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Wednesday, 13 August 2014

बस यूँ ही!


कभी-कभी मैं बिखरा-बिखरा सा होता हूँ
किसी सवाल के जवाब में सहमा-सहमा सा होता हूँ
किनारों पर पहुँचने में देर न लग जाये
इन बातों से ही थोड़ा बदला-बदला सा होता हूँ.

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कहीं जमीन मिलती है तो, किसी और को शामिल क्यों न करूँ
किसी का इंतजार व्यर्थ है तो, अपने आप को खाली क्यों न करूँ
बिन जाने कब वो आएगा, कुछ हासिल होने की बात आपसे कैसे करूँ
अगर जमाना ही न बदले तो बदले ज़माने की बात कैसे करूँ
अरमान लेकर निकले है कुछ सपनों के दिए जलाकर
गम खत्म हो जाये इससे तो, बहकी-बहकी बातें खुद से क्यों न करूँ.

                                    -"प्रभात"

-प्रभात