Sunday, 5 January 2020

खामोशियाँ भी हैं बहुत

मुस्कुरा रहा हूँ, खामोशियाँ भी हैं बहुत

अकेले बचपन में तन्हाइयां भी हैं बहुत
बताऊं क्या सच है तो तुम मुस्कुराना छोड़ दो
मेरा किरदार से लड़कर कुछ छिपाना छोड़ दो
मगर मेरी मन्नतों में खुदा शैतानियां हैं बहुत

-प्रभात

क्योंकि मन अभी सच्चा है


खाईयाँ जो दिलों की हैं उसे पाटती हैं पहाड़ों की खाई
संवादी कांटें और तीखी बहसों के घाव हैं जो उन्हें धुलती हैं फिजा की हवाएं
बहुत तेज चलती हैं जब पानी में तरंगों के इर्द गिर्द रेशमी किरणें
भरतीं आहें और झटके से चलती साँसों के बीच सुनते ही
पंछियों की चुलबुलाहट
बहुत सुकून देती हैं, किसी के न होने पर भी बहुत

और फिर इस तरह लगता है सब अच्छा है
इसलिए क्योंकि मन अभी सच्चा है

#प्रभात

मैं गुस्से में खुद को तूफान बना लेता हूँ


मैं गुस्से में खुद को तूफान बना लेता हूँ
खुद भी उड़ता हूँ तुम्हें भी उड़ा लेता हूँ

#प्रभात

मेरे गांव का पानी जहर बन गया है


मेरे गांव का पानी जहर बन गया है

आसमान का पानी कहर बन गया है
इंसान अब भी बड़े रुतबे में हैं
मानो जीवन अब अमर बन गया है!

#प्रभात