Sunday, 1 May 2016

दिन रात होना प्रकृति की परंपरा है

जाने कितने दिनों के बाद गली में आज चाँद निकला....
जी हाँ इससे पहले बड़े नाज़ुक दौर से गुज़र रहे थे हम...
ये मेरे दोनों स्टेटस के बीच के दिनों में जब मैं चुप्पी साधे था तो लोगों ने क्या-क्या अर्थ नहीं लगाये....
आज से पांच साल पहले की बात है मैं एक स्टेटस लगाये दिखता था कि
दिन रात होना प्रकृति की परंपरा है
सुख दुःख सहना आना चाहिए बिना इसके कहा सफलता है......
यूँ तो बात सीधी नहीं है जो एक पन्ने में समेट दी जाए, सैकड़ों पेज की किताब इन दोनों स्टेटस के बीच की बनेगी शुरुआत हो चुकी है एक पेज लिखा था उन दिनों अपने ब्लॉग पर अब धीरे-धीरे इसे अपने अंतिम लक्ष्य तक पहुंचाऊंगा. दोस्तों उथल पुथल की इस ज़िन्दगी में न जाने कितने उतार चढाव आते है. हम कभी खुश होते है तो दूसरा उसी समय दुखी. जिन्दगी में न जाने कितने साथ छूटते है तो उसी समय कुछ साथ जुड़ते भी है. कुछ बड़े काम होते है तो कुछ काम बेकार भी चले जाते है. पिछले दिनों मतलब इन दोनों स्टेटस के बीच में मैंने ही इन्ही विषम परिस्थितियों में कभी शताब्दी से सफ़र किया तो कभी हवाई जहाज से और कभी तो बाथरूम की जगह खड़े होकर ट्रेन की जनरल बोगी में. न जाने कितने लोगों से मुलाकातें हुयी. न जाने कितने लोगों ने साथ छोड़ा. और बहुत से लोगों ने मुझे खाली समझा. कुछ ने पागल तो कुछ ने मुझे रोते हुए देखा. हँसते हुए देखकर मैं अपना सेल्फी लेने की कोशिश करता तो वो सामने आ जाते और मेरी फोटो का आईना ही बदल देते उनकी फोटो ज्यादा खुशदिल वाली नज़र आती. इसी बीच मैंने कवितायेँ जो भी लिखी वो इन सबके गवाह बने. मैंने अपने व्यक्तिगत पीड़ा जो लिखी वो आपसे छुपी रहेगी तब तक जब तक मेरे हर दृश्य के गवाह/ पात्रों का अंत नहीं हो जाता. जो कहानियां सच/ वास्तविक लिखी जाती है उनको लिखने में बहुत दिक्कतें आती है...इसलिए अध्याय अधूरा पड़ा रहता है वर्षों तक कई बार अपने पूरे जीवन काल तक. ज़िन्दगी के वे दिन जिसे हम सोंचते है न आये अगर वही आता है तो बहुत साल पीछे छोड़ जाता है हमें भी और दूसरों की तुलना में केवल. हम मंजिल की तलाश में दूर भी चले जाते है. परन्तु मैं हमेशा किसी घटना के अंजाम का उसके सकारात्मक/ नकारात्मक नतीजों तक हमेशा समय से पहले ही पहुँच जाता हूँ, इसलिए अक्सर मुझे किसी भी भयावह स्थिति से लड़ने में कोई दिक्कत नहीं आती है. दोस्तों व् बड़ों आदरणीय मुझे जीवन में कुछ उपहार मिले है प्रकृति से वह भी शुरू से उसमें से एक उपहार आप भी हो. आपका तहे दिल से शुक्रिया
साभार
-प्रभात


2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (02-05-2016) को "हक़ मांग मजूरा" (चर्चा अंक-2330) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    श्रमिक दिवस की
    शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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