सुबह-सांझ कोई शिकायत न हो
कोई न संवाद न ही कोई कारण हो
ऐसा तभी हो सकता है
जब उन्हें मेरे प्रेम का मालूम न हो
एक बात ही केवल इशारों में हो
लिखा हुआ खत व्यापारों में हो
कागज में हो मगर उसके जहाजों में हो
ऐसा तभी हो सकता है
जब मेरे प्रेम का उन्हें मालूम न हो
अविश्वासों के बीच एक विश्वास हो
हजारों में केवल एक अहसास हो
सपनों की उड़ान लिए ही कोई रात हो
कोशिश मेरी नाकामयाब हो
ऐसा नहीं हो सकता
ऐसा तभी हो सकता है
जब मेरे प्रेम का उन्हें मालूम न हो
-प्रभात
