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Saturday, 29 November 2014

ना रही बुलबुल और ना ही उसका तराना है।

आँधियों के आने से वादियों का जाना है
ना रही बुलबुल और ना ही उसका तराना है

कितने खामोश हैं बैठे जंगल के राजा शेर
अब उनकी ही राहों में आदमी का जाना है

रात्रि बन चुका दिन और दिन अँधियारा सा
ये घड़ी सर्द-गर्म रात की बिन मौसम आना हैं

पर्वतों में राह बना कर सो रहे हजारों राही
ऊंचे वृक्षों की कटाई मौत का ही बहाना है

समुद्री लहरे सिमटी थी ज्वार और भाटा तक
अब ये कैसा सुनामी व तूफानी का जमाना है

हदें पार करती हैं वो ज्वालामुखी की ज्वाला 
जहाँ पर जीवन का राख में बदल जाना है
                                                   -प्रभात