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Sunday, 22 March 2015

वह एक दृश्य सूर्यास्त का

वह एक दृश्य सूर्यास्त का
एकाकी हो देख रहा उन्हें सम्मुख
लगता है सब को वो जा रहा है 
किन्तु मुझे इससे विपरीत
वह दूसरा क्षिति दिखाई दे रहा है 
चित्र-गूगल से साभार 
वहां जीवन कैसा होगा?
एक सवाल है 
वो तो रंगों का सम्मिलन है,
सजीव प्रतिबिम्ब में श्रीन्गारित
परन्तु अतिशयोक्ति नहीं, सचमुच!
पर्वत, नद संगम सब प्रतीत हो रहा है 
निहारकर हुआ मैं अनुरागी 
आकाश की थाली में प्रछन्न,
मेघ जो घुमड़ता दिखाई दे रहा है
अब एक वृहत समंदर से घिरा है
मेघ संयोजन शीतल हलचलों के साथ
विशाल पर्वतों के शीर्षोंमुख
श्वेत बर्फ की चादरों में छिपा जा रहा है 
चित्र-गूगल से साभार
वहां और क्या होगा?
दूसरा सवाल है 
वह तो किसी स्वर्ग से कम न होगा 
अब सूरज, चंदा तारे आँचल में है छितिज के
लुका छिपी में रहस्य कोई जरुर रहा है 
अब नेत्र भी विवश हो गयी,  
ये समां भी बंध कर बिछुड़ रहा,
अचानक काले गगन के सम्मुख
शून्य में दीपोत्सव देखकर
अकेले ही ये मन कुछ कह रहा है 

केवल मैं ही हूँ?
यह ठहरा सवाल है 
कितुं नहीं! यह सो जाने की रात है 
आँगन में अंगड़ाई लेते बाल समूह से लेकर,
माँ और मामा तक बंधा,
संयक्त परिवार साथ दे रहा है 
चंदा मामा की रट में,
बच्चे की माँ की साथ सम्मोहित
मुसकराहट के वशीभूत होकर,
मेरा विशाल ह्रदय चलने को बाध्य हो रहा है 
और इन्तजार कर दूसरी संध्या पर
मेरा मन पहले सवाल पर आ रहा है 
-"प्रभात"