Thursday, 7 December 2017
पिताजी, इस कदर मुझे डर है
पिताजी, इस कदर मुझे डर
है
आपके न होने काकि मैं मर्जी से शादी करने की जिद
छोड़ देती हूं
मैं अपनी सारी खुशियों को
आपके सहारे छोड़ देती हूं
आपकी खुशी के लिए
क्योंकि जानती हूँ बेटियाँ
शायद सब कुछ नहीं कर सकतीं
अगर कर भी सकती हैं तो
शादी के लिए रिश्ते आप ही ढूंढेंगे
मैं अगर ढूंढ़ भी लूंगी
तो मुझे त्यागना पड़ेगा,
अपने प्रियतम को
अपने बंधनों को
अपनी खुशियों को
और अपने बचपने को
और सबसे बड़ी बात
मुझे कठोर बनना पड़ेगा
दिल और दिमाग दोनों से
मुझे असर नहीं करेंगी
ठंडी और गर्म हवा
जीवनरूपी रंगमंच पर
किरदार निभाऊंगी
चेहरे पर खुशी होगी
अंदर से टूटी नहीं दिखूंगी
लेकिन मैं
असंवेदनशील बन जाऊंगी......
प्रभात
तस्वीर: गूगल साभार
एक सुबह
मैं दिवाली में घर गया और वापसी में जब ट्रेन पकड़ा तो माँ ने काफी
गंभीरता से हर बार की तरह कुछ ऐसा ही कहा
कहाँ पहुँचे हो, सीट मिल गई, खाना खा लिया...मेरी कम बात करने की आदत है हां सब ठीक है कहकर, फोन रख दिया।
लेकिन.....शायद वह कुछ कहना चाहती थीं।
कहाँ पहुँचे हो, सीट मिल गई, खाना खा लिया...मेरी कम बात करने की आदत है हां सब ठीक है कहकर, फोन रख दिया।
लेकिन.....शायद वह कुछ कहना चाहती थीं।
सुबह ट्रेन दिल्ली पहुंची मैंने कॉल कर कहा माँ मैं कमरे पर पहुंच
गया। माँ ने कहा अच्छा, ठीक और सब बढ़िया है?
हां...मैंने कहा, लेकिन सवाल था और सब बढ़िया
है तबियत ठीक है ऐसा पूछने का मतलब...कुछ और पूछना चाह रही थीं...क्योंकि मेरी
तबियत गड़बड़ थी तो नहीं
हां आजकल 4 बजे तो सोता हूँ तो देर तक तो सोऊंगा
और कोई बात है क्या? सब ठीक है न?
हां.... माँ ने कहा
हां.... माँ ने कहा
फिर 3 घण्टे बाद 1 बजे दोपहर
दुबारा कॉल आया....मैं सोकर उठा था....हां अम्मी बताइए कैसी हैं....बस ऐसे ही किया
अभी सो रहे हैं क्या.....माँ ने पूछा
हां अभी थोड़ी देर पहले उठा हूँ। और बताइए....मैंने सहज उत्तर दिया
अच्छा तो अभी तक कुछ खाए भी नहीं होगे?..इसलिए काफी कमजोर होते जा रहे हो....माँ ने कहा
अच्छा तो अभी तक कुछ खाए भी नहीं होगे?..इसलिए काफी कमजोर होते जा रहे हो....माँ ने कहा
हां अब उठेंगे लेट तो लेट ही खाएंगे...अभी वैसे कुछ खा लिए हैं
खाना तैयार हो रहा है बाकी....मैंने कहा।
माँ ने कहा....अच्छा एक बात बताओ दिवाली में आए मैंने देखा काफी
उदास से रहते हो, क्या हुआ कोई तकलीफ है क्या? इस बार काफी शांत-शांत से थे....कुछ किसी से बोलते भी नहीं थे...मेरे मन
में सवाल उठ रहा था ....रहा नहीं गया मैं सोची पूंछती हूँ आखिर क्या बात है....कुछ
हो बात तो बताओ उसको साँझा करोगे तो दूर होगी समस्या....बताओ किस तरीके की शारीरिक,
मानसिक, आर्थिक और पारिवारिक इनमें से कौन सी
समस्या है...???
मैं सुनकर दंग रह गया, माँ तुमने मेरी खामोशी को कैसे पढ़ लिया.....मैंने कहां कुछ नहीं वो वैसे ही आपको लगा होगा।कुछ भी तो बात नहीं। मैं ठीक हूँ और ठीक रहूंगा।
मैं सुनकर दंग रह गया, माँ तुमने मेरी खामोशी को कैसे पढ़ लिया.....मैंने कहां कुछ नहीं वो वैसे ही आपको लगा होगा।कुछ भी तो बात नहीं। मैं ठीक हूँ और ठीक रहूंगा।
माँ ने अधूरे मन से आश्वस्त होकर कहा ...ठीक है खुश रहना
चाहिए.....
फोन कट गया, लेकिन मैं पूरे दिन माँ के ख्यालों में डूबा रहा और सोचता रहा...कि मां के लिए जितना लिखा जाए कम ही है...
उन्हें शब्दों में लिखा ही नहीं जा सकता...
फोन कट गया, लेकिन मैं पूरे दिन माँ के ख्यालों में डूबा रहा और सोचता रहा...कि मां के लिए जितना लिखा जाए कम ही है...
उन्हें शब्दों में लिखा ही नहीं जा सकता...
