कभी-कभी मैं बिखरा-बिखरा सा होता हूँ
किसी सवाल के जवाब में सहमा-सहमा सा होता
हूँ
किनारों पर पहुँचने में देर न लग जाये
इन बातों से ही थोड़ा बदला-बदला सा होता
हूँ.
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कहीं जमीन मिलती है तो, किसी और को शामिल क्यों न
करूँ
किसी का इंतजार व्यर्थ है तो, अपने आप को खाली क्यों न
करूँ
बिन जाने कब वो आएगा, कुछ हासिल होने की बात आपसे
कैसे करूँ
अगर जमाना ही न बदले तो बदले ज़माने की बात
कैसे करूँ
अरमान लेकर निकले है कुछ सपनों के दिए
जलाकर
गम खत्म हो जाये इससे तो, बहकी-बहकी बातें खुद से
क्यों न करूँ.
-"प्रभात"
-"प्रभात"
| -प्रभात |