Wednesday, 6 April 2016

मेरी चाहत मेरे से दूर हो पर

मेरी चाहत मेरे से दूर हो पर फिर भी तुमसे तुम में ही मिल जाने को
जब धूप में तुम्हारी छाया हो
इन आँखों में तुम्हारी काया हो
दिल में एक दीदार समाया हो
हवाओं में जैसे कुछ गुनगुनाया हो
फिर मेरी मोहब्बत क्यों ढूंढती हो इन आँखों को आँखों के सामने
कहती हो क्यों पास आकर मेरे हर सपनों में समां जाने को
मेरी चाहत मेरे से दूर हो पर फिर भी तुमसे तुम में ही मिल जाने को

जब तुम्हे देखकर हमेशा मेरा अक्स खिल गया हो
तुम्हारी बातों में मेरी बातों का मिलन हो गया हो
अधूरा सपना तुम्हे पाकर एक कहानी बन गया हो
मुसकराकर देखने से मुझे मेरा मन बहल गया हो
फिर मेरी मोहब्बत क्यों करती हो इंतज़ार रोजाना उसी रास्ते का
कहती हो क्यों देखकर मुसकराने को हर रोज मेरे आईनें को
मेरी चाहत मेरे से दूर हो पर फिर भी तुमसे तुम में ही मिल जाने को

जब तुम्हे मेरी कमी का एहसास हो गया हो
हरदम मेरी फ़िक्र करने का ज्ञान हो गया हो
हर रास्ते में तुम्हारा और मेरा साथ हो गया हो
मंजिल के इंतज़ार का दिन समाप्त हो गया हो
फिर मेरी मोहब्बत क्यों एहसास कराती हो मुझे अपनी कमी का
कहती हो क्यों नहीं इन यादों को भी अपने साथ मुझसे मिला जाने को
मेरी चाहत मेरे से दूर हो पर फिर भी तुमसे तुम में ही मिल जाने को

-प्रभात
(इमेज केवल काल्पनिक और सजावट के तौर पर गूगल से लेकर लगाई गयी है!) 




    
  







  

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (08-04-2016) को "नैनीताल के ईर्द-गिर्द भी काफी कुछ है देखने के लिये..." (चर्चा अंक-2306) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. बहुत-बहुत आभार!

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  2. सुंदर भावों से सजी रचना । बहुत सुंदर ।

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    Replies
    1. बहुत बहुत शुक्रिया!

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