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ये बारिश रोक दो सिवान का
मैं प्यासा ही रह
लूँगा
मेरी अमानत है इस माह का
खूब चाहा है जिसे पा
लूँगा
कितनी ख्वाहिशें थी मेरी, हरियाली भरी एक शाम
में
कुदरती करिश्मा था तब
बिन तूफानी राह में
अब ये चक्रवाती बाजारों का रुख मोड़ दो...
बेखबर था नहीं तब मैं तुम्हारे परिणाम से
मगर हैरानी है जो अब आ गए
कभी देखो रंग मेरे
चेहरे का
अब इसे खिल जाने दो...
-"प्रभात"
