Saturday, 11 January 2014

तो रंज है मेरा उनसे रात ख्वाबों में खो जाने का.....

तसव्वुर(कल्पना) है मेरा तुम्हें पाने का
न पाकर भी हर कदम मुस्कुराने का
ये चाहत है उनका अगर बिछुड़ जाने का  
तो मुझे हसरत नहीं उनसे न मिल पाने का

छुपा नहीं है किसी से अक्स उनका
मेरी क्या खता उन्हें भुला न पाने का
मकबूल उन्हें अगर न हो मेरे वास्ता का
तो रंज है मेरा उनसे रात ख्वाबों में खो जाने का.....

                                               "प्रभात"

Tuesday, 31 December 2013

गरीबी:- माँ, मैं और मेरी कहानी


     आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं!!

      गरीबी:- माँ, मैं और मेरी कहानी 

रोटी नहीं है खिलाने को खाने की  मांग कब करूँ
अशिक्षा बेरोजगारी के आशियानें में नए भारत कि बात कब करूं
छुपती हुई देह और दुशाला में काप रही हूँ मैं
कोई चाहनें वाले कि खातिर जग रही हूँ  मैं
संस्कार में है मर जाना पर मांग नही
ऐसे ढलते सूरज की छाओं में छुप रही हूँ मैं
गरीबी की जंजीरों से निकल पाने की बात कब करूँ?

उसकी हकीकत को समझनें लगा हूँ मैं
दर्द और चीखने कि अस्रु में झूलने लगा हूँ मैं
बच्चों के बदन की पीड़ा को समझना आसान नहीं
पर उसकी माँ की आवाज पर चीखना लगा हूँ मैं 
असमानता की खायी में छुपने लगा हूँ मैं 
गरीबी की जंजीरों से निकल पाने की बात कब करूँ?

कहानियों सी लगती है पेपरों में उन्हें पढ़ना
कविताओं में देखकर भूल जाता हूँ मैं 
असली गरीबी तो सड़कों पर ही दिख जाती है
ताजमहल की सफेद दीवारों में नहीं
सितारों की दुनिया में फिल्मों में खोने लगा हूँ मैं
गरीबी की जंजीरों से निकल पाने की बात कब करूँ?

बीच सड़कों पर खेलते देखता हूँ बच्चों को मैं
कूड़े के ढेर में तिनका ढूंढ कर चुगते वे
दो रोटी के टुकड़े में हँसता खेलता देख उन्हें
मैं सहम सा जाता हूँ हर बार भूल जाता हूँ मैं 
सियासत की जंजीरों से निकल जानें की बात कब करूँ?
गरीबी की जंजीरों से निकल पाने की बात कब करूँ??

        -प्रभात 
  विनम्र आभार  

प्रेम और सहयोग


               आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं!!

          
            

                       प्रेम और सहयोग

              प्रेम

तुम उम्मीद हो तुम ही मेरी जीत हो 
बचता कुछ नहीं सिवा तुम मेरे प्रीत हो
बंधती है आशाएं मंजर के गुथने से
टूटती है निराशाएं तबस्सुम की प्रीत से
करीब देखता हूँ बादलों के उमड़ने में
लगता भय सा है पर विश्वास ही हो
बरस के आते जब मेरे पास हो
तुम ही क्या एक हो जो मेरे साथ हो

       सहयोग

यूँ तो चादरों सी लिपटी हो पर्वतों के गोद में
निहारने को चल रही हो अप्सराओ के संग में
सहयोग के रास्ते में रात बंधती दिख रही उजाले में
ऊंची चोटियों से देखता हूँ सुबह का होना जब मैं
खिल जाता हूँ प्रकाश में उस अनुराग के साये में





               
प्रभात 
विनम्र आभार

  

Monday, 16 September 2013

अब अधिकार न मुझे मार.…!

