Saturday, 18 April 2015

ऐसा तभी हो सकता है

खामोश अक्स का उन्हें मालूम न हो
सुबह-सांझ कोई शिकायत न हो
कोई न संवाद न ही कोई कारण हो
ऐसा तभी हो सकता है
जब उन्हें मेरे प्रेम का मालूम न हो

एक बात ही केवल इशारों में हो
लिखा हुआ खत व्यापारों में हो  
कागज में हो मगर उसके जहाजों में हो
ऐसा तभी हो सकता है
जब मेरे प्रेम का उन्हें मालूम न हो

अविश्वासों के बीच एक विश्वास हो
हजारों में केवल एक अहसास हो
सपनों की उड़ान लिए ही कोई रात हो
कोशिश मेरी नाकामयाब हो
ऐसा नहीं हो सकता
ऐसा तभी हो सकता है
जब मेरे प्रेम का उन्हें मालूम न हो
-प्रभात 

14 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (19-04-2015) को "अपनापन ही रिक्‍तता को भरता है" (चर्चा - 1950) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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    1. शुक्रिया ...........आभार सहित!

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  2. उम्दा रचना है |

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    1. हम आपके आभारी है ...

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  3. सुन्दर रचना

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  4. सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति..
    शुभकामनाएँ।
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

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    1. हम आपके आभारी है ...

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  5. कता बात है .. आजकल प्रेम है तो इज़हार कर देना चाहिए जल्दी से ...

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    1. जी सही ही कहा है आपने .....आपका आभार!

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  6. सुन्दर प्रस्तुति...

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