Wednesday, 9 July 2014

तो क्या है!

   वर्ष २०१२ के वसंत ऋतु में लिखी हुयी ये लाइनें यहाँ आपसे साझा कर रहा हूँ. कहते हैं हर एक चीज का समय होता है जो होता है वह बहुत सही और अपने समय पर ही होता है. किसी नें सही ही तो कहा है:-
 "मंजिलें उसी को मिलती हैं, जिसके सपनों में जान होती है
 परिंदों से कुछ नहीं होता मेरे यार, हौसलों में उड़ान होती है!!"

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मुझको तुम नहीं समझ पाये, तो क्या है!
मेरे इरादों को न समझ पाये, तो क्या है!

वक्त है ये जो कुछ कहने की जरुरत नहीं,
मंजिल मिलने की चाहत में, और भटकते नहीं
खुश होकर जी रहें कुछ पाने की जरुरत नहीं,
ऐसा मैंने सोचा है, तुम नहीं समझ पाये तो क्या है!

तुम्हे सोच कर, मेरे ख्वाब रुकते नहीं,
 तुम्हारे रिश्ते को पाने की, ये आश मिटते नहीं
प्रेम हो गया है इस मन में इस कदर,
तम्हारा प्यार अगर मिल न पाये, तो क्या है!

मुझे कहने को अब कुछ रहते नहीं,
तुम बताने की ख्वाहिश कुछ रखते नहीं,
ये बताना न बताना किस काम का,
अगर जिंदगी में तुम्हारे  कोई और है, तो क्या है!

फिक्र रहते हुए भी, तुमसे मिलता नहीं,
तुम्हे अच्छा लगते हुए भी मैं कुछ लगता नहीं,
ये बातें करने का शौक करूँ किस कदर,
कोई और हो, तुम न मिल पाये तो क्या है!
                     -"प्रभात"

10 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा आज गुरूवार (10-07-2014) को 'उम्मीदें और असलियत { चर्चा - 1670 } पर भी है !
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. सुन्दर प्रस्तुति।

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  3. अच्‍छा लगा आपके ब्‍लॉग पर आकर....आपकी रचनाएं पढकर और आपकी भवनाओं से जुडकर....

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    1. धन्यवाद पधारने के लिए....... जुड़े रहिये, आगे भी आपका सहयोग अपेक्षित है.

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  4. बहुत सुंदर रचना.
    रचनाओं का प्रवाह यूँ ही जारी रहे.

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद!

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