Saturday, 22 September 2018

मैं सच में कमाल का इंसान हूं


मैं सच में कमाल का इंसान हूं। एक इंसान जिसके लिए नहाना अन्य दूसरे चीजों से भी ज्यादा मायने रखता है। कुछ वाकया बताते हैं....
2010 के आस पास की बात है, अपने मित्रों के संग अमृतसर, वाघा बॉर्डर, जलियावालाबाग तक घूमने की योजना बनी। सामान्य यानी कि लोकल डिब्बे में बैठकर सफर करना था। 3-4 साथी थे। रात को दिल्ली से अमृतसर के लिए रवाना हुए। सुबह ट्रेन अमृतसर पहुंच गई। अब समय था, नित्य क्रियाओं से निपटने की। जिसके लिये कहा जा सकता है कि शौच ज्यादा जरूरी प्रक्रिया है। हालांकि सभी लोग शौच के बाद ब्रश और ब्रश के बाद चाय लेने लगे और उसके बाद घूमने की योजना। मैं इस चक्कर में कि नहाने तक की प्रक्रिया जब तक न खत्म हो तब तक खाने और यात्रा करने का आनंद का मजा कैसे आये। तभी एक दोस्त ने मेरी जिद पर एक जगह इशारा किया जहां खुले रेलवे स्टेशन के टीनशेड के नीचे एक जगह पानी का इंतजाम था....और मेरे लिए यहीं नहाने के लिए काफी था।.... और मैं खुले में ही स्नान कर चुका था ।
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दूसरा वाकया और मनोरंजक है। एक बार 2016 में मनाली जाने की योजना थी। दिल्ली से मनाली बर्फबारी की वजह से सुबह पहुंचने की बजाय रात 12 बजे पहुंचे। 12 बजे तक रास्ते बाहर बर्फबारी और उसी में फंसे होने के बाद सभी को गर्मी चाहिए थी। कुछ को अल्कोहॉल और कुछ को हीटर/कंबल। लेकिन, मेरे लिए नहाना जरूरी था। होटल वाले लड़के से जब कहा गया कि नहाने के पानी का इंतजाम कर दो। तो ऐसे देख रहा था जैसे कुछ गलत बोल दिया हो। किसी तरीके से गरम पानी के नाम पर 2-3 मग पानी दिया। लेकिन, नहाने के लिये बाल्टी भर पानी की जरूरत थी। और अब 2-3 मग पानी मे जमा हुआ बर्फ का पानी मिलाकर नहाया। इसके बाद रोटी का इंतजाम करना था।
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दूसरे कई मौकों पर अक्सर ऐसा हुआ, जब मजबूरन यात्रा यानी बिना योजना के कि नहाना एक बहुत बड़ा लक्ष्य था। लेकिन, ऐसे मौकों पर सुलभ शौचालय काम आए। 
एक और वाकया बताता हूँ। एक बार हंसराज छात्रावास में पानी खत्म हो गया। मैं दूसरे अन्य बच्चों की तरह इंतजार न कर सकता। कॉलेज की गली छात्रावास के सामने है। जहां पार्क है। पार्क में घास सीचने के लिए मोटी पाइप लगी है। और पाइप ऑन करके खुले में स्नान करके ही चैन मिला।
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मुझे ध्यान आता है एक बार जब मैं नहीं नहा पाया था। बात बचपन के उन दिनों की बात है जब मैं अपनी दादी के साथ घर से छिपते हुए भाग गया था। 10 किलोमीटर दूर भागना इसलिये पड़ा था क्योंकि पुलिस का आंतक था। डर था इतना कि पेशाब करने की जब नौबत आई थी तो उन दिनों कमरे में रखे बोतल में करना पड़ा था। ऐसा भयावह रूप लिए वह दिन हमारे नहाने का नहीं जीने का था। इसलिए ऐसे समय एक दिन नहीं नहा पाए थे। न नहाने से ऐसा अहसास हुआ था कि शरीर निर्जीव हो चुका है। धूप में शरीर में खुजली होती और शाम तक जब तक पानी नहीं पड़ा तब तक ऐसे लगा था जैसे मैं हूँ ही नहीं। 
खैर कुछ लोग तो सच में कमाल के होते हैं जैसे वे लोग जो कई कई महीने तक बिना नहाए रह सकते हैं। आपको ताज्जुब होगा एक ऐसा भी लड़का था, वह नहाया नहीं 3 महीने तक और पता लगा सारा शरीर कृमि की चपेट में है। अस्पताल में भर्ती हो गया था। अब समझने वाली बात ये है कि इंसान कमाल का कौन हुआ।
(आज मुझे ये सब तब ध्यान आया। जब मैंने नहाने के लिये केवल लखनऊ के 1 होटल में 700 रुपये खर्च कर दिया। वह भी 1 घंटे के लिए)

