Monday, 16 May 2016

मुझे है डर तुम्हे ही कोई न प्यार कर बैठे

तुम्हारे नाम पर कोई न अधिकार जमा बैठे
मुझे है डर तुम्हे ही कोई न प्यार कर बैठे
तुम्हारे ख्वाब में चाहे सारी जहाँ हो तो हो
हकीकत में मेरी जगह कोई और न बना बैठे

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गूगल साभार 

कभी जब मिलोगे मैं कुछ तो कहूँगा
प्यार के रंग में भरा शब्द तो भरूँगा
तुम्हारी सूरत पर जरा मुस्कराऊंगा
साँसों को खुशी का इत्र दें जाऊंगा
महकेंगी आँगन तन का जब मिलोगे
प्यार के लफ्ज़ से जब खुशियाँ भरोगे
ढलेगी सुबह भी जहाँ तुम कहाँ कहोगे
सिंदूरी शाम का मांग तब भरूँगा
चुपके से चाँद न आये उसको कहूँगा
शाम बन जाएँ निराली बाहों में रहूँगा

-प्रभात  

5 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (18-05-2016) को "अबके बरस बरसात न बरसी" (चर्चा अंक-2345) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत सुन्दर रचना
    भ्रमर ५

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