Wednesday, 25 May 2016

चाहिए उसे बस है गुजरे अकेले मौत से खाली

चाहिए उसे बस है गुजरे अकेले मौत से खाली
गूगल से साभार

 तमन्ना है, जो होनी चाहिए वो मुश्किलों से खाली
वहां तो छाया है कोई, है वो पेड़ों से खाली

कोई इंसान खुद की राह चले या खुदा की खाली
पढ़ेगा उसे जमाना जहां होगा यह फैसला खाली

गिरेगा कांच भी बनकर पत्थर, रहेगा कांच खाली
चाहिए उसे बस है गुजरे अकेले मौत से खाली

चीखते हैं, जहां वो लोग अकेले कठघरे में खाली
वहां अपना हो या पराया कोई, वो देखेगा खाली

करोगे तुम्ही अर्पण सुबह का ओंस (बिन्दुस्राव) बनकर खाली
तड़फ की रात के बाद मिलेगा सूकून ही खाली

भीड़ है, तो वहां संभालना है खुद भीड़ से खाली
चलना है अकेले जहाँ कोई हमसफ़र हो खाली

कीचड़ में खिले सुमन को है कहने का साथ खाली
होती है वही असली परीक्षा धर्म और त्याग की खाली
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प्रभात

10 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (27-05-2016) को "कहाँ गये मन के कोमल भाव" (चर्चा अंक-2355) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. कहीं न कहीं खाली होना भी भला जान पड़ता है ..
    बहुत सुन्दर

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  3. बहुत ही खूबसूरत रचना

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  4. बहुत खूब प्रभात जी ... कई बार खाली पन कोई ऐसे भर लेता है जैसे ताज़ा फूलों की खुशबू ...

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