Friday, 6 March 2015

मुक्तक

मैं तुम्हे भूलता हूँ तभी तो याद करता हूँ 
तुम्हारी तन्हाई में कभी तो याद करता हूँ 
मैं साथ रहूँ या न रहूँ 
मगर हम रहें ये अरदास करता हूँ!
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तुम खीझ गए हो 
तुम रूठ गए हो 
तुम भूल गए हो 
तुम मुझसे कहते हो 
क्यों? 'तुम' ये सब करना भूल गए हो!

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होली पर शुभकामनाएं!

फाल्गुन मास और वसंत की सुन्दर बेला
रंगीन  नैसर्गिक जीवन के साथ   
इस रंगीन त्योहार का सुन्दर मिलन
मोहित मन अरुणोदय को देखता
पुष्प के सुन्दर फूलों के साथ
खिलखिलाकर कुछ कहने की अभिलाषा में
प्रकाशमान नभ की ओर एकटक देखने का हुआ
मानों प्रभात की अनुपम दृश्य के साथ
प्रभात की एकटक निगाहें शरमा गयी
बाल क्रीड़ा करते तबस्सुम की इत्र
मेरे रूह को निस्संदेह खुशबू दे गयी
ब्रज की होली सा सुन्दर अहसास के साथ
साभूषण राधा की पिचकारी से रंगे प्यारे मोहन
मेरे आँगन में किलकारिया ले रहे
मोहन की हास और क्रोध का मिलन हुआ
रंगों से डूबी बाल्टी नन्हे बछड़े को रंग गयी
गऊ परिवार होरी की खुशियों के संग
प्रभाकर की छिति की ओर गंभीरता से   
अचरज का अनुपम उदाहरण हमें सौंप गयीं    
मानों अब हो रहा दिवाकर का परिहास
विश्राम की मुद्रा में आकाश की बाहों में
रंगी हर तरफ दुनिया की परछाई में
राधा सौप रही सुन्दर गुझिया सा व्यंजन
यूँ तेजहीन प्रकाश की ओट में मोहन
की प्यारी बांसुरी की गूँज और
ब्रज सा विस्तार लिए गाँव के नगाड़े संग
नर और नारियों का मनोहर नृत्य हुआ
होली की इस विशुद्ध सुअवसर में
तसव्वुर की अंतर्मन की उड़ान सभी को
होली पर शुभकामनाएं देने संग चल पड़ा
बहुत सारी प्यार की रस्मों को रंग मिलाता हुआ  
                                                                                     

-प्रभात  

Thursday, 5 March 2015

मेरा विचार..

किसी प्रकार की अभिव्यक्ति (फिल्म या डाकुमेंट्री) पर रोक लगाने का मतलब उसे प्रसिद्ध हो जाना समझ लिया जाये तो बेहतर है यह तो पता है कि ज्यादा दिन तक कानून के लूपहोल्स की वजह से बैन नहीं लगाया जा सकता. बैन तो आज तक भारत में किसी की अभिव्यक्ति पर नहीं लग सका है हाँ लगा है वो संस्थागत ऑफिसियली. पर हमें ये भी मालूम होना चाहिए कि जब इस तरीके के बैन लगते है तो उसे देखने की होड़ लग जाती है. कुछ भी हो किसे नहीं मालूम कि गांधी के साथ गोडसे को भी इतिहास के पन्ने पर पढ़ लिया जाता है भले ही वह गलत था. बिना गोडसे का नाम लिए गांधी के हत्या के बारे में पढने की जिज्ञासा कौन कर सकेगा. 


