प्रेम नाम का दरिया है ऐसा, जिसको चाहा है ले डूबा
है ।
कुछ परिणामों ने साथ दिया, कुछ को कर्ज ने ले
डूबा है ।।
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सुन्दर संवरती चट्टान हमारी है, निर्मल मन कह बैठा है ।
गहरी खंदक को जाकर भी, प्रेम प्रकाश जला बैठा
है ।।
भाग्य लिखती है कुछ ऐसा, जिसने चाहा है वो दिया
है ।
कार्य करा मन की जिज्ञासा ने, पूर्ण भाव से भर
दिया है ।।
सदा समर्पित प्यार तुम्हारा, जब भी अहसास हुआ
है ।
तब - तब मीरा के प्रेम का, गलियों में उपहास
हुआ है ।।
प्रभात कह रहा है, कुछ कहानियां प्रेम पर लिखी
जाती है ।
ये तैरते हुए नाव का अंदाज है, न चाहते हुए भी ले
डूबा है ।।
“-प्रभात”