-प्रभात


Thursday, 9 August 2018

बारिश बहुत सामान्य सी बात है


बारिश बहुत सामान्य सी बात है।
हां, मेरे लिए भी।

अच्छा लगता है
कागज के नाव में बचपन को देखना,
या झूलों पर बैठ कर भीगना हो।
हां, धान की रोपनी गीत गाते देखना भी
सबमें सुर भी है, ताल भी है।
मेढक के अलग सुर
बादलों के अलग सुर,
हां, बूंदों के भी सुर।
क्योंकि बारिश बहुत सामान्य सी बात है।

लेकिन, यही सुर शोर बन जाए तो
चाहे वह किसी का फिसलना हो,
किसी का डूबना हो,
हां, घर का भी।
बादल फटना हो तो भी
चिर्री लगना हो तो भी,
कुछ ढहना हो तो भी,
बारिश बहुत सामान्य सी बात है।
लेकिन, अब अखबारों में छपना
और मुआवजा देने वालों के लिए।

टहनियों का गिरना देखा ही होगा
लेकिन, पौधों का मरना?
हाँ, देखा होगा तो खेतों का डूबना भी
और उनका डूबकर खत्म हो जाना।
इनके मर्म को कौन जानता है?
जो निर्भर हैं कीट पतंगे,
पशु पक्षी यानी सभी जीव जंतु
हां, खिलते फूल भी।

बारिश बहुत सामान्य सी बात है।
मेरे लिए भीगने की आस में
बाढ़ में तैरती मछलियों के लिए भी,
पकौड़ों और भुट्टे खाने वालों के लिए भी,
हां, नौका विहार करते हुए जोड़ों के लिए भी,
लूह लगकर तप रहे लोगों के लिए भी।

लेकिन, डूबना, बरसना या चहकना
याद तो दिलाती हैं।
किसी के बिछड़ने की
हां किसी को खोने की,
किसी के जाने की।

लेकिन, बारिश बहुत सामान्य सी बात है
उनके लिए जो डूबना नहीं चाहते,
जो तैरना जानते हैं,
जो खुशनुमा माहौल को याद करते हैं।
हां, दूसरी ओर ऐसे लोग भी
जो याद ही नहीं रखना चाहते, भूल जाते हैं।
जिन्हें देखना या सुनना नहीं आता
जो राज करना जानते हैं,
और सबसे बड़ी बात यही कि जो संवेदनहीन हैं।

#प्रभात

एक अजनबी शहर जहां तुम मिले

एक अजनबी शहर जहां तुम मिले
या यूं कहें कि हम मिले
हमसे ज्यादा ख़ूबसूरत रातें भी हुईं
दिन रात ख्वाब बनकर जो चल रहे थे
अब ख्वाबों के बाद सुबह हो गई
वो रास्ते जो हमें देख रहे थे
आज पूछते हैं कि हम कहां गए।


टूटती चरमराती लकड़ियों की तरह
यादों का बार बार स्मरण हो जाना
जैसे महुए के फल का सुबह सुबह टपकना
वैसे ही लिबास पर गिरती हैं कुछ बूंदे
स्मृतियों की, हंसी खुशी वाले रास्तों की
बातों की बहती दरिया में बहते पलों की
वो पल जो हमारे गवाह बन कर जी रहे हैं
या यूं कहें कि जहां पर कभी कभी लौट जाते हैं
आज पूछते हैं कि तुम कहाँ गए।

