मैंने कुछ नया नहीं
लिखा । बस सोचा आजकल की घटनाओं का
परिचय आपसे थोड़ा नयें तरीके से कराऊँ ।इन समस्याओं से निजात
पाने के लिए आपमें जिस चीज की कमी हो उसे पूरा कर दूँ । इसी उम्मीद से मैं अपने द्वारा लिखी कुछ पंक्तिया यहाँ आपको तहे दिल
से समर्पित करता हूँ ।
होकर निडर, काम लगन
से फिर वही करना होगा।
बुझते दिए में बाती वही, पर तेल नया भरना होगा।
राग किसी का मत लेना स्वयं सुर नया बना लेना ।
भूली-बिसरी राहों पर ज्ञान के प्रकाश जला लेना ।
होकर आत्मनिर्भर तुम्हें ही सीढ़ी चढ़ना होगा ।
प्रतियोगिता के दौर में नवाचार ही करना होगा ।
लोकतंत्र की नैया पर कितने भी लोग सवार रहे ।
विपरीत दिशाओं वालों की एक ही दुआर रहे ।
सत्य-असत्य का परख तो तुम्हे ही करना होगा ।
लेकर नाव किसी को पहले आगे बढ़ना होगा ।
जिस गाँव में सूनापन हो, आवाज लगा देना ।
अंधेर नगरी में चीत्कार से सभी को जगा देना ।
बन कर मंजिल स्वयं कहीं आना होगा ।
आगे कदम बढ़ाकर पीछे न हटना होगा ।
संस्कृति धरोहर कोई किसी से अनजाने नहीं ।
व्यक्ति की भाषा शैली पर ये सब बंटते नहीं ।
परख - परख कर जवाब हमें देना होगा ।
अन्याय की जीत पर भी न्याय लेना होगा ।
हार से उम्मीद को कहीं पर विचलित न होने दें ।
तृण-भूमि पर भी कोई फसल नया, चाहे होने दें ।
नाम अपना तो जीवन भर महकाना होगा ।
तराश कर पत्थर से ही मूरत बनाना होगा ।
-"प्रभात"
