अभी
समय मिला तो सोंचा हिंदी दिवस पर कुछ न कुछ लिखना जरूरी है इसलिए नहीं कि मेरी
भाषा है इसलिए की यह आमजनों की भाषा और हमारी माँ है। राजकीय भाषा बने होने के
नाते मुझे लगता है कि हम कही न कहीं किसी सन्दर्भ में गुलाम तो हैं ही, किसी देश की भाषा अगर एक नहीं हो सकती तो किसी गुलाम भाषा भी हमारी भाषा
नहीं हो सकती। विभिन्नता में स्वतंत्रता निहित है इसलिए भी मुझसे कुछ कहे बिना
नहीं रहा गया। तो लीजिये हर बार की तरह 2-4 लाइनें और हिंदी
को समर्पित है।
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इंग्लिश को रख दू साइड घर में हो गया डिसाइड
हिंदी ने अवसर दिया है, मन से अपनी बात कह दूँ
हिंदी ने अवसर दिया है, मन से अपनी बात कह दूँ
भाषा में नहीं जकड़ना तुम
भी कहीं न झिझकना
साहित्य की भाषा न हो सही, मन की बात कहना
साहित्य की भाषा न हो सही, मन की बात कहना
प्यार
मिला है इतना हिंदी से अब मिल गया है सबूत
अंगरेजी से न मिल पाया अब तक प्रूफ हो गया बहुत
अंगरेजी से न मिल पाया अब तक प्रूफ हो गया बहुत
मेरी
तरह ही तुम भी चाहो तो किस्मत आजमा लो
तुम भी किसी एक भाषा को अपनी माँ बना लो
तुम भी किसी एक भाषा को अपनी माँ बना लो
मेरी
भाषा ही नहीं, हिन्दी की बोली भी मिली है
भाषा पर गर्व है क्योंकि इससे आजादी भी मिली है
भाषा पर गर्व है क्योंकि इससे आजादी भी मिली है
अब
समझना तुम्हे है इसे राजभाषा ही न समझिये
मातृभाषा है इसे दिखावे में अलग थलग न कीजिये
मातृभाषा है इसे दिखावे में अलग थलग न कीजिये
हिंदी
ने ही प्यार , परिवार, अच्छे दोस्त दिए है
इतने
हिंदुस्तान को कोई कंपनी अब नहीं आ पायेगा जीतने
हिंदुस्तान को कोई कंपनी अब नहीं आ पायेगा जीतने
अभिव्यक्ति
है हम स्वतंत्र है, फिर क्यों अंग्रेजी आम है
अफ़सोस है हम समर्थ है, क्यों फिर अंग्रेज के गुलाम है
अफ़सोस है हम समर्थ है, क्यों फिर अंग्रेज के गुलाम है
प्रभात
(कृष्ण)



