतने कमजोर मत बनिये। आप अपनी जिंदगी को बर्बाद कर दूसरों को सोंचने का मौका क्यों देना चाहते है?
आप तनाव की स्थिति में एक ऐसा विकल्प चुनते है जो आपको जिंदगी भर तनाव में डाल देता है ऐसा क्यों?
आप ज्यादेतर समय ऐसी तनाव की स्थिति में ईयरफोन लगाकर सिनेमा देखने का विकल्प भी चुनते हैं लेकिन इससे आप अपने कान और आंख को बंद कर अपनी दूर दृष्टि को प्रभावित कर रहे हैं।
आप तनाव की स्थिति में जहर और मौत के करीब जाने के लिए मदिरा और ड्रग्स का सेवन करते है। इसका मतलब आप जिंदगी की इस तनाव की हालात में लड़ने के लिए सक्षम नही हैं । आप सचमुच डरपोक और कायर हैं जो अपनी आंखों को उस समय बंद रखना चाहते हैं जब आपको जिंदगी जीने के लिए कुछ सीख मिल सकता हो।
तो आप ही बताइये क्या आप कोई और बेहतर विकल्प की तलाश नही कर सकते जो आपको इन सबसे और अच्छा रास्ता दिखा सके?
आपको पता है अगर आप आजमा के देखिए सबसे सही विकल्प जो मैं बता रहा हूँ और बहुत से लोगों ने बताया भी है:
आप तनाव की स्थिति में किसी अच्छे दोस्त के पास जाएं जो आपको ड्रग्स और मदिरा के सेवन से बचायें जो आपकी देखभाल कर सके और आपको अच्छा रास्ता बता सके।
आप अकेले ही किसी यात्रा पर निकल जाएं ।
आप देखेंगे यात्रा के बीच में ऐसे ऐसे लोग मिलेंगे जिनकी जिंदगी आपसे भी खराब स्थिति में है। वे न तो जी सकते हैं ना ही मर सकते है। आप किसी को रोता हुआ देख अपने दुख को भूल जाएंगे। आप किसी को मरा हुआ देख अपने जीवन के बारे में सोंचने लगेंगे।
आप किसी नदी के किनारे/ प्राकृतिक स्थानों के साथ खुद को अकेले में या किसी बेहतर अच्छे साथी के साथ थोड़ी देर बिता कर देखे। उससे बात करके या खुद से बात करके आपको अच्छा लगेगा।
एक दिन आत्महत्या न करने का सीख देते आप भी नजर आएंगे।
-प्रभात