प्रश्न बनकर रह गया हमारा जीवन
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जब टूट गये थे
तार हमारे
रिश्तों पर संवाद
हमारे
भीग गया था प्रेम
पत्र
ख्वाबों में दूरी
दिखती थी
था आसमान में एक
तारा फिर भी
प्रेयशी को
प्यारा लगता था
रात चांदनी में,
वह उसके
रोज उजाला लेकर आता
राहों में उसके दिखता
था
बारिश की बूंदों
में वह बिखरा
गर्मी के मौसम
में वह एक तारा
खोकर भी वह उभरा
था
अचानक बारिश में ही
आज प्रियतमा
मेरी आँखों में समा
गयी
निःशब्द हुआ जब
तारा वह
देखा अपनी
प्रेयशी को
न उसके जज्बात
मिले उससे
न भावों की उसके बरसात
दिखी
चली गयी अब वह
दूर कही
लगता है, नहीं है
प्रेम की डोर बंधी
फिर छुप गया मैं
एक तारा बन वही
बरसात में और
विरह के आकाश में
प्रश्न बनकर रह
गया हमारा जीवन
क्यों नहीं हो
गया प्रकाशमय .................
-प्रभात



