Friday, 23 March 2018

तो प्रिये तुम आना बस


बांसुरी की ध्वनि में
जब झंकार उठे मन से
वीणा की धार में सारी
जब श्रृंगार सजे मन से
तो प्रिये तुम आना बस
ठहर जाए जमाना बस
मिलन की अप्रतिम छवि
दौड़ उठे गईया तब
आंगन में फूल खिले
हवा छू जाए हृदय जब
मौन हों नदियां सारी
चाँद तुम दिखो तब
तो प्रिये तुम आना बस
देखना तुम तिरछी नजरों से
मुस्काना तुम झुके अधरों से
तितलियां उड़ जाएं जब
भौरें मचल जाएं तब
जुगनुओं के आने से पहले
तुम चली आना
गीत कोई गुनगुनाना

कुछ भी


सुना है तुम पत्रकार बन गए, परन्तु तुम्हें प्रेम के सिवा कुछ भी लिखते नहीं देखा।

हर वक्त ऐसे देखते हो जैसे दीपक की लौ बुझने वाली हो फिर भी पतंगे की तरह तुम गोलाई में घूमते रहते हो। क्यों इतना प्यार करते हो उस लौ से जो तुम्हें प्यार नहीं करती बल्कि तुम्हारे प्यार का इस्तेमाल करती है और तुम उस अंधेर नगरी में रोशनी में नहाए चकमका जाते हो।
रागिनी ने कहा तो बहुत कुछ लेकिन उसका मतलब ये कतई नहीं था कि तुम लिखो न..बल्कि उसका मतलब था कि जिंदगी में प्रेम की राजनीति भी समझ लो तो अच्छा होगा।
मैंने कहा रागिनी प्रेम खुद अपने आप में रहस्य है और एक ऐसा रहस्य जो बिना कुछ बोले भी इतना सब कुछ कह देता है कि आज तक राजनीति क्या, विज्ञान क्या, समाज क्या....हर एक चीज़ उसमें मसरूफ रहता है। अब तुम्हीं बताओ तुम क्या किसी रहस्य से कम हो? तुम मेरी जिंदगी में उस आयत की तरह हो जिसकी लंबाई या चौड़ाई कोई आंख तो पढ़ ही नहीं सकती देखने की बात छोड़ो। तुम आसमान की तरह फैली हुई हो, सागर की तरह बहती हो और रेगिस्तान की तरह झिलमिलाती हो और इतना ही नहीं तुम जीवन की हर एक मोड़ पर घड़ी की हर टिक-टिक पर नई परिभाषाएं बुनती हो।
तुम जीवन की हताशा हो, निराशा हो और हौसलों की बुनियाद भी तो। और जीवन की बचपना और हर एक मोड़ की गाथा भी तो।
मैंने जब ये सब कहा तो रागिनी बोली नहीं लेकिन आज लिखने के लिये मेरे पास इसलिये असीमित पेज पड़े हैं क्योंकि उसकी खामोशी को मैंने समझा था। अगर वह बोल देती तो मैं उन्हीं चंद शब्दों में सिमट जाता।



नहीं चाहता

अब मैं किसी से दिल लगाना नहीं चाहता
अपने दुखों को फिर से बताना नहीं चाहता
किसी की याद में डुबकियां अब क्यों लगाऊं
गहराई में जाकर जब मुझे उबरना नहीं आता


मासूम दिल से कैसे पूछूँ सवाल आंखों की
बिना कुछ कहे आंसू बहाना अब नहीं आता
सिसकियां खूब ली हैं आईने के सामने मैंने
फिर से अब तस्वीर सामने लाना नहीं चाहता

किसी की आहट में छिपकर भी क्या करूँगा
बंद आंखों से अक्स अब देखना नहीं आता
बारिश में भींगने से कांप जाती है रूह भी अब
सितारों के साथ मुलाकातें करना नहीं चाहता

संवेदना शून्य आंखों में अब आंसू कैसे आएं
किसी की बात करने में रस-बखान नहीं आता
जिंदगी की कहानी लिखकर शायद चैन मिले
क्योंकि जिंदगी बंद किताब होनहीं चाहता
-प्रभात 

बस यूँ ही ...


एक रास्ता आज भी है बाकी
डर रहा हूँ, अकेले चलने से??
आंसुओं की चादर पर सोने से??
किताबों में धुँधले शब्द पाने से
बेचनियों में यादों को खोने से???
सुनों,
चाहता हूं मदिरा, पिला दे साकी 
एक रास्ता आज भी है बाकी......
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मत रोको छटपटाहट को, हंसने वालों को अभी हँस लेने दो
कल उन्हें अपनी हँसी भी याद आएगी और तुम्हारा दर्द भी।
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वक्त की करवट ने जमाना बदल दिया 
रात की नजरों ने कैसे मुँह फेर लिया
एक हकीकत ही है अब तुम्हारे सामने
बहुत मुश्किल है मनाना खुद को
कि तुम नहीं हो मेरे सामने............
...
वो चाँद का दीदार करें तो कैसे
जिंदगी को शायद मंजूर नहीं था
हौसलों को ताकत देने के सिवा
सफर में खुद को तनहा करें तो कैसे
...
अक्सर बेजुबान होते देखा है खुद को
किसी की परछाई भर सामने आ जाये तो
बस हवा की सरसराहट खींच ले जाती है
बहुत दूर .....इतना दूर कि..
शायद खो जाता हूँ तुम्हारा हाथ पकड़े भी
...
अक्स भी क्या कमाल की है खुदा
जिसकी तस्वीर लगाता हूँ दीवाल पर
वो नजर से ताल्लुकात ही नहीं रखते
एक इमेज है जिसे मैं डिलीट कर देता हूँ
लेकिन ये वायरस है जो दिल से नहीं जाता


-प्रभात