Thursday, 7 December 2017

मेरी दोस्त

-google
मेरी दोस्त मैंने तुम्हें एक ही खत लिखा था
पता है दोस्त, वो मेरा अंतिम खत था
मुझे पता नहीं क्यों यही लगा था, यह अंतिम ही है

लेकिन, सच को स्वीकारना मुश्किल ही था
हां, न चाहते हुए भी लेकिन, मैंने बताया था
कि यह तुम्हारे नाम मेरा पहला और अंतिम खत है
दोस्त मैं कवि नहीं हूं जो केवल कल्पना करूं
मेरे ख्याल और मेरे शब्द सब तुम्हारी देन हैं
और लोग इसमें कवित्व के गुण ढूंढ लेते हैं


मेरी दोस्त अगर मैं कवि होता
तो मैं तुम्हारी होठों को मधु प्रेम बता रहा होता
और तुम्हारे चेहरे की चाँद से तुलना कर रहा होता
तुम्हारे घुंघराले बालों को मैं मोर मुकुट की
तरह शोभायमान कहता, और इतना ही नहीं
तुम्हारे आंसुओं को श्रृंगार बता रहा होता


लेकिन, नहीं दोस्तमैं वही कहूंगा जो तुम थी
मैं वास्तविक ही सुनाना पसंद करता हूं
और सबसे बड़ी बात तुम खुद यही सुनना पसन्द करती थी


हां दोस्त, तुम्हारे केश हों या होठों का प्रेम
वो मेरे लिए था और निश्चित रूप से वह ऐसा ही था
मैंने कभी अतिशयोक्ति नहीं बोला मगर
सच बताऊं तुम्हारी हाला वाले होठ भी मुझे 
अब भी बहुत मीठा अनुभव कराते हैं।
जिसे तुम सोचती कि मुझे अच्छा नहीं लगेगा
या तुम कहती कि आज तुम अच्छी नहीं दिख रही
तुम फ़ोटो नहीं खींचा सकती
उस दिन भी मुझे वैसे ही लगती थी जैसे हर दिन

इतना आकर्षक की आज तक भूल नहीं सका हूँ


मैं चाँद को उतना नहीं याद करता,
मोर मुकुट देखने की लालसा नहीं हुई कभी
लेकिन मेरी दोस्त, तुम्हें देखे बिना एक कसक सी रहती है
मैं अपने आपको उतना ही खुशकिस्मत मानता हूं
जितना कि उस रात को 
जब हम एक ही चादर तले हाथ पकड़े मुस्कुरा रहे थे
जितना कि उस रात को 
जब तुम मुझे भेजने सड़क तक आई थी
उसके बाद तुम मेरी तरफ वैसे ही देख रही थी, जैसे मैं


जितना की वो दिन 
जब मेरे बोलने से पहले किसी को 
बता देती थे, कि ये ऐसा नहीं है या ऐसा है
तुम अपना हक जताती और
बिना कुछ कहे मेरे कंधों पर अपना सिर रख देती थी


मेरी दोस्त, तुम्हारा शुक्रिया कहूँ तो अच्छा न होगा
क्योंकि शुक्रिया कहना तो हमने दोस्ती में छोड़ ही दिया था
शुक्रिया के बदले तुम्हारा जो स्नेह मिलता था
बहुत सुकून मिलता था।


हां, मेरी दोस्त, जो शरारतें थीं वो मेरे लिए तुम्हारा स्नेह था
पानी की बूंदों से भिंगोना, या तुम्हारा घर के दरवाजे पर आकर खड़े हो जाना
या कहूँ तुम्हारा मुझे कभी भी जगा देना 
और केवल मेरी तरफ एक बार देखना
मेरे सौ बार शुक्रिया करने से कहीं अधिक शुक्रिया के कायल हैं


वो रातें जिसमें तुम और हम एक दूसरे को अंधेरे में भी देख लेते थे।
वो मुस्कुराहटें जो लबों पर एक दूसरे की बिना चुम्बन किये ही जाती
वो रातें जिसे तुम कहती कि मैंने कुछ गलत बोल दिया था
मुझे वो गलत भी सही लगता था
वो जगह जिस पर हम बैठे घंटो 
एक दूसरे को ढांढस बधाते थे


