Tuesday, 1 June 2021

जब बहुत याद आती हो

 जब बहुत याद आती हो किसी की तो कुछ भी लिखा नहीं जाता

जब याद ही नहीं आती किसी की तो और भी नहीं लिखा जाता

हां, लेकिन उसे लिखना हो तब

साथ की जरूरत होती है उसकी, लेकिन तब जब उसका साथ ही नहीं होता



जब बीते पल बहुत दूर हों, लेकिन मन उन्हीं पलों में खो जाता हो

कुल मिलाकर न लिखने में भी सुकून नहीं, लिख लेने में भी सुकून नहीं

क्योंकि उसे पाने में भी सुकून नहीं और उसके चले जाने में भी सुकून नहीं

फिर लिखा जाता है उसके आने और जाने के फासलों के दरमियाँ

एक खूबसूरत सा प्रेम जो किया नहीं, जो मिला नहीं बस एहसास किया है...

#प्रभात

Prabhat

6-6-20

ठहरता है क्या समय?

ठहरता है क्या समय?

नहीं, लेकिन ठहरना चाहिये
ताकि मैं अपने पुराने पन्नों को उलट सकूं
और फिर जो कुछ हुआ उसे भूल जाऊं
कभी चाहूं तो सपनों को संजों लूं


और फिर समय को फिर अपने साथ चलाऊं
लेकिन समय का ठहराव तो जिंदगी में ठहराव है
जहां सांसे बंद होने लगती हैं
घुटन होने लग जाती है
सब कुछ पुरानी बातें याद आती हैं
लगता है कि अभी बस मैं रोक लूं सब कुछ
लेकिन सब कुछ नहीं होता
बंद हो जाता है फट से दरवाजा
और मैं, मैं नहीं रह जाता!
तस्वीर- गूगल इमेज साभार

मैं ही सोचता हूँ या आप भी?

 मैं ही सोचता हूँ या आप भी?

मैं सोचता हूँ कभी कभी। हां कभी-कभी क्योंकि लगता है कि मैं कभी कभी ही कुछ लिखता हूँ। हां तो मैं सोचता हूँ कि ये दौर क्या 1947 के पहले का है जब हमारे देश के लोग ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ समाचार पत्र में तरह तरह के उपाय करते  थे। वे अप्रत्यक्ष रूप से लिखते थे और ऐसा कुछ व्यंग्य के माध्यम से कह देते थे कि देश के लोगों को समझ आ जाता था कि किसकी बात हो रही है। वे हिंदी भाषी और क्षेत्रीय भाषाओं के महत्व को समझते थे इसलिए वे इन्हीं भाषाओं से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कुछ न कुछ प्रेस में लिख ही देते थे। कभी कविता लिखते तो कभी कहानी। ऐसा वे इसलिए करते थे क्योंकि अंग्रेज कभी भी उकसाने के आरोप में या दंगा भड़काने के आरोप में इन लेखक या पत्रकारों की गिरफ्तारी कर सकते थे।

आज सोचिए यह दौर है जब मैं अपनी अंगुली से यहां टाइप कर रहा होता हूँ तो दस बार सोचता हूँ कि कहीं किसी मेरे पोस्ट से सरकार को आपत्ति हो और सरकार विरोधी पोस्ट के एवज में मुझे देशद्रोही बता दे। कहीं उकसाने या भड़काने का आरोप न लगा दे। फिर भी मैं लिखता हूँ लेकिन सोचता जरूर हूँ कि अपनी तरफ से लिखने को लेकर हमेशा होशियार रहूं क्योंकि मैं देश का हित चाहता हूँ। सरकार का विरोध करने में मुझे दिलचस्पी नहीं है लेकिन आंखों देखी घटनाओं पर सवाल इन्हीं सरकारों से ही तो पूछा जाएगा? या फिर विपक्ष से। हां जब मैं सत्ता पक्ष के खिलाफ कुछ तर्क देते हुए लिखता हूँ तो मैं अपने अधिकारों का प्रयोग कर रहा होता हूँ उस अधिकार का जो कि नागरिक का अधिकार है। साथ ही अभिव्यक्ति और प्रेस की आजादी का जहां सवाल है। ऐसे में हमें विपक्ष के तौर पर देखने वाले लोग अगर कुछ कहते हैं तो मैं उनसे विपक्ष का आदमी होना स्वीकार करता हूँ लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं किसी पार्टी का हूँ। वामपंथी हूँ। या फिर समाजवादी हूँ। या फिर तथाकथित राष्ट्रवादी हूँ। या फिर तथाकथित देशभक्त और हिन्दूवादी हूँ। दरअसल मैं 'वादी' में कभी विश्वास रखता ही नहीं। मैं इन सबसे अलग एक इंसान हूँ और  इस देश का नागरिक भी। मैं नागरिकों के लिए सोच सकता हूँ। तो मैं हर आंखों से देखने वाली चीजों पर सवाल उठा सकता हूँ। मैं गांधारी भी नहीं हूँ कि मैं जानबूझकर पट्टी बांध लूं।

