Sunday, 28 February 2016

यादों में खोया हुआ हूँ

 मैला हुआ वो पानी दरिया का, सूरज भी जैसे रुका हुआ है

जाड़ा, गर्मी बरसात लिए अब मौसम कितना बदला हुआ है

घास पर फ़ैली ओंस की बूंदों में चिमनी का रंग घुला हुआ है

वर्षों हो गये सुने कोयल की कूकू को कैसे कहाँ छिपा हुआ है

न जाने किस किस मौसम की अगुवाई में बादल चला हुआ है

-गूगल 










बालक हूँ इतना नादान कौवा और कोयल न समझूँ

रात की रोशनी में अब चांदनी और अधियारी रात न बूझूं

एकादशी की रात अनोखी गन्ने की कीमत न समझूँ

सूंप दीवारों पर टंगी हुयी मंकड़ी के जालों में उलझू

मेढ़क की आवाज वाले खिलौने बाजारों में भी नहीं सुनूँ

बचपन ही अच्छा था तब का अब मैं कहाँ चला हुआ हूँ

लौटा दो वो प्यारे बचपन के खेल यादों में खोया हुआ हूँ 

-प्रभात 

20 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 29 फरवरी 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (29-02-2016) को "हम देख-देख ललचाते हैं" (चर्चा अंक-2267) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " "सठ सन विनय कुटिल सन प्रीती...." " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. बचपन से अच्छा क्या है ? बहुत सुंदर पंक्तियाँ हैं

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    1. बहुत शुक्रिया आपके उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिए!

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  5. ''यादों में खोया हुआ हूं'' बहुत ही उत्कृष्ट रचना की प्रस्तुति। मेरे ब्लाग पर नई पोस्ट को आपका इंतजार है।

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  6. बेहतरीन अभिव्यक्ति.....बहुत बहुत बधाई.....

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    1. बहुत दिनो बाद आपको यहाॅ देखकर प्रसन्नता हुयी।
      धन्यवाद

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  7. बेहतरीन अभिव्यक्ति

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  8. acchi abhivyakti hai prabhat ji......keep it up

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