   अक्सर मैं जब कभी किसी रास्ते से गुजरता हूँ तो मेरी दृष्ट उस महिला की और घूम जाती है. वह कुपोषण के शिकार हुए बच्चों के साथ दिखती है, दो -चार साल के नन्हे बच्चे अपनी माँ की सहायता अपने नैतिक धर्म के रूप में करते दिखाई देते हैं और माँ सीमेंट भरे तसले लेकर जा रही होती है. ऐसे  समय मुझे गाँधी जी का जंतर ध्यान आने लगता है और सच में मुझे ऐसा लगता है कि गरीबी भारत की कहाँ पर खड़ी है. ३२. % केवल गरीबी ही नहीं है, यह ४०० मिलियन लोगों को भूखा सोने पर मजबूर करती है तो वहीँ इनकी पीढ़ी की शारीरिक छति की कल्पना नहीं की जा सकती।
संविधान जैसे ग्रन्थ ने वो सारे मौलिक अधिकार समाहित कर लिए है जब १९५० में इसकी उद्घोषणा हुई, इतने दिनों बाद भी इन अधिकारों के पीछे भागता गरीबी का यह मानुस अपने ऊपर शासन कर रहे लोगों का शिकार तो बनता ही है वह अपनी बची हुई अधिकारों को भी खो देता है. कहा जाता है मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है  लेकिन क्या सारे मनुष्य?? मुझे जीनें के अधिकार में तीन चीजें तो पहले से ही प्राप्त है-रोटी , कपड़ा, और मकान पर क्या सब को??? मेरे द्वारा  नीचे लिखे कुछ लाईनों पर गौर करें,तो आप जरुर इन अधिकारों से उसी जंतर की वेदना की तरह जुड़ पाएंगे।


                                             अधिकार मुझे मार 
                                           किस कोने से चलकर आया 
                                           पढ़ा लिखा किस काम आया 
                                          जो जायज है वही कहने आया 
                                             गलती हो तो ही मार 
                                             अधिकार  मुझे मार 

                   साक्षी मेरा कोई बनता नहीं 
                क्योंकि ऐसे कोने से कोई पलता नहीं  
                खुद नैतिक पैमाने पर चलता आया 
               परिवार भी इसी ओर ढलता आया 
                  दो रोटी का ही कर दो गुजार 
                    अधिकार मुझे मार 

  संघर्षों से बचता आया 
 कभी-कभी पिटता आया 
रूमाल से तन ढकता आया 
जब भी मैं सिक्कों से घिर आया 
मांग से ही तो हो जाती तकरार 
 अधिकार मुझे मार 

                  मेरी झोपडी है मेरा मंदिर 
               फैक्ट्री की जरुरत ने कर दी बंदिशे 
               फूस की छप्पर को उजाड़ने आये 
                बुलडोजर से ही पैर डगमगाए 
               अब झोपडी का भी रहा हक़दार 
                   अधिकार मुझे मार 

                                    देखना पड़ा कचहरी का क़स्बा कहीं 
                                     बाबू की फाईलों से घिर  गया वहीँ 
                                    तहसील में भी लाईन लगाने आया 
                                    यहाँ भी कोई सुनने सुनाने आया 
                                     छोटे जमीन से कर व्यापार 
                                       अधिकार मुझे मार 

                   दो बच्चों को लेकर फूटपाथ गयी 
                   गृहणी की जगह मजदूर बन गयी 
               मजदूरी करना तो दूर, हुआ इज्ज़त का बेइमान 
                 ठेलते हुए कर देते पीछे, आगे के जवान 
                  तनिक सन्देश का भी भूखा बना रहा 
                  आपदाओं से लगातार होती रही वार 
                      अधिकार मुझे मार 

जीनें के लिए बस करता रहा गुजारा 
 बच्चों को पाठ करता हर पखवारा 
ऐसे जीवन से जीना सीख ली इन्द्रियाँ 
 हार हार कर जीता बच्चों का दिल 
  बच्चों को छोड़ दे अब किसी पार 
   अब अधिकार मुझे मार.…