वो सब कुछ याद है न, मैंने सिर्फ इसलिए लिखा मेरी दोस्त
कहीं ऐसा न हो कि इन एहसासों को दबाएं ही मैं विदा जाऊं
मेरी दोस्त मैं छोड़ना चाहता हूं कुछ यादें तुम्हारे साथ भी
मेरी दोस्त, जानता हूँ, मैंने रुलाया है
तो खुद भी रोया ही हूँ
हां दोस्त जहाँ तुम रो रहे थे, वो दृश्य मेरी आँखें भिंगोने के लिए काफी है
कहां तक मैं कहूँ कि हवा तुम साक्षी थे
या कहूँ धूल तुम साक्षी थे....हां सभी थे।
तुम्हारी झल्लाहटें या तुम्हारे माथे पर चिंता की लकीरें,
मेरे लिए भी चिंता के विषय बनते
तुम्हारा डांटना कहूँ या 
वही मेरी जिंदगी और मकसद थे

मेरी दोस्त, तुम्हें और तुम्हें लिखकर मैंने गलतियां की
होंगी
लेकिन मैंने वहां वही लिखा जैसा सोचता हूँ, जैसा देखता हूँ
और इसलिए लिखा कि क्योंकि मेरी दोस्त तुम पढ़ो
कोई और नहीं क्योंकि दोस्त दूरियां हममे हैं
और असर दूसरे पर नहीं हम पर पड़ता है
उस वक्त जब हम बहुत दूर हों,
इतना दूर कि कभी मिल भी न सके
इसलिए लिखा..........
फिर शायद तुम एक बार सोचो कि मैं क्यों लिख रहा था.....


लेकिन, हां फिर भी तुम मत पढ़ना, क्योंकि ये प्यार 
कोई पढ़ने की चीज नहीं है, ये बस फील करने की चीज है
दोस्त तुमने जो सिखाया, वो ये कि खाना और उसके बाद दूध भी पीना है
हां दोस्त तुमने ये भी सिखा दिया कि ब्रश करना है
दोस्त तुमने मेरी माँ की तरह मुझे साबुन से नहाना भी बता दिया था
मेरी दोस्त ये कहने का अधिकार है न?
दोस्त मैं नहीं रहूंगा जब तो मेरी कविताएं तुम्हारे
जीने की वजह होंगी
तुम्हें टूटने से बचाएगी
हां दोस्त तुमसे यह भी कहेगी कि उस पल में लौट चलो
लेकिन, दर्द होगा बस इस बात की, कि नहीं समय कभी पीछे नहीं जाता


लेकिन, खुशी भी होगी कि कोई दोस्त तो था सचमुच
हां मुझे तो खुशी ही है इसलिए दोस्त मैं चलता हूँ
आज नहीं रोऊँगा बस इतना ही कहूंगा
मेरी दोस्त मेरे इस जीवन में तुम्हारी जगह कोई और नहीं ले सकता


हां दोस्त..... तुमसे विदा लेता हूँ
लेकिन, एक सवाल के साथ, आखिर तुम बिना कुछ मुझसे कहे कैसे रह लेती हो?
मेरी दोस्त,
जो बातें तुम बता देती थी मुझे जो किसी और को नहीं बताती थी
वो आखिर किससे कहोगी…?