माँ और मेरी जिंदगी
तेरे जीने का सहारा हूँ, बचपन से लेकर
अब तक दुलारा हूँ माँतेरे दिल को जानता हूँ माँ, मेरी खामोशी को पढ़ लेती हो माँ
भीड़ में अगर मैं खो जाऊं तो दिन रात ढूंढ़ती रह जाओगी माँ
अक्सर ढूंढ़ता हूँ तुम्हें किसी और में, तुम मुझे ढूँढ़ लेती हो माँ
इसलिए माँ
मैं हवाओं में बहकर दूर चाहे जहाँ पहुंच जाऊं, तुम्हें शक तो होगा
मैं शून्य से धरा पर या धरा से शून्य तक चला जाऊं, वाकिफ तो होगी
मैं पत्ती बन पतझड़ में मुरझा भर जाऊं तुम्हें दर्द तो होगा
समुंदर में मैं कहीं डूब जाऊं तो गहराई का तुम्हें एहसास तो होग
मेरी खुशी का आधार तू है तो तेरी जिंदगी का आधार तेरा बेटा है माँ
मैं शून्य से धरा पर या धरा से शून्य तक चला जाऊं, वाकिफ तो होगी
मैं पत्ती बन पतझड़ में मुरझा भर जाऊं तुम्हें दर्द तो होगा
समुंदर में मैं कहीं डूब जाऊं तो गहराई का तुम्हें एहसास तो होग
मेरी खुशी का आधार तू है तो तेरी जिंदगी का आधार तेरा बेटा है माँ
मैं किताब हूँ और मेरे हर पन्ने को पढ़ लेती हो माँ....मेरी आँखों
को और चेहरे को पढ़ने वाला तेरे अलावा कोई दूजा रिश्ता नहीं देखा माँ..
-प्रभात
यादों के झरोखों से
यादों के झरोखों से...

सुबह हो गयी है। छप्पर तले भागलपुरी चादर ताने नींद से जगा था। हर तरफ चिड़ियों
की चहचहाहट और गायों की मी... की जोर जोर से आवाज आ रही थी। पास में आवलें के पेड़
पर बैठा पट्टू भी सुरीली आवाज में कुछ कह रहा था। कोयल की कूक के क्या ही कहने।
दादाजी चारा काट रहे थे। मौसम ऐसा था....जैसे शिमला की हल्की कोहरे वाली
सुबह...टिप-टिप की बजाय, बहुत हल्की बूंदा बांदी...गन्ने के
ढेर आंगन से हटाए जा रहे थे। दादी कह रही थीं कि जाग जाओ भईया...उठो तो आज दीवाली
है । का लेवक बा..जाता दिया, चूल्हा, घंटी...खेले
वाला सारा सामान लइके कोहार आय हईं।
जल्दी से जागकर बैठे तो देखा हर तरफ घर की सफाई हो
रही थी। आज स्कूल भी नहीं जाना था....लिपाई चल रही थी। जमींकंद की खोदाई हो रही
थी। आंगन गोबर जी लिपाई से चमक रहा था। तुलसी के पेड़ के आस-पास मनोरम दृश्य लग रहा
था। गुलाब की पंखुड़ियां पूरे वातावरण को महँका रही थीं। बछड़ा और पिल्ला सब खेल रहे
थे। भौरें और तितलियां मंडरा रही थीं। दादा-दादी कह रहे थे कि पढ़ लो आज कुछ सब याद
हो जाएगा। मैं सोचा इससे अच्छा क्या हो सकता है। सामाजिक विज्ञान की कॉपी निकालकर
आग्नेय, अवसादी और रूपांतरित शैल सैकड़ों बार
पढ़ डाला कि याद हो जाएगा आज तो दीवाली है...हां एक बात है। सबसे कठिन लगने वाला यह
विषय मुझे याद हो गया।
अब शाम होने वाली थी। दिन-भर टहल-टहल कर खूब जाता से आटा पीसे और चूल्हा के
ऊपर बटुली रखकर खूब पकाया।अच्छी-अच्छी मिट्टी की बनीं प्लेटों का जमकर फायदा
उठाया। सुबह से मिठाईया खा-खा कर अघा गया। था। आखिर बच्चा तो और क्या कर सकता था।
हां रात को दीपावली को लेकर इतने उत्साहित थे हम कि दिया रख रख कर थक गए थे लेकिन
हारे नहीं थे। 200 दिया लिए थी अम्मी लेकिन उसे जिद
करके 300 करा दिया था। दादी जी काजल बना रही थीं। और सभी लोग
गणेश जी और लक्ष्मी जी की पूजा कर रहे थे। आस- पास के लोगों को मिठाईयां देने गए।
अच्छे पकवानों में से मनपसंद मेरा एक पकवान पूरी और कंद की सब्जी खाने जा रहा था।
दादा जी और घर के सभी लोग साथ बैठकर हँसी मजाक कर रहे थे। खाना खाते-खाते बोल उठा
दादी जी ये बताइए आज राम जी कैसे लौटे थे....अब भी अयोध्या में कोई होगा? अच्छा अमावस की रात क्या है? ये सूप जो पीटा गया था
एकादशी में ....ईश्वर आवें दलिद्दर जाएं...ये क्या है? इतने
में नींद खुल जाती है....और पता चलता है समय बहुत आगे आ चुका है....आज दीवाली तो
है मगर वो जश्न नहीं, आज सब कुछ वही है मगर वो लोग नहीं...सच
में सब सपना बन जाता है।
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