Monday, 23 September 2019

दिल्ली की सड़कों पर 1 बजे रात


दिल्ली की सड़कों पर 1 बजे रात
घर से बाहर कदम रखते ही
दिखता है गलियों में सन्नाटा और
इस सन्नाटे में प्रेमी और प्रेमकाओं की चीखें
कई अमानवीय मानव और कई मानवीय कुत्ते
गाड़ियों की बोनट पर बैठे हुए
झूमते हुए नशे में गिरते हुए आदमी
और खोखले, कमजोर, शरीरविहीन।

ट्रकों का सड़कों पर रौंदना तेज हो जाता है
और इस रौंदने में जीव निर्जीव हो जाता है
फुटपाथ पर बिना सांस लिए आदमियों का सोना
मरे हुए आदमी और उनकी तरह टायरों का रोना।
1 बजे रात लगता है आदमी, आदमी नहीं हैं
गुंडागर्दी और हैवानियत के आगे जिंदगी शर्मशार है...
क्योंकि फिर अगले सुबह किसी की चीख अखबारों में सिमट जाएगी
शाम होते ही कुछ मोमबत्तियां जल जाएंगी
और रात होते ही बुझ जाएंगी
और फिर 1 बज जाएगा फिर गलियों में फैलेगा सन्नाटा
तस्वीर: गूगल साभार

कुछ सुकून के पल


कुछ सुकून के पल
कुछ तरंगे जो हमेशा मुझे पास पहुंचा देती हैं
कुछ एहसासें जो बाहों को बाहों में फिसला देती हैं
कुछ तारों व सितारों का मंडल जिन्हें हम खामोश कर देते हैं
मैं कहता हूँ वही प्यार पराया आज तुम्हारे साथ है

कवियों की तरह पागल, आशिकों की तरह पागल
लेखकों की तरह पागल, खोजी की तरह पागल
मन ही मन हम दोनों ही पागल
कहीं तो कभी तो कोई तो होगा पागल
जो कहेगा एक पागल को दूसरा पागल मिल गया
चाँद अब भी दिखा है उसी बचपन में खाट के ऊपर
एक अंगुली तुम्हारी और एक मेरी
करधन को सीधा करते हुए नोचना तुम्हें
और फिर तुम्हारा गाल ऊपर करके बोलना
और फिर खिलखिलाना, जैसे उतरकर आ गया चाँद
चूमने हमें और हमें लगा कि बचपन साथ है

नींद जब टूट जाती है


बहुत दिन हुआ शायद लिखे मुझे कुछ नया।
लिखा भी तो कुछ रचनात्मक, सृजनात्मक और भावनात्मक न लिखा।
जो भी रहा शायद पन्ने पर न उतर सका।
आज लिख रहा हूँ फिर से तुम्हें क्योंकि तुम्हें लिखकर मैं इन सबको जाहिर कर सकता हूँ।

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नींद जब टूट जाती है, पंखे जब घूमने बंद हो जाते हैं
पार्क और मेट्रो की ओर देखता वही चेहरा याद आ जाता है
हां वही चेहरा जिसे देखने के लिए घंटों मैं इंतजार करता था
वही चेहरा जिसे न सामने पाने पर किसी से पूछना पड़ता था
और पूछने पर बहाना बनाना पड़ता था कि जैसे तुमसे मेरा कोई नाता ही न हो
इस तरह की विवशता कि जिसमें तुम्हारे सामने होने पर भी मैं आंखों से टाल देता था
या यूं कहें कि हमेशा तुम्हें इग्नोर ही करता था
लेकिन तुम्हारे जाने के बाद और उस समय भी जब इग्नोर करता था
बहुत देर तक गहराई से तुम्हारे आत्मा तक पहुंचने की कोशिश करता था
घंटों तुमसे बातें करता था और रह रह के खुद ही मन ही मन हंस लिया करता था
फिर तुमसे कुछ कहना भी चाहता था, लेकिन पहले तो कहा नहीं
और जब कहा तो तुमने सुनना ही बंद कर दिया
अविश्वास की खाई ही गहरी हुई और लगा कि तुम्हारे सामने खुद को सही तरीके से रख देने के बाद भी
कुछ कमियां रह गईं
इसलिए ही मेरे चेहरे के भाव को समझना क्या उसे खोल के रख देने के बाद भी
मैं तड़पता रहा और तुम उनसे कुछ जाहिर ही न कर सके
कहते हैं कि जहां मुझे मौन होना था वहां तुम मौन रहे
और जहां मुझे बोलना था वहां खुद ही बोल लिये
कुछ छूटा भी तो सामने आया कभी कुछ कहने
तो कह नहीं पाया ऐसा लगता है
लेकिन सच कहूं सब कह दिया
जिसे तुमने सुना शायद नहीं
या सुनकर रोज याद करती हो
मेरी तरह
शायद यही वजह है कि अब भी दिल तेजी से धड़क उठता है
चेहरे पर खामोशी आ जाती है
आंखों में एक काला सा धब्बा
और वही जाती हुई मेट्रो, पार्क और कैब
हो जाता है सब कुछ असामान्य
बस तुम्हारा नाम सुनकर
बस तुम्हें आंखों के सामने यादकर
बस यादकर!


नजर नहीं तो नजर किसी से कैसे मिल पाएगी

नजर नहीं तो नजर किसी से कैसे मिल पाएगी
बात जहां थी वर्षों पहले वहीं पर रह जायेगी

इतना मुश्किल काम नहीं जिसे कर न पाएं हम
हम अपने विश्वास पर जग जीत न ले आएं हम
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