अब प्यार नहीं करना ।
बहकर भावों की धारा में,
कवि बैरागी नहीं बनना
चाहत को क्यों लिखना,
देवदास ही क्यों बनना
अब प्यार नहीं करना ।
इक मूर्त बना बस पूजना,
क्यों उसे हासिल करना
दीपक की लौ के आगे,
पतंगा बन क्यों जलना
अब प्यार नहीं करना ।
अजीब सी ख्वाहिश ले,
सोते -सोते क्यों जागना
और सपनों में पीछा करते,
गले फिर से क्यों मिलना
अब प्यार नहीं करना ।
शब्दों को संजीदा से लेकर,
सोंचेंगे क्यों दिल से अब
बातों-बातों में लड़ना और
हँसते-हँसते क्यों रोना,
अब प्यार नहीं करना ।
इश्क का प्रस्ताव ले क्यों,
लव यू मन में बोलना
हृदय की गति बदलकर,
क्यों इजहार दिल की करना
अब प्यार नहीं करना । -प्रभात
