Sunday, 9 February 2014

हो रहा वसंत आगमन!

 हो रहा वसंत आगमन
हो रहा प्यारा गगन
आम्र की डालिया बौरों को दिखा रही है 
सरसों के खेत फूलों से लहलहा रही है 
बेल के फूलों से बढ़ा पत्तों का शान,
लेकर सुगंध बह रहा पवन
हो रहा वसंत आगमन
हो रहा प्यारा गगन

सतरंगी किरणें फूलों को सजा रही हैं
इधर उधर चिड़ियाँ चहचहा रही हैं
हर दिशाओं को देखने लगा ये मन,
हरियाली छाई है बन बन
हो रहा वसंत आगमन
हो रहा प्यारा गगनl

कुछ कोपलें छुपती दिख रही हैं
पर्ण पल्लव सोकर अब उठ रही है
लताओं में मानों हो रहा संचार,
हो रहा वसंती बागवान
हो रहा वसंत आगमन
हो रहा प्यारा गगनl

सजी रंगी बगियाँ अब महका रही है
पतझड़ को ये अब भुला रही है
भ्रमर हो रहा अब मगन,
मंज़िल पाने चल दिया मन
हो रहा वसंत आगमन
हो रहा प्यारा गगनl

                            -प्रभात 

Saturday, 11 January 2014

तो रंज है मेरा उनसे रात ख्वाबों में खो जाने का.....

तसव्वुर(कल्पना) है मेरा तुम्हें पाने का
न पाकर भी हर कदम मुस्कुराने का
ये चाहत है उनका अगर बिछुड़ जाने का  
तो मुझे हसरत नहीं उनसे न मिल पाने का

छुपा नहीं है किसी से अक्स उनका
मेरी क्या खता उन्हें भुला न पाने का
मकबूल उन्हें अगर न हो मेरे वास्ता का
तो रंज है मेरा उनसे रात ख्वाबों में खो जाने का.....

                                               "प्रभात"

Tuesday, 31 December 2013

गरीबी:- माँ, मैं और मेरी कहानी


     आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं!!

      गरीबी:- माँ, मैं और मेरी कहानी 

रोटी नहीं है खिलाने को खाने की  मांग कब करूँ
अशिक्षा बेरोजगारी के आशियानें में नए भारत कि बात कब करूं
छुपती हुई देह और दुशाला में काप रही हूँ मैं
कोई चाहनें वाले कि खातिर जग रही हूँ  मैं
संस्कार में है मर जाना पर मांग नही
ऐसे ढलते सूरज की छाओं में छुप रही हूँ मैं
गरीबी की जंजीरों से निकल पाने की बात कब करूँ?

उसकी हकीकत को समझनें लगा हूँ मैं
दर्द और चीखने कि अस्रु में झूलने लगा हूँ मैं
बच्चों के बदन की पीड़ा को समझना आसान नहीं
पर उसकी माँ की आवाज पर चीखना लगा हूँ मैं 
असमानता की खायी में छुपने लगा हूँ मैं 
गरीबी की जंजीरों से निकल पाने की बात कब करूँ?

कहानियों सी लगती है पेपरों में उन्हें पढ़ना
कविताओं में देखकर भूल जाता हूँ मैं 
असली गरीबी तो सड़कों पर ही दिख जाती है
ताजमहल की सफेद दीवारों में नहीं
सितारों की दुनिया में फिल्मों में खोने लगा हूँ मैं
गरीबी की जंजीरों से निकल पाने की बात कब करूँ?

बीच सड़कों पर खेलते देखता हूँ बच्चों को मैं
कूड़े के ढेर में तिनका ढूंढ कर चुगते वे
दो रोटी के टुकड़े में हँसता खेलता देख उन्हें
मैं सहम सा जाता हूँ हर बार भूल जाता हूँ मैं 
सियासत की जंजीरों से निकल जानें की बात कब करूँ?
गरीबी की जंजीरों से निकल पाने की बात कब करूँ??

        -प्रभात 
  विनम्र आभार  

प्रेम और सहयोग


               आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं!!

          
            

                       प्रेम और सहयोग

              प्रेम

तुम उम्मीद हो तुम ही मेरी जीत हो 
बचता कुछ नहीं सिवा तुम मेरे प्रीत हो
बंधती है आशाएं मंजर के गुथने से
टूटती है निराशाएं तबस्सुम की प्रीत से
करीब देखता हूँ बादलों के उमड़ने में
लगता भय सा है पर विश्वास ही हो
बरस के आते जब मेरे पास हो
तुम ही क्या एक हो जो मेरे साथ हो

       सहयोग

यूँ तो चादरों सी लिपटी हो पर्वतों के गोद में
निहारने को चल रही हो अप्सराओ के संग में
सहयोग के रास्ते में रात बंधती दिख रही उजाले में
ऊंची चोटियों से देखता हूँ सुबह का होना जब मैं
खिल जाता हूँ प्रकाश में उस अनुराग के साये में





               
प्रभात 
विनम्र आभार