Thursday, 4 May 2017

आहत मन

आहत मन की करूण वेदना प्रखर हुई है जब जब
जागा मैं, आंखे खुली पर छा गयी उदासी तब तब
खो दिया किसी अपने को, जैसे ही कुछ करना चाहा
वीरता का प्रमाण लिए, असमंजता से लड़ना चाहा
नदियां उफनी, बादल गरजा, छाया तिमिर तिहुँ ओर
भावनाओं के वशीभूत है ये, जिंदगी की राह हर ओर
वक्त ने सिखाया है इतना, विपत्ति है आती जब-जब
हौंसलों से पार होती है, अश्रु में डूबी नैया तब-तब

-प्रभात
(तस्वीर: गूगल साभार)

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (07-05-2017) को
    "आहत मन" (चर्चा अंक-2628)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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