Friday, 13 March 2015

मंजिल

कोई पतवार तुम्हे पहुंचा रही है मंजिल
क्यों काट रहे हो उसे, पहुंचकर मंजिल

उड़ रहे हो कहीं पर, जब है पास मंजिल
कभी तो दूर होगी, तुमसे तुम्हारी मंजिल

अभिमान पर भरोसा है जबसे है मंजिल
चौराहे पर ठहरी होगी, कभी तो मंजिल

खुशी हुयी हमें भी, मिली जबसे मंजिल
अहंकार ले गया तुमसे तुम्हारी मंजिल

सो रहे हो फिर भी संरक्षण दे रही मंजिल
जागो वरना अदृश्य हो जायेगी मंजिल

                                           
                   -"प्रभात" 

10 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (14-03-2015) को "माँ पूर्णागिरि का दरबार सजने लगा है" (चर्चा अंक - 1917) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत-बहुत आभार!

      Delete
  2. दिल से लिखी गयी और दिल पर असर करने वाली रचना , बधाई तो लेनी ही होगी

    ReplyDelete
    Replies
    1. भास्कर जी बहुत-बहुत शुक्रिया. मुझे प्रोत्साहित करती है आपकी प्रतिक्रिया..

      Delete
  3. खुशी हुयी हमें भी, मिली जबसे मंजिल
    अहंकार ले गया तुमसे तुम्हारी मंजिल
    बहुत सुंदर और सार्थक.

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपकी टिप्पणी से हमेशा मुझे कुछ नया लिखने को प्रेरित करती है...सधन्यवाद!

      Delete
  4. बहुत ही सार्थक रचना। अच्‍छा और गुणवत्‍ता युक्‍त लेखन कर रहे हैं।

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद....आप पढ़ती रहती है और हौंसला बढ़ाती है इसका सदा मैं आभारी रहूँगा!

      Delete
  5. सार्थक रचना
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है

    ReplyDelete

अगर आपको मेरा यह लेख/रचना पसंद आया हो तो कृपया आप यहाँ टिप्पणी स्वरुप अपनी बात हम तक जरुर पहुंचाए. आपके पास कोई सुझाव हो तो उसका भी स्वागत है. आपका सदा आभारी रहूँगा!