लेकिन आज हो क्या रहा है। हमारे यहां इस वक्त प्रेस की आजादी पर खतरा है? जानते हैं क्यों क्योंकि प्रेस अभी आजाद ही नहीं है। नागरिकों पर खतरा है क्योंकि हम जैसे नागरिक अभी इस मानसिकता से आजाद नहीं हुए कि सब कुछ जो देखें सीधे लिख दें और कह दें क्योंकि अगर ऐसा करेंगे तो कोई योगी मुझपर यूएपीए लगा देगा। कौन आजाद है? यही सवाल है तभी पोस्ट लिखा गया है। क्या हम वाकई आजाद हैं इनकी सोच से। हम तो अपने देश के लिए लिखते हैं पढ़ते हैं और मरना चाहते हैं लेकिन ये हमें उससे अलग करवाने में लगे रहते हैं। जब देखो तब सब प्रभाव में हो रहा है।

अगर मेनस्ट्रीम मीडिया खुद गुलामी चाहती है तो सोशल मीडिया यूजर्स गुलामी न चाहते हुए भी गुलाम बनना स्वीकार कर लेंगे।

अच्छा तो यही होगा कि हमें लिखने के लिए कुछ सोचना न पड़े। हम आपका विरोध कर रहे होते हैं इसका मतलब हम आपकी नीतियों का विरोध कर रहे होते हैं। उन नीतियों का जो संविधान के आड़े आती हुई दिखती हैं जहां बंटवारा दिखता है। जहां एकतरफा कुछ दिख रहा होता है। जहां आपकी वजह से नागरिकों के अधिकारों की रक्षा नहीं हो पाती।आप अगर सोचते हों कि आप किसी की आजादी के साथ खिलवाड़ करेंगे तो नहीं कर पाएंगे। सच बोलने वालों की कमी नहीं होगी कभी। इस देश की परंपरा रही है। बेहतर होगा कि लोकतंत्र के चार स्तंभ से जुड़े लोग अपने कर्तव्यों को सोच कर प्रगतिशील बनें।

आज न्यायपालिका से उम्मीद लगाए रहते हैं लोग लेकिन वे उतना सोच ही नहीं पाते। क्योंकि न्यायपालिका अपना भरोसा खोता दिख रहा है। संवेदनशील मुद्दों पर अपनी संवेदनाओं का प्रयोग ही नहीं कर पा रहा इसका कारण है इनमें आने वाले लोगों की चयन प्रक्रिया, वरना इतना बुरा हाल सुप्रीम कोर्ट का तो कभी नहीं हुआ। कि जनमानस कभी जब सालों में किसी एक मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के द्वारा किसी मामले के संज्ञान लेने की बात को सुनता है तो उस छोटी सी बात को लेकर मीडिया बड़ी खबरें बनाता है और आम लोग उसे कई बार पढ़ते हैं क्योंकि वह सोचता है कि आज कोर्ट ने अपना धर्म निभाया है सुप्रीम होने का तभी सरकार से सवाल किया है। इसी तरह मीडिया में जब पत्रकार कोई आकर एक बार किसी दूसरे लोकतंत्र के खंभे पर बैठे आदमी के ऊपर जमकर सवाल करता है तो उसके उस सवाल को लेकर करोड़ों लोग खुश होते हैं वीडियो वायरल हो जाती है। इसी तरह जब कोई सांसद के ऊपर या नेता के ऊपर किसी घटना को लेकर सवाल उठते हैं और वह अपनी जिम्मेदारी समझते हुए इस्तीफा दे देता है तो जनमानस में उसके प्रति इज्जत बढ़ती है। लेकिन ऐसे लोग कम होते हैं। यही कारण है कि प्रशासन में भी एसपी कलेक्टर बहुत होते हैं लेकिन चर्चा केवल कुछ की होती है।

