बुरे दिनों में सबसे करीब "मैं" होता है। अगर वह नहीं
तो अच्छे दिनों की कल्पना करना बेकार है.
![]() |
जा चली जा नदी की तरह दूर समुंदर में कहीं
जा चली जा सीते अग्नि परीक्षा में अंदर धरा में सही
जा चली जा मेरी परछाई से दूर किसी लोक चाहे
पुकारोगी नहीं दुबारा मुझे अपने आन बान शान के आगे
मगर राम का क्या वो अग्नि के बाहर तड़पे थे, तड़पे हैं और तड़पते ही रहेंगे
त्याग और मर्यादा के चिन्ह पर सवाल थे, सवाल हुए और आगे होते ही रहेंगे
समाज में बदनाम पहले भी होते, बाद भी हुए और आगे होते ही रहेंगे......
जा चली जा सीते अग्नि परीक्षा में अंदर धरा में सही
जा चली जा मेरी परछाई से दूर किसी लोक चाहे
पुकारोगी नहीं दुबारा मुझे अपने आन बान शान के आगे
मगर राम का क्या वो अग्नि के बाहर तड़पे थे, तड़पे हैं और तड़पते ही रहेंगे
त्याग और मर्यादा के चिन्ह पर सवाल थे, सवाल हुए और आगे होते ही रहेंगे
समाज में बदनाम पहले भी होते, बाद भी हुए और आगे होते ही रहेंगे......
-प्रभात