मां-अम्मी

*मां-अम्मी*
मेरी माँ मेरी जिंदगी
मेरी माँ मेरी खुशी

मेरी माँ मेरा वो सब कुछ
जिसकी वजह से सांसे चल रही हैं
माँ तुम्हें अम्मी बुलाऊँ
या मेरी अम्मी तुम्हें केवल स्मरण कर लूं
मिलती है मन को तसल्ली
जीवन भर मांगा ही है मां
लेकिन इसके बाद भी
मेरी अम्मी बिन मांगे 
वो सब कुछ दे देती हो
जिसे कोई आज तक नहीं दे सका
माँ दुलार देना, गोदी का सहारा
हाथों से सहलाना, पुचकारना
मां तुमने आँचल से छिपाया, क्या नहीं बनाया
मेरे लिए कपड़े से लेकर कलम तक पकड़ाया 
माँ मन्नतें मांगी मेरे लिए, मां खुद बिन खाए
मुझे गरम रोटी ही खिलाई
अम्मी खुद के लिए जो नहीं कर सकी
अपने हिस्से की हर वो चीज मुझे दिलाई
मां तुमने जीवन दिया, पाला पोशा 
इसके बाद मां अब केवल मुझे तरसती हो
देखने को, इसलिए नहीं कि मां तुम अकेली हो 
इसलिए कि मैं कैसा हूँ
ये नहीं कहती मां कि मुझे जरूरत है तुम्हारी
ये नहीं कहती मां कि तुम मेरे लिए कुछ करो
मां मैंने हक जताया बिना हक के
मगर अम्मी तुमने कभी नहीं हक जताया 
कि तुम कोई आदेश दे सको
मां तुम निवेदन करती हो
इसलिए मां हो
लेकिन मां तुम एक पत्नी भी हो
मां तुम एक बहन भी हो
मां तुम एक बहू भी हो
मां तुम एक बेटी भी हो
मां तुम वो सब कुछ हो जिसकी वजह से मैं हूँ
अम्मी तुम्हारी चिंता की लकीरें बेशक मैं ना समझ पाऊँ
मगर मां तुम हमेशा ही मेरी चिंता की ही लकीर नहीं
मेरे भाग्य और मेरे भविष्य को भी पढ़ लेती हो
मां तुम मेरी अम्मी हो
मेरी माँ मेरी जिंदगी.....

-प्रभात


मैंने जीवन को देखा

मैंने जीवन को देखा है खूब गहरी खाई से
बैठा था आसमान पर, जमीनी सच्चाई से
मैं पृथक नहीं हूं क्षण भर, बाधाओं के आने से
अपने दिल की गलियों में पत्थर मारे जाने से
टूटा और हारा बहुत हूँ, जीता हूँ तो खुद से
कान के तार जुड़े हुए हैं डर लगता है कहने से
वक्त मिलता है सोच समझ कर कुछ कहने को
याद बनाकर अधूरे सपनों को फिर से जीने को
आंखों में आंसू आते है, मन हल्का हो जाता है
नहीं पता, जाते हैं तो फिर अचानक क्यों आते हैं
वो अलग थलग होकर भी नहीं चैन से रह पाते हैं
जिनकी वजह से आंसू आते उन्हें भी क्यों आते हैं
बुलबुला बन कर खो जाऊँगा मैं तुझमें होने से
तुमने छूकर देखा है दिल को बहुत करीब से
-प्रभात

मेरा भ्रम था

मेरा भ्रम था, मेरा सच बोलना
मेरा भ्रम था, कुछ अपना होना
मेरा भ्रम है अब खुद का होना
मेरा भ्रम है तुम्हारा होना
मेरा भ्रम है फिर भी है जीना
बिन भ्रम कुछ नहीं है पाना
बस चलते जाना, चलते जाना.....
ठीक वैसे जैसे कस्तूरी मृग
ठीक वैसे जैसे मृग तृष्णा
ठीक वैसे जैसे चाँद में जानवर
ठीक वैसे जैसे जल में रोशनी
ठीक वैसे जैसे परछाईं.....
देखते रहो धरती से आकाश को
देखते रहो समुद्र से बादल को
देखते रहो विश्वास से भगवान को
देखते रहो इंसान को गुमान से
धूल से दीया और दीया से बाती को
दीया से धूल को और धूल से माटी को.....
चाहो तो जिंदगी को मौत से निकालो
चाहो तो जिंदगी से मौत निकालो
विश्वास है तो भूत है, भूत है तो भविष्य है
ईश है, देव है, अरूप है तो रूप है
सत्य है तो झूठ है, भ्रम का प्रमाण है
प्रमाण है, क्या है? कुछ भी नहीं......
भ्रम है या ये भी नहीं?????????
-प्रभात