Thursday, 15 January 2015

मनभावन मृदुल सी आपकी भाषा हो ।

   कल्पना करना आसान नहीं होता । बस में भोर में बैठे हुये गाँव की ओर जा रहा था । बस के आस पास बस रास्तों के साथ पेड़-पौधे यात्रा पर थे । सुबह 5 बजे केवल आगे डिग्गी की और बैठकर रास्तों को निहार रहा था । सुन्दर पीले-पीले सरसों के पौध खेतों में सजे मानों मुझे बचपन की तरह छुपने के लिए बुला रहे थे । गन्ने के खेत को देखकर मेरे दांत ठंडक से जो किट किटा रहे थे वो अब शांत हो गए थे । ओंस की बूंदों से सजी पत्तिया यह कह रही थी की मेरी तरफ देखते रहो । श्रृंगार की अनुपम छठा मानों कुछ पन्नों में कैद करने की ओर इशारा कर रही थी परन्तु कलम की कमी से मुझे अपने निगाहों से ही संतोष करना पड़ा ।    


मनभावन मृदुल सी आपकी भाषा हो
प्रिय, हर बातों में अपनापन आता हो

हल्की सी मुस्कान बिखेरकर लबो पर,  
कोयल से भी मीठा संगीत आता हो

सुन्दरता देख फूल झुके आपकी ओर,
बिन गहने, परी सा लगना आता हो

खुशियाँ जितनी हो जीवन में हमारी,
प्रिय, बातों में बस छुपी हुयी आशा हो

कभी अर्थपूर्ण लगे बातों की कहानी,
तो हृदयस्पर्शी बात बनाना आता हो

ख्वाहिश जैसे पूरी होती रहे हमारी,
यादों पर सुन्दर राग बनाना आता हो

बदलते मौसम से बात करूँ जब-जब,
प्रिय, मौसमी प्यार दिखाने आता हो 

                                                -"प्रभात"

10 comments:

  1. बहुत सुन्दर ,,, भावमय प्रस्तुति ....

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  2. बदलते मौसम से बात करूँ जब-जब,
    प्रिय, मौसमी प्यार दिखाने आता हो ।
    ..सुन्दर ..हृदयस्पर्शी रचना ..

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    1. बहुत-बहुत शुक्रिया!!

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  3. बदलते मौसम से बात करूँ जब-जब,
    प्रिय, मौसमी प्यार दिखाने आता हो ।
    ......वाह प्रभात जी बेहद हृदयस्पर्शी रचना !1

    नई पोस्ट ….शब्दों की मुस्कराहट पर आपका स्वागत है

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  4. आज 29/जनवरी/2015 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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    Replies
    1. शुक्रिया साभार!

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