Thursday, 13 August 2015

थोड़ा सा प्यार कर जिन्दगी संवार लीजिये...

अब भी समय है थोड़ा विचार कीजिये
थोड़ा सा प्यार कर जिन्दगी संवार लीजिये

जिन्दगी है ऐसी तूफ़ान यहाँ आते हैं
ढहने-ढहाने के विचार यहाँ आते हैं
घर के रूप रेखा से ही घर बचा लीजिये
नींव के जतन से ही मकान बना लीजिये

रिश्तों को संजोने के समय बहुत कम है
नफरत की ऊँचाइयों में दूरिया बहुत कम है
शब्दों को शब्दकोष से परख खूब लीजिये
प्रेम के परिणाम को तब आप देखिये

झगड़ों के भीड़ में प्रेम शब्द खो गया
मतलब की आड़ में सदाचार कहीं सो गया
जो कहतें है आप वो आप भी कीजिये
थोड़े से सद्व्यवहार से जग जीत लीजिये

परेशानियों में धैर्य रखना होता है
भाग जाने से बैर रखना होता है
सम्मान दीजिये और सम्मान लीजिये
व्यक्तिवाद से हटकर समूह मान लीजिये

-प्रभात  

Tuesday, 11 August 2015

परिवार....

घर के बीच में दो किवाड़ लग गए है
रिश्तों-रिश्तों में कीटाणु लग गए है
बोली-बोली में जहर के लार लग गये है
देखने से बनावटी परिधान लग गये है

सास-बहु में ऐसे विकार लग गए है
दिन भर मनाने में सारे परिवार लग गए है  
चेहरों पर चमक की जगह आग लग गये है
प्राईवेट-सरकारी समझौतों के दुकान लग गये है

पति पत्नी के रिश्तों में तलवार लग गये हैं
कई-कई नसमझ सवाल लग गये है
बच्चों पर इन रिश्तों से कुठाराघात लग गए है
झूमते परिवारों में रोने के तार लग गये है

रहन-सहन में अलगाव के बयार लग गये है
किलकारियों में रोने के आवाज लग गये है
श्रृंगार में आधुनिकता के पाँव लग गये है
बाजारों में ऋण के सवार लग गये है

खान-पान में संक्रमित विचार लग गये है
रोटी की जगह मैदे में ही अचार लग गये है
जिम में ही बैठे इतने तनाव लग गये है
लाईनों में कई-कई बीमार लग गये है  
-प्रभात   

Monday, 10 August 2015

इस अन्धकार का गुनहगार मैं ही हूँ ...

सुलगता रहा दिन-रात बस चिंता बनकर
मेरी मौत का जिम्मेदार मैं ही हूँ
मुझे नफरतों ने जलाया
मुझे द्वेष ने जलाया
मुझे अभिमान ने जलाया
मुझे भेदभाव ने जलाया
मेरी बाती में प्यार जल रहा तेल बनकर
इस अन्धकार का गुनहगार मैं ही हूँ 

इन हवाओं ने भी मुझे जलने से रोका है
अपने ठंडेपन से ही कुछ नया सोंचने पर मजबूर किया है
बारिश ने मेरे देह को भिगोया इतना
भूल जाऊं जिससे मैं तूफ़ान की बात
मुझे बचपन की खुशियाँ दी है एक खिलौना बनकर
मेरे न खेलने का जिम्मेदार मैं ही हूँ

-प्रभात 

Sunday, 9 August 2015

और थानेदार बड़े मक्कार हो गए है..

सच और अभी हाल के ही एक प्रकरण पर आधारित-

आजकल के सिपाही भी थानेदार हो गए हैं
और थानेदार बड़े मक्कार हो गए है

जहाँ देखिये वही १० रूपये के नोटों का नाता है
रेहड़ी, पटरी, दीन दुखी को लूटने का इरादा है
यहीं पर सारे वर्दी, नली फोर्स इस्तेमाल हो गए है
अशिक्षित दुर्बल को पहचान कर मालामाल हो गए है

किसी सज्जन ने भ्रष्टाचार और हत्या की शिकायत कर दी
तो उस पर ही ३०२, ४२० से IPC की वकालत कर दी
न्यूज पेपर में आज के गुंडे कोर्ट से बरी हो गए है
और सज्जन गांजा के साथ गिरफ्तार हो गए है

रात को चोरी हुयी दारोगा जी सो रहे है
कभी गए किसी बार में तो रम से फन हो रहे है
शक्ति के कलम अब सफ़ेद कुरता में फंस गए है
और चोरी बदमाशी के पक्के साझेदार हो गए है

FIR दर्ज करो साहब कुछ लोगों ने हमें मारा है
अब देखो भाई उलटे दरोगा जी ने मुझे थप्पड़ मारा है
FIR तो जैसे थाने से नीलाम हो गए है
और उलटे ही संरक्षक की बजाय भक्षक हो गए है

जुल्म कबूलवाने वाले का जुल्म कैसे कबूलवाओगे
किसी गांव में अन्धकार में इनकी स्टिंग कैसे करवाओगे
जब चोरो के तार थाने ही जुड़ गए है
और इनके कप्तान अपराधी-मंत्री जी हो गए है  

सबसे पहले कानून के लूपहोल्स को मिटाना है
सख्त कार्यवाही करते हुए इन्हें ही तिहाड़ पहुंचाना है
क्योंकि आजकल दारोगा जी अपराधी बन गए है
और सज्जन आतंकवादी बन गए है

-प्रभात