सूरज तुम्हारी लाली, आँगन में जो आती है
मेरे बचपन के दिनों को बहुत याद कराती है।
कोयल की कूं –कूं के साथ सुबह तेरा होना,
फूलों के गुच्छों का, सूरज तेरी ओर होना;
उठ कर बैठे देर तक तुम्हारी याद दिलाती है ।
पानी भर कर इंतजार करती, मेरी माँ प्यार से
बार बार दूर भागता, फिर पकड़ती और मुस्कुराती;
मेरे लिए पहले ही चटाई लगाती थी, याद से
सरसों के तेल से मालिश करना और
गोद में होने का सुन्दर अहसास कराती हैं ।
मेरे बचपन के दिनों को बहुत याद कराती है।
शाम की चर्चा पर बैठे अलाव के पास,
खेलते हुए और कहानियों पर हँसते हुए;
अब भी दादी का बनाया पकवान खाकर,
रजाई में सोये दादा के साथ; दादी की याद आतीं है।
बन्दर की टोपी पहनानें, चांदनी रात बुलाती हैं।
ओंस भरी सुबह, रातों का सुन्दर अहसास कराती है।
-"प्रभात"
