Tuesday, 13 September 2016

रेत पर बैठकर भींग जाऊंगा

ख्वाहिशें दिल की हैं जो कुछ
जब कभी पूरी न होंगी
तो रेत पर बैठकर भींग जाऊंगा
-Google
आँसुओं की धार जारी हो
इससे पहले तट पर लेट जाऊंगा
संगम के वेग को थामने   
मैं शिला बनकर पहुँच जाऊँगा  
फैसले से ज़िन्दगी में भटकूँ गर
साँस को रोकना सीख जाऊंगा
पसीने से तर होगी हथेली तो
शीतल मुस्कुराहट दे जाऊंगा
चमकते तारे में देख तुम्हे  
प्रकाश जुगनूं का सौप जाऊंगा  
प्रभात “कृष्ण”

9 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (14-09-2016) को "हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ" (चर्चा अंक-2465) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. Replies
    1. बहुत दिनों बाद आपको देख कर खुशी हुई, आभार

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’हौसलों की उड़ान - ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  4. कितना कुछ है इन लफ़्ज़ों में ……… गहन अत्यंत गहन |

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    1. आपका शुक्रगुजार हूँ, गहनता ढूढ़ लिया आपने।

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    2. आपका शुक्रगुजार हूँ, गहनता ढूढ़ लिया आपने।

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