लेकिन, हम बताते हैं कि हम आ गए हैं
बहुत दूर, जहां तुम्हारा अलग गांव ही नहीं है
बल्कि संसार है, और मेरा अलग संसार
रास्तों, कभी हम थे अगर तुम्हारे सामने
तो आज कोई और हमसफर होगा उसी राह पर
फिर क्या सबसे पूछोगे कि तुम कहाँ गए
चलना तो है ही तुम्हारी राह पर हर किसी को
फिर क्यों पूछते हो हम कहाँ गए, कहाँ गए।

कभी कभी खाली बैठने से कवित्व भाव बन कर दिल में उमड़ने लगता है, इसलिए लिख दिए, लेकिन मैं कवि नहीं हूं।

#प्रभात

तस्वीरः गूगल साभार

समाज का आईना देखिए

एक भाई साब जैसे ही मुर्गी को एक थैली में लटकाए और चाकू को दूसरे हाथ में पकड़े रसोई में प्रवेश किए तो मुझसे कहने लगे कि ये लोग कितने हिंसक हैं जिंदगी बर्बाद कर दी है इन्होंने उसकी। इतनी दरिंदगी से पेश आये। पीट-पीट कर उसे मार डाला। मैंने कहा हां, बहुत गलत किया।
अच्छा चलिए खाना खाते हैं, क्या लाए हैं, आपको क्या अच्छा लगता है, उसने कहा।

मुझे शाक सब्जी के सिवा कुछ भी नहीं, मैंने कहा।

मुझे तो उसका जेनाइटल पार्ट खाने में बहुत ही अच्छा लगता है।...... यार मंदसौर वाली कहानी कितनी दर्दनाक है। बच्चे को नहीं छोड़ा। तड़पते हुए......,उसने कहा
जरा एक पीस देना उसने अपने दोस्त से कहा, ये लो पीछे का पार्ट, इतना कहते हुए उसने दे दिया। और वह कत्ल, दरिंदगी और हिंसा पर जमकर लेक्चर देता गया, साथ ही उसने ये भी बताया कि कैसे उसके यहाँ प्रोग्राम में जानवरों को पानी मे उबाल उबाल कर मारा जाता है।
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यार तुम्हें पता है कि वो लड़की जो अभी तुम्हें मिली थी वो रंडी है उसने कई लोगों के साथ सेक्स किया है। मैंने पूछा, अब तक तुमने कितने लोगों के साथ किया.......
वह हिचकिचाया और उसने कहा लेकिन....मैंने तो बस गिनती नहीं है.....
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अच्छा सुनो तुम मुझे किस करना बंद करो चलो पेड़ के पास बैठते हैं जहां कोई हमें देख न ले......और ये बताओ तुम इतने झूठ कैसे बोल सकते हो कि तुम कल उस सांवली लड़की के साथ पार्क में बैठे थे....अरे वो मिल गई थी। और तुमने क्या क्या छुपाया।
तुम तो बहुत झूठे हो..., उस लड़की ने उस पर गुस्सा करते हुए कहा।
तभी उस लड़की के पास उसके पिताजी का कॉल आया, बेटा तुम कहाँ हो
मैं....पापा अभी मार्किट आयी हूं, थोड़ी देर में बात करती हूं
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बीयर पीने में क्या है, दारू तो पहाड़ों में जहां बर्फ पड़ती है वहां पीने में आनंद है, और तो छोड़ो कसौल चलेंगे वहां एकाध कश तो ले ही सकते हैं। वैसे भी इसी का आनंद है, इतना वह कह ही रहा था तभी उसने देखा
पास में बैठा एक रिक्शा वाला पीकर बड़बड़ा रहा था। उसने कहा अरे ये पियक्कड़ लोग इतने घटिया लोग हैं, दारू पीकर बड़बड़ा रहा है, काफी तेज दुर्गंध आ रही है। ऐसे लोगों को पकड़ के पीटो

#प्रभात

इसमें कुछ भी साहित्य नहीं है। सच सीधे आप तक, इसलिए आपका पसंद नापसंद करना मेरे लिए जरूरी नहीं।