अपराधी के विचार अगर सही होते तो वह अपराध ही क्यों करता. वैसे भी फिल्म में केवल सब कुछ ठीक ही हो तो वह कहानी कैसे आगे बढ़ेगी. इस भारत में सच्चाईयां छुपाकर आगे बढ़ने की बजाय उसे धरातल पर लाना उचित होगा. यह भारत इसी के लिए जाना जाता है. जब समस्याएं है तो उसे मात्र इस कि संज्ञा देना की देशहित का सवाल है तो यह कैसा देश जहाँ हम सवालों के घेरे में आने से अपने देश को बचा रहे है. देश की प्रगति तानाशाही रवैये से नहीं हो सकती. पता है "रेपिस्ट मुकेश" के नाम से हमारे मन में बदले की भावना जाग उठती है पर यहाँ अगर हम भी हत्यारा बन जाएँ तो क्या ये सही है? लाखों मुकेश ऐसे भी है जिनको सैलूट किया जा सकता है. रेप एक आम बात बन गयी है इससे इनकार नहीं किया जा सकता हमें अपने बहनों और बेटियों को क्या केवल सुरक्षा देकर और उन्हें परदे से पीछे रखकर हैंडीकैप बना देना चाहिए? मानसिकता बदलनी होगी हम जैसे युवाओं को इसके लिए सबसे पहले आगे आना होगा. सवाल बहुत से है जवाब की तलाश में दिन भर किसी न किसी का ब्लॉग पढ़ लेता हूँ कुछ लोगों के तर्क वितर्क करने की क्षमता का अहसास और आकलन करता हूँ. बस मन में उमड़ रहे भाव कहीं से मेल खा जाते है उसी प्रकार आज के हिन्दू समाचार पत्र का एडिटोरियल पेज पढने को मिला. इस प्रकार यहाँ लिखने का साहस जुटा पाया. काफी संवेदनशील मामला है. 

साभार- प्रभात

वही गौरैया याद आती है!

विश्व गौरैया दिवस आने वाले २० मार्च को है । परन्तु मैं आज यह पोस्ट कर रहा हूँ । ये पंक्तियाँ तब लिखा जब मैं पिछले कुछ दिनों के पहले घर गया हुआ था और अचानक मुझे कुछ चिड़ियों की आवाजें सुनायी दी । समय बदलते देर नहीं लगता । बदलते परिवेश में न जाने कितने पक्षी विलुप्तता के इस कगार पर पहुँच चुके है जिनके लिए सरकारी उपाय केवल कागज की फाईलों में सिमट कर रह गए है । मुझे गौरैया की आवाज आज भी सुनायी देती है  लेकिन अपने आने वाली पीढ़ी को गौरैया का फोटो दिखाना ही शायद संभव हो, उन्हें आवाजें क्या फोटो में ढूँढना मुश्किल होगा!
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वही गौरैया याद आती है
जिसके अंडे को
हाथ लगाकर देखा था कभी ।
बरामदे के मुक्के* में रोज झांकता
यह बड़ी कब होगी
हम भाई-बहन यही सोंचते
अब तब कौन कब साथ रहा
चंद दिनों बाद सुन्दर सी गौरैया
अपने पंखो के साथ आती है
जिसके बचपन को
खूब पास से निहारा था कभी ।
वह साथ में माँ के साथ
होती है
उसकी माँ उसे
उड़ाने का
निरंतर अभ्यास कराती है
माँ के साथ गिरती हुयी नन्ही गौरैया
खेलती है
वही गौरैया याद आती है
जिसको दानें चुगते देखा था कभी ।
मानों वह प्यार अब न रहा
गौरैया न रहा
अब केवल सन्नाटे के साथ
एक कागज पर लिखा
मेरा यह भाव सिमट कर
सवाल के रूप में जा पहुंचा
पास बैठी दादी जी के पास
सूरज ढल रहा है
बस चिड़ियों की आवाजें आती हैं
गौरैया के होने का केवल
अहसास करता हूँ अभी ।
दादी, ये आवाज किसकी है
धुनियाईन, कीड़े खाने वाली
जवाब सुनकर जिज्ञासा से
एक सवाल और
क्या गौरैया नहीं रहा
नहीं, अब नहीं आती है
जिसको उड़ते हुए
बरामदे में देखा था कभी ।

*मुक्के- इसका अभिप्राय बरामदें की दीवाल के ईंटों के बीच के उस जगह से है जो जगह दीवाल के प्लास्टर होने से पहले छूटी रहती है. ये जगह एक ईट की हो सकती है जिसमें बॉस लगा कर उसके ऊपर खड़ा होकर ऊपर के दीवाल के भाग की जुड़ाई करते हैं!
                               
                                                                                                                  -“प्रभात”