मेरा इतना कहने का अभिप्राय बस इतना सा है कि इन्ही। चंद लोगों में से हम लोग भी आते हैं जो जिम्मेदारी समझते हुए सवाल करते हैं। खुद को जोखिम में डालकर। लेकिन जरूरी ये है कि चारों लोकतंत्र के स्तम्भ अपनी जिम्मेदारी समझें एक दूसरे पर सवाल करें और आगे बढ़ें ताकि कोई भी नागरिक जनता, आम लोग सीधे सवाल करें और उन्हें किसी चीज का डर न लगे।

#प्रभात

Prabhat

28 may, 2020

 

"न कुमकुम, न वो"

 "न कुमकुम, न वो"

हाथ को पकड़े हुए वह चलती जा रही थी। मुझे लगा कि कहीं मैं उसे कुछ ऐसा न कह दूं कि वो हाथ छोड़ दे, लेकिन मैं चाहता था कि वो हाथ तो छोड़ ही दे। क्योंकि, मुझे समाज की चिंता खाई जा रही थी। मैं कैसे अपने ऊपर टिप्पणी सुन सकता था या हंसी का कारण बन सकता था? लेकिन मैं चाहता था कि मैं उससे कैसे कहूँ कि वो बुरा न माने। मैं उसे काश समझा पाता कि मैं उसका हाथ अकेले में थामना चाहता हूँ, जहां वो और मैं रहूं... कोई और नहीं। मुझे इस बात का डर था कि कहीं वो न देख ले जिसे मैंने कभी कहा था कि "मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ"...लेकिन, उसने तो मना कर दिया था। और अब बातें भी नहीं होती थीं। लेकिन, मेरी चिंता यही थी कि मैं तो एक से ही प्यार करने की बात कह सकता हूँ। बेशक, करूं मैं दोनों से। मैं चाहता था कि मैं हाथ को थामे रहूं अगर मैं छोड़ भी दूं तो वो फिर पकड़ ले। क्योंकि मेरा हाथ तो किसी ने पकड़ा ही नहीं था। हां, मैंने पकड़ना चाहा तो उसका हाथ छूट ही गया था। मुझे याद है, कैसे मैं उसके साथ चलता जा रहा था।



अचानक से उसे ऐसा लगा कि मैं उसका हाथ छोड़ रहा हूँ। उसने कहा नहीं कुछ लेकिन, मेरे हाथ बढ़ाने पर अब वह दूर हो गई थी। बहुत दूर। मैंने देखा कि उसकी बस आ गयी है। और वह चढ़ रही है। मैंने बहुत बुलाया आवाज लगाई.....कुमकुम।

लेकिन, अब तो वह बहुत दूर हो गयी थी। आवाज मेरे पास ही लौट आई और मैं उसे समझा न सका।

अगले दिन मैंने उसे देखा जिससे, कभी बात भी नहीं हुई थी।जिसने मेरा कभी हाथ नहीं पकड़ा। न ही पकड़ना चाहा, लेकिन, आज वह रुकी। और मेरे सामने आ गयी। जैसे लगा कुछ बोलना चाहती हो। उसने कहा- क्या यही प्यार है? कल तो तुम उसका हाथ पकड़ कर चल रहे थे। मैंने सोचा कि उसे समझा लूं। मैंने कहा- हां चल रहा था लेकिन, वो मैंने नहीं, उसी ने पकड़ा था।

अभय तुम कैसे हो सब पता है, यह कहते हुए वह भी दूर चली गयी।

मैं बोल नहीं सका कि मैं उसे प्यार करता हूँ या फिर कुमकुम को। लेकिन, बात अजीब थी। आज तो मैं कुमकुम को हाथ पकड़ने की बात कहकर उसके करीब रहने की बात कर रहा था, कुमकुम को पता चले तो वो भी अब बस की तरह कभी नहीं लौटे। और इधर तो उसने कभी हाथ नहीं पकड़ा, लेकिन उसने ये साबित कर दिया और एहसास करा दिया कि मैं किसी को प्यार नहीं कर सकता।

मैं उदास होकर मुंह नीचे किये हुए चला जा रहा था और सोच रहा था कि क्या मैं उन दोनों से ही दिल की बात कह सकता हूँ? क्या मुझे सचमुच प्यार करने की बातों पर ही टिके रहना चाहिये था।

इसी वाद विवाद का परिणाम निकला कि आज मेरे पास न कुमकुम है न ही वो।

नोट- तथाकथित काल्पनिक कहानी लिखने का उद्देश्य कि खुद से यह सवाल करना कि रिश्तों को संजोने के लिए क्या कुछ कहने की भी जरूरत होती है?

#प्रभात

Prabhat

26 may, 2020