Saturday, 21 November 2015

डायरी से ...

छोड़ कर घर अपना प्रेम का धन अपना किसी दृष्ट को तलाशती है

निरोग का जिस्म अपना नीर का प्रभाव भी सूखे नयनों को डुबाती है

प्रेम की करुण छाया में तो दशरथ सिधार गए, रामचन्द्र बनबास गए

समझ आया क्यों मंजिल की जुस्तजू में नयन भींगते-भाते चले गए


-प्रभात 

Friday, 23 October 2015

जब विविधता में एकता का प्रत्यक्ष प्रमाण हो

जब भारत की संस्कृति का विश्व में स्थान हो
जब रहन-सहन खान-पान में देशी लगाव हो
जब विविधता में एकता का प्रत्यक्ष प्रमाण हो  
-Google
जब बोली, भाषा का दूर–दूर तक प्रसार हो 
तो कौन सा समय है संस्कृति से खेलने का
राजनीति में प्याज और अरहर तौलने का  
किसानों की जमीन को तराजू में रखने का
देख नहीं रहे भारत की गरीबी भूखमरी को
कैसा संसद में बैठने बनने का अभिमान है
जाती-पाति से वोटो के लिए बेतुका बयां है
देश के विकास के भागीदार सभी समझ लो
किसानों की आत्महत्या के परिणाम देख लो
किसान अन्नदाता भूखा अब तक सो रहा
गन्ने उपजाने वाला केवल कर्ज में डूब रहा
जब भारत की दाल रोटी पर विदेशी छाप हो
जब गन्ने के गुण पर रसोईयों का गुणगान हो
जब बाजरे की रोटी और साग पर बाजार हो
तो इस स्थिति के लिए किसान क्यों बर्बाद हो
आजाद भारत में फ़ैली गरीबी में हिस्सेदार हो
जब यही की संस्कृतियाँ पूरे विश्व में जा रही हो
जब गाँव की परिभाषा का विस्तार हो चला हो
जब देश की महानता में सभ्यता दिख रहा हो
तो अपने ही देश में अब खतरे में क्यों है सभ्यता
मानवता की परिभाषा से दूर हो रही है सभ्यता
लड़कपन में बीमार करने आ गयी विदेशी सभ्यता
सभ्यता का पर्याय बन कर रह गयी अपनी सभ्यता
जब गुरुकुल की शिक्षा का प्रसार यही हुआ हो
जब नीति निर्माताओं का विश्व में नाम हुआ हो
जब प्रेम के लिए कृष्ण और महाभारत ग्रन्थ हो
तो मासूमों की जिन्दगी में आज आग लग गयी है
क्यों बेटियों की जिन्दगी भी दांव पर लग गयी है
धर्म को लेकर क्यों निर्मम हत्याएं आज हो रही है
जवाब है बहुत सारे समझ लो बस यही सभ्यता
अपने गाँव या शहर में बस चुन लो अपनी सभ्यता

-प्रभात 

Thursday, 22 October 2015

मेरी डायरी से...........

किसी की परवाह करूँ तो मुसीबत बढ़ सी जाती है
कोई मेरी परवाह करे तो बेचैनियाँ बढ़ सी जाती है
चाहता हूँ जीवन में रहूँ अकेले, कुछ याद किये बगैर      
-गूगल 
सोचूं अलग तो कैसे जिन्दगी उदास जो हो जाती है  

अभी तक सपनों में डूबा खुद को अंदाज रहा था
कभी उड़कर हंस रहा था तो कभी गिरे रो रहा था
पता चला मुझे हकीकत का, उस वक्त नही मगर
जब आँख खुली भी तो फिर सपनों में लौट रहा था  

-प्रभात  

Sunday, 18 October 2015

वास्तविक और संवेदनशील

हम नन्हों के सपनों में, आग कभी लग जाती है
जैसे खेतों में चिंगारी पूरे समुदाय को ले जाती है
-Google

हर हाथों में हौसले से अगर हिम्मत दी जाती है
तो बरामदे में लगे पूरे घोसले तोड़ दी जाती है

बालक-बालक जब दौड़ रहा रेल पटरियों के बीच में
माताएं-बहने मांग रही है, दो जून की रोटी भीख में
कर रही है गुलामी औरों की, बालक बेच दी कोख में
ठुकरा-ठुकरा दी जाती जब अधिकारों से क्रीड़ा द्युत में

ऐसे जिन्दगी के चलने में रुकावट एक दिन आ जाती है
जैसे मैखानें में हर दिन जाने से सांस कभी रुक जाती है

घर का छप्पर अगर कभी लगता तो कूड़े के एक ढेर में
कब तब बेघर हो न जाए, चिन्ता है पड़ा सरकारी क्रेन में  
सारी देह तपन में रंगी नन्हा बालक पड़ा किसी ट्रेन में
दौड़ रहे है बचा रहे है जीवन, आतंक से और इस आग में

ऐसे नाम होते आँखों में हिंसा एक दिन जब देखी जाती है
इन कोमल से हाथों में हिंसक हथियारों की बू आ जाती है

देख रहे है संसद की गतिविधियाँ लगी हुयी है, जो खाने में
उजड़ रहा है परिवार गरीब का रोजाना नए क़ानून आ जाने में
नहीं हो रहा सुधार तंत्र का, पुलिस ही लगी है देश लुटाने में
हत्या, रेप, डकैती करवाती और राजनीति है पीछे भड़काने में

मजहब, भाषा, जाति के नाम पर हत्या अब हो जाती है
फिर से हम नन्हों का जीवन अंधकारमय देखी जाती है 

-प्रभात