Saturday, 12 March 2016

कल सोते सोते ख्वाबों में

कल सोते सोते ख्वाबों में तुमसे मिलना सीखा था
टूटे अल्फाजों से बिखरकर जुड़ना तुमसे सीखा था
जो बोया था एक बीज प्रेम का लगता है उग आया
शीतल मुस्काती पवन गिर से सीधे उठ चल आया
लफ़्ज़ तुम्हारे घुले हुए मेरे शब्दों में आता देखा था
पहचान तुम्हारी हो गयी जो मिलते जुलते देखा था

रहा बेसब्री से इंतज़ार तुम्हारा पर तुमसे दूर न पाया
मिलकर ख्वाबों की दुनिया से भूल कभी न पाया
चलता रहता जीवन वैसे जैसे क्षणिक मिलन का था
बहता रहता हवा प्यार का जिससे वर्षों व्याकुल था
टूटे सपने होंगे जब दिखा झरोखे से उजियाला था
तनिक मात्र यही उजियाला मेरे जीवन में काफी था



अंततः तुमसे मिलन की बारी आने पर सहमा आया
जुड़ते शब्दों को सामने लाने की सीमा में घिर आया      
 पुनः सहमें सहमें ही जैसे तुमसे जो भी बात हुआ था
कल ही गगन में दिखा जैसे मन से एक चाँद हुआ था  
आज मिश्रित भावों से भी तुम्हारा ही अलगाव हुआ
क़दमों की आहट से जैसे ह्रदय में गहरा संचार हुआ

नहीं मालूम कि तुम्हारा सपना मेरे सपनों जैसा ही था
पर ज़रूर सोंचना कि तुम्हारे मिलन का अर्थ यही था
-प्रभात
  


6 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (13-03-2016) को "लोग मासूम कलियाँ मसलने लगे" (चर्चा अंक-2280) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. बहुत बहुत आभार!

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " लोकसभा चैनल की टीआरपी - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. सार्थक व प्रशंसनीय रचना...
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है।

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