Saturday, 23 January 2016

अच्छे वक्त को कभी लौटना भी होगा...

क्योंकि कहानी लिख दूंगा
क्योंकि नया ज्ञान दे सकूँगा
कहीं रहस्य ही सुलझा दूंगा
अकेला ही सब कर लूँगा
इसलिए ही छीन लिया मेरा भाग्य
और फिर मेरा ज्ञान, मेरा अहंकार
मेरी शक्तियां, मेरे हौंसलों का तार
क्यों संसार में मुझे आना था
पाने के सिवाय लुटवाना था
जिन्दगी भीष्म सा होना था
खबर बिजली का तार था  
मकसद मेरा कामयाब होना नही
मेरी जरूरतों की प्राप्ति होना नही
इतिहास के पन्नों में सिमटना नही
मजबूरियों का इलाज़ होना नहीं
बस उम्मीद और बहुत इंतज़ार पर टिकना है
हकीकत को छिपाना नहीं उनसे निकलना है
मेरे ज्ञान का कोई तो ठिकाना होगा
हौंसले बढाने का कोई बहाना होगा
मिलकर नही पर अकेले जाना होगा
भागदौड़ में ही हिम्मत जुटाना होगा
और फिर किस्मत आजमाना होगा
जो होना है सही गलत कुछ तो होगा
अंत में चलना है तो चलना ही होगा
देखना..बुरे वक्त के भी अपने पैमाने है
अच्छे वक्त को कभी लौटना भी होगा


-प्रभात  

Wednesday, 13 January 2016

मानों शाम आज सुबह से कुछ पहले आ गया

मेरी दादी 
मानों शाम आज सुबह से कुछ पहले आ गया
बारिश की कुछ बूंदों से घना कुहरा सा छा गया











हवाएं मंद सी मुस्काती सरयू तट चली जाती है   
और फिर मुझे छूकर किसी की याद दिलाती है
बाग़ में अमरुद आज अकेला तना लिए खड़ा है  
सरपत के पीले कंटीले झुण्ड सब हमें देख रहे है
पानी के कुओं में आज क्यों अजब सा सूखा है

कौओं का बसेरा पुराने छप्पर के पास टिक गया
लगाकर आग अचानक चूल्हे में जैसे आ गया

पुराने पकवान होली के और दिवाली में नहीं है
पुराने स्वाद झूलों पर भी शब्दों में अटक गए है
चना मटर और नागपंचमी किस पोखरे में पड़े है
कहानियों को चलते-चलते जो कही थोड़े सुने है
आज विमर्श में मुख पर हल्की मुस्कान बिखेरे है
   
मैं शून्य तक देख कर जब वास्तविकता पर आया
यकीन नहीं हुआ फिर भी सब कुछ छोड़ आया

लगता है यह मिट्टी जैसे खिलौने जैसा किस्सा है
किसी खिलौने से सही यह मेरी दादी का रिश्ता है


-प्रभात 

Monday, 11 January 2016

कि विपत्ति धीरज का रुख मोड़ कर लद नही जाती

कि विपत्ति धीरज का रुख मोड़ कर लद नही जाती
खुले आसमान में तूफ़ान कभी असर नहीं दिखाती
गगनचुम्बी इमारतो को हवाए जब चाहे तब गिरा दे
-गूगल साभार 
मगर बिना सीखे कोई परीक्षा सफल हो नहीं पाती

कि मधुमक्खियाँ भी आजकल शत्रु को पहचानती है
हाथ लगाने पर आक्रामक हो ढूंढ ढूंढ कर मारती है
संभल कर बैठे रहो अगर तनिक कुछ देर ही सही
देखो कैसे फिर डरा-डरा कर वापिस चली जाती है  

कि कोई ढिबरी अँधेरे में जब चाहे तब प्रकाश कर दें
शीतल-शीतल सी हवा में थोड़ी गर्म अहसास भर दे
रात भर में ही जलकर दूसरे दिन नया तेल मांगती है
मगर सूरज की गर्मी और अहसास कोई और कैसे दे         

मेरी प्रतिभा है अगर तो मुझसे मंजिल दूर नहीं होगा
वक्त पर न ही सही बिछुड़कर कभी मिल ही जायेगा
बिना बाधा के कोई मंजिल हासिल हो जाये तो क्या
कहा वह आनंद और प्रतिभा का उपयोग हो पायेगा

नईया रोकने के लिए एक जलकुम्भी ही काफी है
जंगल साफ़ करने के लिए बस चिंगारी ही काफी है
कोई अद्भुत धरा पर काम हुआ है तो कही पर अगर
असंभव होता है संभव केवल एक विवेक काफी है  


-प्रभात 

Saturday, 9 January 2016

त्याग अगर बांटा जा सकता तो

ईश्वर भी कितना अजीब है कितने निस्वार्थ भाव से कभी कभी इस पृथ्वी पर कुछ ऐसे मनुष्यों को छोड़ जाता है जिनमें कुछ की जिन्दगी केवल कुछ ही समय के लिए होती है, कुछ को जिन्दगी भर मौत से लड़ते रहना होता है, कुछ को दास बनकर रहना पड़ता है, कुछ को हमेशा दुःख ही भोगना होता है....ये जिन्दगी भी कैसा भेदभाव करती है कि जिन्दगी के कुछ सुख सुखीवान व्यक्ति से बंट नहीं पाते..अभी तक न जाने कितनी कहानिया सुनी है कि यहाँ राम, भीष्म, अर्जुन, कुंती, कर्ण, श्रवण और न जाने कितने लोग ऐसे आये थे जिन्होंने केवल त्याग ही किया है वास्तव में ऐसा त्याग अगर बांटा जा सकता तो......


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कभी फूल मिलते है कभी पत्थर जिन्दगी तरसती है ख्वाब एक बनकर
कभी उड़ान या कभी गहराई बनकर, चला देती हैं नया परिणाम बनकर  
क्या सोंचा था क्या हो जाता है पाने के लिए सब खोता हूँ लुट-लुटकर    
गवाँना है सब कुछ जब इस जिन्दगी में तो प्रेम भी कैसे समझ लूँ न लेकर
देखूं प्रतिज्ञा में भीष्म पल रहे थे और  श्रवण पितृ भक्ति की कहानी ढोकर  
चाँद जहाँ है और प्यारी चांदनी वहां मैं बेसुध-निर्जीव पड़ा हूँ युग युगोत्तर
कभी राह मिलते है बेसहारे कही पर ढूंढता है उन्हें प्रभु नया जीवन देकर
कभी कैसे सहारा एक मिले, मंजिल भी दूर हो जाती है ठुकरा-ठुकरा कर

-प्रभात